Saturday, February 28, 2026

औरत....

हम तमाशा बन गए है,
दुनियां के बाज़ार में.!

वो लगाता मोलभाव,
ले जाता है खरीद कर.!

हो जाती नीलाम जिंदगी,
सरेआम लूटती आबरु.!

क्यों किए कमज़ोर हमको,
मेरे ही अपने सभी.!

बिन सहारे जी न पाती,
गढ़ दी ऐसी काया है.!

बना दिया अबला मुझे,
कह दिया तू औरत है..?
#अजय57

वक्त के साथ बदलते रिश्ते

वक्त के साथ बदलते रिश्ते 

यह तस्वीर एक माँ और उसके दो बच्चों की है, जो आज बड़े होकर अपनी शादीशुदा ज़िंदगी जी रहे हैं, लेकिन अब माँ के साथ नहीं रहते। यह तस्वीर सिर्फ एक पल को कैद नहीं करती, बल्कि एक कहानी कहती है—प्यार, त्याग और समय के साथ बदलती रिश्तों की कहानी।

​इस तस्वीर में माँ अपने बच्चों के साथ खड़ी है, उनके कंधों पर हाथ रखकर। उसकी आँखों में वात्सल्य और गर्व साफ झलक रहा है। बच्चे भी अपनी माँ के आंचल में सुरक्षित और खुश दिख रहे हैं। यह दृश्य बताता है कि कैसे एक माँ अपने बच्चों के लिए पूरी दुनिया होती है, और बच्चे माँ के लिए जीवन का आधार। उस समय, शायद उन्हें यह कल्पना भी नहीं होगी कि एक दिन वे बड़े होंगे और अपने जीवन साथी के साथ अपनी अलग दुनिया बसा लेंगे।

​समय का चक्र चलता रहा, बच्चे बड़े हुए, उन्हें अपनी शिक्षा और करियर की राहें मिलीं। फिर आया वह पड़ाव जब उन्होंने अपने जीवन साथी चुने और अपने नए परिवारों की नींव रखी। यह हर माँ का सपना होता है कि उसके बच्चे खुश रहें, सफल हों और अपना परिवार बसाएं। लेकिन इस खुशी के साथ एक कड़वी सच्चाई भी जुड़ी होती है—बच्चों का घर से दूर चले जाना।

​आज वे बच्चे अपने जीवन में व्यस्त हैं, शायद शहरों में, या देशों में, अपनी-अपनी जिम्मेदारियों को निभाते हुए। वे अपने बच्चों को पाल रहे हैं, अपने रिश्तों को सहेज रहे हैं। इस सब में, कहीं न कहीं, उस माँ की यादें, उसका प्यार और उसका अकेलापन भी शामिल है। माँ आज भी शायद उन पुरानी यादों को संजोए बैठी होगी, जब उसके बच्चे उसके पास थे। शायद वह हर त्योहार पर, हर खुशी के मौके पर उन्हें याद करती होगी।

​यह सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं है, बल्कि आज के समाज की एक सामान्य तस्वीर है जहाँ बच्चे बेहतर अवसरों या अपनी सुविधा के लिए माता-पिता से दूर रहने लगते हैं। यह बदलाव ज़रूरी है, स्वाभाविक है, लेकिन इसके साथ कई भावनाएँ जुड़ी होती हैं। माँ और बच्चों का रिश्ता कभी नहीं बदलता, भले ही दूरियाँ आ जाएँ। यह तस्वीर इस बात की गवाही है कि माँ का प्यार हमेशा अटल रहता है, चाहे बच्चे कहीं भी हों, कितने भी बड़े क्यों न हो जाएँ।

​यह तस्वीर हमें याद दिलाती है कि रिश्तों की अहमियत क्या है, और हमें अपने माता-पिता के प्रति हमेशा कृतज्ञ रहना चाहिए, भले ही हम उनके साथ शारीरिक रूप से न रह पा रहे हों। उन्हें समय देना, उनसे बात करना और यह एहसास दिलाना कि वे आज भी हमारे जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, यही हमारे लिए सबसे बड़ा कर्तव्य है।

अजय केशरी 

Friday, February 13, 2026

मनेर की मज़ार








मनेर का मकदूम साह दौलत मज़ार: मुगल स्थापत्य का जीवंत प्रतीकपटना से मात्र तीस किलोमीटर दूर, मनेर कस्बा बिहार की धरती पर एक ऐतिहासिक धरोहर को समेटे हुए है। यहाँ सूफी संत मकदूम साह दौलत का मज़ार स्थित है, जो भक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। सन १६०८ के आसपास इनकी मृत्यु हुई, और उनके नाम से जुड़ी यह इमारत मुगल कालीन स्थापत्य की उत्कृष्ट मिसाल है। सफेद संगमरमर की चमक और नाजुक नक्काशी इसे दूर से ही आकर्षित करती है।मकदूम साह दौलत एक प्रमुख सूफी संत थे, जिनकी शिक्षाएँ प्रेम, भक्ति और मानवता पर आधारित थीं। मुगल सम्राट जहाँगीर के काल में यह मज़ार निर्मित हुआ, जो स्थानीय शासकों और मुगल दरबार के संरक्षण में फला-फूला। इमारत का मुख्य गुंबद ऊँचा और सुंदर है, जिसमें अरबी-पर्शियन शिलालेख उत्कीर्ण हैं। चारों ओर मेहराबदार गलियारे और जालीदार खिड़कियाँ हैं, जो मुगल शैली की विशेषता दर्शाती हैं—जैसे ताजमहल या हुमायूँ का मज़ार। संगमरमर पर फूल-पत्तियों की बारीक नक्काशी और छतरीदार मीनारें इसे राजसी वैभव प्रदान करती हैं।यह मज़ार न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि बिहार के मुस्लिम-सूफी इतिहास का साक्षी भी है। हर साल उर्स के अवसर पर हजारों भक्त इकट्ठा होते हैं, जहाँ कव्वाली और दरगाह की फिजा आस्था को गहरा करती है। पटना के शहरी भागदौड़ से दूर, मनेर की शांत वादियाँ इस ऐतिहासिक स्थल को और भी रहस्यमय बनाती हैं। पर्यटक और इतिहास प्रेमी यहाँ आकर मुगल युग की भव्यता को महसूस कर सकते हैं।
अजय केशरी