Saturday, August 14, 2010

ब्रम्ह है या नहीं है

इन्सान के मन-मस्तिष्क, दिलो-दिमाग पर अपनी सत्ता कायम करने वाले अनदेखे अनजाने उस ब्रम्ह कि मै बात कर रहा हूँ , जो है भी और नहीं भी है?
ब्रम्ह नहीं है :- क्यों कि मैंने उसे देखा नहीं है, उसका आकर क्या है, प्रकार क्या है, दिखता कैसा है, रंग क्या है ? आज के पढ़े-लिखे इन्सान यकीन तब ही करता है जब उसे देखता है, छुकर उसे महसूस करता है बिना जाने समझे वह किसी भी मनगढ़ंत बातों पर यकीन नहीं करता। वह प्रयोगवादी है और प्रयोग कर सत्य जानने कि कोशिश करता है। इसी सत्य कि खोज़ में आज का मानव आकाश, पाताल और धरती पर अपनी खोज़ जारी रखी है। इस सत्य कि खोज़ का अंत कहाँ है यह भविष्य के गर्भ में छिपा हुआ है और इन्सान भविष्य नहीं जान सकता ? जब से इस पृथ्वी पर इंसान कि उत्पत्ति हुई है उसी समय से वह सत्य कि खोज में लगा हुआ है, वह सत्य कि जब एक तार को छेड़ता है तो अनगिनत तरंगे प्रतिध्वनित होती है। अब इन्सान उन अनगिनत तरंगो कि खोज़ शुरू करता है जब उसको सुलझाने के करीब पहुंचता है तो फिर कोई और तरंगे प्रतिध्वनित होती है और खोज़ दर खोज़ यह सिलसिला चलता ही रहता है, चलता ही रहता है ....... यानि वृत्त के छोर को खोजना। यह कब तक चलेगा, इसका अंत कहाँ है। इसका जवाब किसी के पास नहीं है ? यह एक अंतहीन सिलसिला है।

ब्रम्ह है :- मैंने उसे नहीं देखा है, लेकिन हर पल उसकी उपस्थिति का एहसाश होता है। शायद वह निराकार है, स्याह अँधेरी काली रात कि तरह जिसमे अपनी आँखों के प्रतिविम्ब भ्रम होता है, जिसमे कुछ भी दिखाई नहीं देता है सिर्फ अनुभव किया जा सकता है। उसकी विशाल सत्ता में नील गगन, नछत्र, तारे, सूर्य, चंद्रमा, पृथ्वी, वायु, अग्नि, जल है। मानव शारीर का निर्माण भी पांच तत्वों से हुआ है :- अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी और आकाश। उसकी सत्ता में जीवन है मृत्यु नहीं है क्यों कि आत्मा अजर-अमर है, इसे कोई भी शक्ति मिटा नहीं सकती है, विनाश होता है तो केवल शारीर का, और यह शारीर फिर उन्ही पांच तत्वों में विलीन हो जाता है। यह अंतहीन सिलसिला चलता ही रहता है। उसके साम्राज्य में जीवन कहाँ-कहाँ है आज का विज्ञानं या मानव उसे नहीं ढूढ़ पाया है। हमारे भारतीय पूर्वजों या ऋषि मुनियों ने पौराणिक पुस्तकों में बहुत से लोक का जिक्र किया है जैसे:- शिवलोक, ब्रम्ह्लोक, विष्णुलोक, इन्द्रलोक, मृत्युलोक और न जाने कौन-कौन से लोक है इस ब्रह्मांड में जहाँ जीवन है। विज्ञानं इस खोज में लगा है, हो सकता है कल दूसरी दुनियां खोज ली जाय, जैसे कि रामसेतु का होना या द्वारिकापुरी का होना पौराणिक पुस्तकों में ही था जब नासा के वैज्ञनिको ने रामसेतु का फोटो और द्वारिकापुरी कि खोज पूरी दुनियां के सामने लाया तब लोगों ने यकीन किया। वैसे ही जब कोई दूसरी दुनियां ख़ोज ली जाएगी तब लोग यकीन करेंगे, जब कि हमारे भारतीय ऋषि-मुनियों ने हजारो साल पहले ही दूसरी दुनियां खोज ली थी। पौराणिक पुस्तक में ही सात सूर्य का जिक्र किया गया है जब कि एक ही सूर्य को विज्ञानं आज तक जान पाया है।
हम सभी मानव, जीव-जंतु, पेड़-पौधा मृत्युलोक के वासी है और मृत्यु ही सत्य है। अगर हम अपने पुरे जीवन कि गड़ना करे तो पाते है कि २३००० से २५००० दिन भी नहीं जी पाते है इस मृत्युलोक में और इसी २३००० दिनों में बचपन, जवानी और बुढ़ापा सब देख लेते है फिर इस शरीर का अंत हो जाता है। उस ब्रम्ह के रचे लिलाओ में से फिर कोई नया पात्र बनकर फिर से कोई नया जीवन जीते है। यह सिलसिला चलता ही रहता है, जबतक यह सृष्टि है।
उसकी सत्ता में न कोई धर्म है न कोई जाती है और नहीं उंच-नीच का भेद-भाव। यह मानव मस्तिष्क कि विकृति है जो इस मृत्युलोक में धर्म, जाती और उंच-नीच बाँट दिया है। उस अनजाने ब्रम्ह के अनेको नाम है जिसे धर्म के हिसाब से नाम दिए गए है जैसे - ईश्वर, अल्लाह, जीजश
उसकी उपस्थिति हर जगह है आप यकीन करे या नहीं करे ? यकीन करना या नहीं करना यह आपके ऊपर निर्भर करता है। अगर इस पृथ्वी पर जीवन है तो ब्रम्ह भी है।
अपने यहाँ चार पुरुषार्थ गिनाये गए है, धर्म, अर्थ, काम और मोक्छ। ये चारो निवंचन इशोपनिषद के प्रथम श्लोक में आया है। मतलब यह कि जो सभी को अनुशासित करता है या जिसका अधिपत्य सब पर है " वाही ईश्वर है " । उसे नहीं मानना सव्यंग को भी झुठलाना है।
जो अपने को नहीं जानता वही ईश्वर को भी नहीं मानता है।


Monday, August 9, 2010

बिहार का चुनावी जंग



बिहार में चुनाव का शंखनाद हो चूका है सभी पार्टियाँ अपने-अपने तरीके से शतरंज कि विशात पर मोहरे बिठाने शुरू कर दिए है। शह और मात का खेल शुरू होने में अभी दो महिना बाकी, लेकिन अभी से सभी पार्टियाँ एक दुसरे से श्रेष्ट साबित करने पर तुली हुई है। भावी उम्मीदवार अपने-अपने छेत्र में अपने स्थिति का आकलन करने में लगे हुए है। दल बदलने कि राजनिति जोरो पर है एक दुसरे के उम्मीदवार को तोड़ने कि पुरजोर कोशिश शुरू है, भावी उम्मीदवारों को हर तरह के प्रलोभन दिए जा रहे है इसमे ऐसी भी पार्टियाँ है जिसे पिछले चुनाव में जनता ने नकार दिया था, अब वो नये-नये समीकरणों के साथ चुनावी जंग में अपने उम्मीदवारों को उतार रहे है। कुछ भावी उम्मीदवार ऐसे भी है जो अपनी गाड़ी में सभी पार्टियों का झंडा रखें है लेकिन डंडा एक ही है, जिस पार्टी के दफ्तर में जाना होता है उस पार्टी का झंडा उसी डंडे में लगा लेते है जिस डंडे में कुछ देर पहले किसी और पार्टी का झंडा था। कुछ भावी उम्मीदवार ऐसे भी है जिन्हें उनकी पार्टी अगर टिकट नहीं दे रही है तो वो दुसरे पार्टी कि सदस्यता ग्रहण कर लेते है क्यों कि दूसरी पार्टी उनको टिकट देने को बचनबद्ध है। कुछ पार्टियाँ दुसरे पार्टी के ऐसे नेता को तोड़ रही है जिनके हाथ में वोट बैंक है। कुछ उम्मीदवार अपने पार्टी से नाराज़ चल रहे है इसलिए दूसरी पार्टियों कि सदस्यता ग्रहण कर रहे है। ऐसा दृश्य चुनाव के समय ही दिखाई देता है। साम-दाम-दंड-भेद से परिपूर्ण हमारे भावी उम्मीदवार चुनावी जंग में दो-दो हाथ करने कि तैयारी पूरी कर ली है, इंतजार है तो बस रेफरी के सिग्नल का पिछला आम सभा चुनाव शांतिपूर्ण माहौल में संपन्न हुआ था क्यों कि उस समय राष्टपति शासन था पिछले पांच सालों में करीब ४९ हजार अपराधियों को न्यायलय द्वारा शज़ा सुनाई गई है इसलिए इस बार का भी चुनाव शांतिपूर्ण ही होगा बिहार में ऐसे तो छेत्रिय एवं राष्ट्रिय स्तर कि पार्टियाँ है लेकिन ज्यादा बोल-बाला छेत्रिय पार्टी का ही है अगला जो विधानसभा चुनाव होने जा रहा है उसमे दो पार्टियों के बीच ही सीधा संघर्ष देखने को मिलेगा, पहला जनता दल यु तथा दूसरा आर.जे.डी. , जनता दल यु के साथ भारतीय जनता पार्टी का गठबंधन है तथा आर.जे.डी का लोक जनशक्ति पार्टी से विगत पंद्रह साल तक आर.जे.डी कि सरकार बिहार कि सत्ता में भागीदारी निभा चुकी है, पिछले पांच साल से जनता दल यु एवं बी.जे.पी कि सरकारअब किस पार्टी से किसका चुनावी गठजोर होता है यह समय बताएगा
आज़ादी के बाद से जीतनी भी सरकारें सत्ता में आई है उन में से किसी ने भी बिहार के दशा और दिशा को नहीं बदला है। चाहे वह कांगेस कि सरकार हो, जनता पार्टी कि सरकार या रास्ट्रीय जनता पार्टी कि सरकार हो, किसी ने भी बिहार के प्रति सकारात्मक सोंच नहीं बनाई जिसका खामियाजा आज बिहार को भुगतना पड़ रहा है। आज बिहार के विद्यार्थी उच्च शिक्षा के लिए दुसरे राज्यों को जाते है। बिहार में रोज़गार नहीं होने के कारण यहाँ से पढ़े लिखे या मजदूरों का पलायन दुसरे राज्यों में होता है। उत्तर बिहार में हर साल बाढ़ आती है लेकिन उसका सही समाधान नहीं होने के कारण करोडो रुपये का नुकसान बिहार को उठाना पड़ता है, वहाँ कि जनता का जो नुकसान होता है सो अलग। वर्तमान में सत्ता पर आसीन जनता दल यु और भारतीय जनता पार्टी कि सरकार कि सोंच सकारात्मक है, यह बिहार के लिए सोंच रही है विगत पांच वर्षों में इनकी सरकार ने सड़के बनवाई, लो एंड ऑडर दुरुस्त हुए, यानी कानून का राज कायम हुआ, कुछ कॉलेज खुले है कुछ कॉलेज खुलने कि स्थिति में है, मजदूरों का पलायन कुछ हद तक कम हुआ है। आगे किसी कि भी सरकार बने उसको बिहार के लिए सोंचना पड़ेगा, बिहार के उन्नति के लिए सोंचना पड़ेगा, मजदूरों और पढ़े-लिखे लोगों के पलायन को रोकने के लिए रोज़गार बढ़ाने के उपाय सोंचना पड़ेगा, विद्यार्थियों के उच्च शिक्षा के लिए बहुत सारे युनिवरसीटी एवं कॉलेज खोलना पड़ेगा, लो एंड ऑडर और कड़ा करना पड़ेगा, उत्तरी बिहार को बाढ़ कि विभीषिका से बचाने के लिए ठोस कदम उढ़ाने पड़ेंगे, बांध को मजबूत बनाना पड़ेगा, डैम बनाने होगे ताकि जो पानी कहर बनकर आता है उससे सिंचाई का काम लिया जाय तथा बिजली का उत्पादन किया जाय। बाढ़ का कहर उत्तरी बिहार में हर साल आता है लाखों लोग उस बाढ़ से प्रभावित होते है हजारो जाने जाती है जान-माल कि छति हर साल होती है, वहाँ के रहने वाले लोग दोषी नहीं है यह सरकार कि गलती है कि उसने इस पर ध्यान नहीं दिया, अगर ध्यान दिया गया होता तो आज उत्तर बिहार में बाढ़ नहीं आता।
अगले चुनाव में नितीश कुमार कि सरकार रहे या न रहे, लेकिन नितीश कुमार ने जो बुनियाद डाली है जो बिहार के लिए सपने देखे है उसी का अनुसरण सभी को करना पड़ेगा।

Saturday, August 7, 2010

स्वतंत्र भारत

१५ अगस्त १९४७ दिन शुक्रवार को दो सौ सालों से जंजीरों में कैद भारत आज अपनी बेड़ियों को तोड़ कर आज़ादी क़ा जश्न मना रहा है, खुली फिजा में सांश ले है। आज मौसम भी बहुत सुहावना है, नीले आसमान में परिंदे चहलकदमी कर रहे है, सूर्य कि लाल किरणे अँधेरे को चीरती हुई उजाले का प्रकाश बिखेर रही है और भारत को निरंतर आगे बढ़ने का सन्देश दे रही है। हर तरफ ढोल और नगाड़े कि आवाज़ सुनाई दे रही है मन-मयूर झुमने को विवश कर रहा है। सड़कों पर भीड़ ही भीड़ नज़र रही है। हर चेहरों पर एक मुस्कान है जो यह जताता है कि गुलामी से मुक्ति के बाद खुली हवा में सांश लेने का अहसाश ही कुछ और है। आज हम स्वतंत्र है, हमारे हाथो और पावों की बेड़ियाँ कट चुकी है, जिस चहरे को देखो, अबीर-गुलाल लगाये खुशियाँ मना रहा है, मानो होली मना रहा हो, संध्या होते ही लोगों ने अपने घरों के मुरेड पर घी का दीप जलाने लगे है जैसे दीवाली मना रहे हो। कुछ ऐसा ही दृश्य रहा होगा जिस दिन भारत को आज़ादी मिली थी। इस आज़ादी को पाने के लिए कितने लोगों ने कुर्बानियां दी है, कितनी यातनाये सही है, तब जाकर भारत को आज़ादी मिली है। हमारे बुजुर्गो ने क्या-क्या नहीं सपने पाले होगे अपने देश के लिए। गाँधी जी ने रामराज्य के सपने दिखाए थे देशवाशियों को। वो सपने साकार तो नहीं हुए। हाँ रामराज्य के बदले रावणराज्य कि स्थापना जरूर हो गई आज देश में हर तरफ लूट-खसोट, रिश्वतखोरी, मुनाफाखोरी, भ्रटाचार का बाज़ार गर्म है देश कि आज़ादी का फायदा अगर किसी को मिला है तो वह हमारे राजनेताओं और पूंजीपतियों को। आज देश में समानता नहीं है इसलिए अमीरी और गरीबी के बीच एक गहरी खाई है जिसे कोई भी राजनेता या कोई भी पार्टी इसे पाटने कि कोशिश नहीं कि, इसका खामियाजा आज देश को भुगतना पड रहा है। आतंकवाद, नक्सलवाद इसी का देन है। भारत कृषि प्रधान देश है लेकिन कृषि को उद्योग का दर्जा नहीं मिला, अगर उद्योग का दर्जा मिला होता तो आज किसान संपन्न होते एक अच्छी जिंदगी बसर करते, गाँव के लोगों का पलायन शहरों में नहीं होता। आज गाँव के किसान ही शहरों में मजदूरी करते है, ढेला, रिक्शा और ऑटो रिक्शा चलाते है। अगर गाँव में रोजगार होता तो गाँव के लोग शहर कभी नहीं जाते। सत्ता पर आशीन कोई भी पार्टी इस पर ध्यान नहीं दिया। आज देश को आज़ादी मिले ६३ साल हो गया है लेकिन देश कि पूरी आबादी अभी भी पूरी तरह साक्षर नहीं है, क्या हमारे राजनेतावों कि यह चुक नहीं ? अभी भी बहुत से ऐसे गाँव है जहाँ बिजली, पानी, सड़क, स्कूल कुछ भी नहीं है फिर भी वहां के लोग इसे नियति मान कर जी रहे है। इन लोगों को यह भी नहीं मालूम कि ये गुलाम है या आज़ाद , क्यों कि इनके जीवन में आज़ादी के बाद भी कोई तब्दीलियाँ नहीं आई। क्या हक बनता है इन राजनेताओं को उन लोगों से वोट लेने का ? जब ये उन्हें कुछ भी सुविधा नहीं दे सकते है तो किस हक से उनसे वोट मांगते है। बिहार कि आधा से ज्यादा आबादी हर साल बाढ़ के चपेटे में आती है, गाँव के गाँव बाढ़ में बह जाते है, हजारों जाने जाती है, जान-माल कि जो छति होती है सो अलग। खुले आसमान के नीचे गाँव के ऊँचे टीले या बांध पर जीवन गुजारने को मजबूर ये गाँव वासी [वही खाना है, वही पैखाना है, वही सोना है साथ में मवेशी भी है, पत्नी है बच्चा है ] खाने के नाम पर कुछ भी नहीं, बस आसमान कि तरफ टकटकी लगाये रहते है कि खाने का पैकेट कब गिरेगा ताकि हम लीग खा सके यह स्थिति तबतक बनी रहती है जबतक कि बाढ़ का पानी ख़त्म हो जाय जिसका सब कुछ बर्बाद हो जाता है कुछ भी उसके पास नहीं रहता वो शहर के लिए पलायन करता है, शहर में भी उसे काम नहीं मिलता, अंत में जीने के लिए वह भीख मांगने लगता है। इस तरह भिखारियों कि संख्या हर साल बढती जाती है। क्या सरकार ने राजनेतावों ने कभी इस पर ध्यान दिया है ??? नहीं,,, अगर ध्यान दिया होता तो बाढ़ के पानी का रूख बदल दिया गया होता और जो पानी आज कहर बन कर आता है वो खेतों में सिंचाई के काम आता, खेतों में फसलें लहलहाती। गाँव में समृधि आती, किसान खुशहाल होते। बाढ़ में सब कुछ गंवाए हुए लोगों को ये राजनेता चना, सत्तू, चुरा, नमक और कपडे बांटते है ताकि तुम मर-मर के जीते रहो और मुझे वोट देते रहो। साथ में मिडिया वालों को लेकर चलते है ताकि इनका वोट बैंक भी बने। ये राजनेता बाढ़ पीड़ित जनता को रिश्वत देते है ताकि तुम मुझे वोट दो, तुम चुरा और नमक पर अपनी जिंदगी गुजरो ताकि मै मलाई खा सकूँ।
हमारे देश के राजनेतावों कभी तो इस देश को अपना समझो, जिसके वोट से तुम सत्ता कि सीढियाँ चढ़ते हो, उसके दुःख-दर्द को तो समझो। क्यों कि जनता है, तो तुम हो ..... अगर जनता नहीं है तो तुम भी नहीं हो !
[ फोटो में गरीब लड़का तिरंगा झंडा बेच रहा है यह उसकी मजबूरी है ताकि पेट कि भूख मिटा सके ] यह स्वतन्त्रता नहीं ?

Monday, August 2, 2010

महंगाई डायन

लूट..लूट..लूट॥ जंहा देखो वही मची है लूट । आज महंगाई बे-लगाम हो गई है, बाज़ार में मंडी में जहाँ देखो महंगाई चरम सीमा पर पहुँच गई है। इस महंगाई से कोई भी वस्तु अछुती नहीं है। अब सौ रुपये का नोट दस रुपये का लगने लगा है। इन बे-तहासा बढ रही महंगाई पर अंकुश लगने वाला कौन है ? सरकार नाम कि वस्तु इस देश में नहीं। सरकार रहती तो जरूर इस महंगाई पर ध्यान देती, अगर जनता द्वारा चुनी हुई सरकार है तो फिर क्यों नहीं ध्यान दे रही है ? इस आग में तो निरीह जनता ही जल रही है। सरकारें पांच साल के लिए बनती है, किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने के कारण जोड़-तोड़ कि राजनिती कर किसी भी तरह पार्टियाँ सत्ता पर काबिज़ तो हो जाती है और उन पांच सालों को सत्ता बाचने में गुज़ार देती है, मतलब यह कि इनको जोड़-तोड़ से फुर्सत मिलेगी तब ना ये जनता के बारे सोचेंगे ?
बचपन में मैंने एक बार सर्कस देखी थी उसका आकर्षण मेरे मन-मस्तिष्क में ऐसी पैठ बनाई कि मै दिन के समय में भी सर्कस के तम्बू के आस-पास घूमते रहता था , उसी दरम्यान मेरे जेहन में एक बात घर कर गई ... इन सर्कस वालों कि अपनी दुनियां ही अलग है। ये आपस में ही एक दुसरे से शादी कर लेते है और सर्कस में ही जिंदगी गुज़ार देते है जब इनका बच्चा होता है तो वह भी सर्कस कि बारीकियों को सिख कर उसी सर्कस में काम करने लगता है और इनकी जिंदगी इसी तरह चलती है। वैसे ही फिल्मी दुनियां वालों कि भी जिंदगी अलग है वो चकाचौध से भरी जिंदगी जीने के आदि है इसलिए वो उस दुनियां से बाहर नहीं निकल पाते है और उसी में अपनी पूरी जिंदगी गुज़ार देते है, इनकी भावी पीढियां भी इसी में अपनी जिन्दगी तलाशती है। आर्मी में नौकरी किये लोग आम जिन्दगी में घुल-मिल नहीं पाते है क्यों कि वो एक अनुशासित जिन्दगी जीने के आदि हो चुके लोग है जहा अनुशासन नहीं है वहां अपने को मिक्स नहीं कर पाते है, इसलिए अनुशासित लोंगो के बीच अपनी दुनियां बसा लेते है।
ठीक इसी प्रकार हमारे देश के राजनेताओं कि भी एक अलग दुनियां है। ये सत्ता का खेल खेलने में माहिर लोग है, झुढ़, फरेब और मक्कारी से भरी जिन्दगी, आम लोगों को बेवकूफ बनाने कि कला में अव्वल ये राज नेता गरीबों का मसीहा बन गरीबों को ही लूट लेते है। १२० करोड़ जनता कि कमाई पर राज करने वाले इन राजनेतावों को महंगाई नज़र ही नहीं आ रही है ? क्या ये सावन के अंधे है जो इन्हें हर तरफ हरियाली ही हरियाली नज़र आ रही है ? हकीकत तो यह है कि इन लोगों का पेट भरा हुआ है इन्हें कैसे महंगाई नज़र आएगी। संवैधानिक तौर पर इनको हर चीज जो मुफ्त में मिली हुई है जैसे-भोजन, आवास, हवाई-यात्रा, रेल-यात्रा, बिजली, पानी, पेट्रोल, डीजल, चार चक्के कि गाड़ी और तो और ऊपर से तनख्वाह, अब ये बताइए कि ये जनता के लिए क्या सोचेंगे ? बस ये यही सोचते है कि अगले चुनाव में कौन सा सब्ज-बाग़ जनता को दिखाऊ ताकि मै फिर चुनाव जीत सकूँ और मुफ्त कि मलाई खाने को मिल सके, फिर महंगाई बढे या टैक्स इससे क्या अंतर पड़ता है। क्यों कि भारतीय जनता कि यादाश्त बहुत कमजोर है वह हर बात बहुत जल्दी भूल जाती है और इसी का फायदा हमारे राजनेता उठाते है।

Friday, July 23, 2010

कलंक का किल ठुका बिहार के माथे पर

अशोक सम्राट कि नगरी पाटलिपुत्र, गौतम बुद्ध एवं महाबीर कि ज्ञान स्थली, गुरु गोविन्द सिंह कि जन्म-स्थली, राजनिती के सबसे बड़े ज्ञाता चाणक्य कि धरती, महात्मा गाँधी एवं लोकनायक जयप्रकाश नारायण कि कर्म भूमि पर जो माननीय विधायकों ने विधान सभा एवं विधान परिषद् में अमानवीय रूप दिखाया वह अशोभनीय है। इसकी जीतनी भी निंदा कि जाय वो भी कम है इन विधायकों का रौद्र रूप देख कर यह नहीं लग रहा था कोई मानव लड़ रहा है लगता था कोई अशुर लड़ रहा है। ये हमारे बिहार के माननीय विधायक गण है जो हम आप जैसे लोंगो का मत लेकर विधान सभा में पहुंचे है। आप इनसे क्या उम्मीद करेंगे ? क्या ऐसे लोग बिहार को आगे ले जायेंगे ? बिहार कि गरिमा जो पहले से धूमिल है क्या और धूमिल नहीं हुई ? विधान सभा या विधान परिषद् इनके घर का आंगन नहीं है जो गाली-गलौज, मार-पिट और कुर्शी फेकौअल तक करते है। क्या इनको रत्ती भर शर्म आती है अपने किये पर ? अगर शर्म आती तो दुसरे दिन विधान परिषद् में यह घटना नहीं घटती। इस लड़ाई में पझ और विपझ दोनों ने अपना-अपना रूप दिखाया है। गलती किसी कि भी हो कलंक तो बिहार के माथे पर ही लगा। बिहार के सपूतों ने बिहार के माथे पर कलंक का एक और किल ठोंक दिया। इन में से ज्यादातर सदस्य गण जे पी आन्दोलन के सदस्य रहे है, अगर जय प्रकाश नारायण कि आत्मा ऊपर से इन लोंगो के व्यवहार को देखती होगी तो क्या महशुस करती होगी, उन्हों ने तो इनको एक अच्छे राजनितिग्य बनाये, सत्ता में जाने के रास्ते बताये उन्हें क्या मालूम था कि ये सत्ता में जाने के बाद इंसानियत ही खो देंगे। अगर हमारे इन माननीय विधायकों में जरा भी इंसानियत बची हुई है या जनता के प्रति जरा भी लगाव है तो ये सारे विधायक बिहार कि जनता तथा देश कि जनता से मांफी मांगे और कसम खाएं फिर यह घटना दुबारा नहीं होगी।अगर यह घटना निकट भविष्य में होने वाले चुनाव को ध्यान में रख कर किया गया है या आम जनता के ध्यान को अपनी ओर आकृष्ट करने के लिए किया गया है तो मै यही कहूँगा कि अब बिहार के लोग इतने बेवकूफ और गंवार नहीं है जो हो रही इन घटनावों को नहीं समझ रहें है। यह बिहार, बिहार कि जनता कि है कुछ मुठ्ठी भर राज नेतावों कि नहीं है। इसलिए ये राज नेता अपनी मनमानी बंद करें नहीं तो बिहार कि जनता आने वाले चुनाव में सबक सिखा सकती है।

Wednesday, July 21, 2010

बिहार का दुर्भाग्य

बिहार… एक ऐसा प्रान्त जो अपनी बदनामी का दाग लिए जी रहा है। शायद बिहार के लोंगो ने ही बिहार को इस स्थिति तक पहुँचाया है। आज बिहार पुरे भारत में अपनी बदनामी के लिए मशहूर है बल्कि दुसरे राज्यों में बिहारी कहलाना भी अपमान है, इसीलिए दुसरे राज्यों में बसे हुए बिहारी अपने को बिहारी कहने से हिचकते है। इससे बड़ी बिडम्बना और क्या हो सकती है बिहारी लोग दुसरे राज्यों में अपनी पहचान छिपाते है। आप भारत के किसी भी राज्य में जाएँ आपको ऑटो रिक्शा या रिक्शा चालक ज्यादातर बिहारी मिलेंगे, फैक्टरियों में काम करने वाले , बहुमंजिली इमारतो में काम करने वाले, होटलों में काम करने वाले, खेतों में काम करने वाले मजदूर ज्यादातर बिहार प्रान्त से ही है। अब दूसरी बात – आप उत्तर भारत के किसी भी राज्य, महाराष्ट या भारत के और राज्यों में जाइये वहां के जितने भी कॉलेज है चाहें वह इंजीनियरिंग, मेडिकल, एम् बी ए इत्यादि इत्यादि इन सभी कालेजों में बिहारी छात्रों कि संख्या ज्यादा मिलेगी। मतलब यह कि बिहार में रोजगार एवं कल-कारखाने नहीं होने के करण बिहारी लोग दुसरे राज्यों में काम करने के लिए जाते है क्यों कि वहां उनको काम आसानी से मिल जाता है और मजदूरी भी भरपूर मिलती है। अब रही बिहारी छात्रों कि बात – तो छात्रों कि छमता के हिसाब से इंजीनियरिंग, मेडिकल, एम् बी ए इत्यादि इत्यादि कालेजों कि कमी के चलते यहाँ के छात्र दुसरे राज्यों में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए जाते है। जब ये लड़के अपनी पढाई समाप्त कर नौकरी में जाते है तो फिर बिहार आने से हिचकते है और ये उसी राज्य और शहर के बन कर रह जाते है। क्या बिहार के लोंगो ने कभी इस पर ध्यान दिया है ? शायद नहीं।
आज क्या करण है कि नौकरी करने वाले राज्यों का प्रतिशत निकला जाय तो बिहार उसमे अव्वल आएगा। क्यों कि यहाँ नौकरी करना या नौकर बनना मुख्य पेशा बन गया है। हम बिहारी लोग अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा कर (चाहे पढ़ाने में कितना भी खर्च क्यों ना हो) एक अच्छा नौकर बनाते है कभी उनको मालिक नहीं बनाते या मालिक बनने कि शिक्षा नहीं देते। क्या हम बिहारियों कि यह गलत सोंच नहीं है ? अगर हम अपने बच्चों को मालिक बनाने कि कोशिश करते तो शायद वो अपने ही राज्य में कल-कारखाने लगाते, जिससे कि बिहार के लोंगो को ज्यादा से ज्यादा रोज़गार मिलता तो फिर वो दुसरे राज्यों में क्यों जाते मेहनत मजदूरी करने के लिए। रही बात बिहारी छात्रों के लिए कॉलेज कि बात – आप उत्तर भारत के राज्यों महाराष्ट्र भारत के और राज्यों में जितने भी इंजीनियरिंग, मेडिकल, एम् बी ए इत्यादि कॉलेज है या तो वह किसी ऍम पी, मंत्री, राजनेता या उद्योग घराने का है, वहां के लोंगो को अपने राज्य से लगाव है इसलिए अपने राज्य में ही कॉलेज खोलें है, ताकि राज्य कि आमदनी बढ़ सके और लोंगो का जीवन स्तर ऊँचा हो। लेकिन हमारे बिहार के राजनेता, मंत्री, एम् पी ऐसी नहीं सोंच नहीं रखते है पैसा या पॉवर आने पर वो अपनी एक अलग पार्टी बना लेते है ताकि वो सत्ता में या सत्ता के करीब रह सके। इससे राज्य कि आमदनी तो नहीं बढ़ जाएगी या लोंगो को रोज़गार तो नहीं मिल जायेगा। आज बिहार का पैसा उत्तर भारत के राज्यों और भारत के अन्य राज्यों को जा रहा है। अगर बिहार में यह सभी सुविधा उपलब्ध होती तो यह पैसा बिहार के पास ही रहता बल्कि दुसरे राज्यों का पैसा भी बिहार में आता, और जब पैसे ज्यादा आता है तो रोज़गार के तरीके भी ज्यादा समझ में आने लगते है।

बढ़ता तापमान बिहार विधान सभा का

आज दिनांक २०/०७/२०१० दिन मंगल वार को बिहार विधान सभा का तापमान एकाएक ऐसा बढ़ा कि हमारे माननीय सदस्य गण अपना आपा खो दिए और बिहार के चहरे पर एक ऐसा कालिख पोत दिए जो मिटाने से भी नहीं मिट सकती। ये वो सदस्य गण है जिन्हें जनता ने अपना अमूल्य वोट (विश्वास) देकर विधान सभा में भेजा था, शायद उस जनता का भी इन लोंगो ने कद्र नहीं किया, अगर ये कद्र किये रहते तो ये घटना नहीं घटती और लोकतंत्र के चहरे पर कालिख नहीं पुतता। पढ़े- लिखे और सभ्य लोंगो के बीच में जो भी बहस होती है वह मर्यादा के अन्दर होती है, हाँ अनपढ़ गंवार और असभ्य लोंगो के बीच में जो बहस होती है वह मर्यादित नहीं होती है इसीलिए वो मार-पिट, गाली-गलौज तक कि सीमाएं पार कर जाते है। यह उनके लिए छम्य है क्यों कि वो अनपढ़, गंवार और असभ्य लोग है। लेकिन बिहार विधान सभा में जो घटना घटी वह यही जाहिर करता है इस सभा में भी असभ्य लोग है, क्यों कि सभ्य लोंगों कि यह लड़ाई नहीं थी। बात इतनी बड़ी नहीं थी जिसके लिए इतनी बड़ी घटना हुई। बात है ११४१२ करोड़ सरकारी रुपये कि निकासी का जिसका लेखा-जोखा सरकार के पास नहीं दिया गया है तथा उच्च न्यायालय ने सी बी आई जाँच के आदेश दे दिए है। अभी जाँच चल रही है जो लेखा-जोखा माँगा जायेगा वह वर्तमान सरकार देगी, तब जो न्याय सामने आएगा उस पर विपझ सरकार से त्याग पत्र मांगे।
बिधान सभा में ऐसी घटना घटी क्यों? क्या वर्तमान में जो विधान सभा चुनाव होना है उसको ध्यान में रखकर इस घटना को अंजाम दिया गया ताकि लोंगो का ध्यान आकृष्ट हो शके। यह तो राजनीत का सबसे घिनौना चेहरा सामने आया है। अगर वोट कि राजनीत को लेकर यह खेल खेला गया है तो पब्लिक इतनी बेवकूफ नहीं है जो इन बातों को नहीं समझती है।