Monday, October 8, 2012

चक्रव्यह में फंसा आम आदमी

महंगाई के चक्रव्यह में आज भारत का आम आदमी फंस कर रह गया है .हमारे देश के माननीय राजनीति के आकाओं देश के महान राजनेताओं, देश के सर्वोच्च पद पर बैठे माननीय मंत्रियों, उधोग जगत के माननीय उधोगपतियों, देश के वुरोक्रेट्सों क्या आप लोगो को यह लगता है की आपलोग इसी दुनियां के है या कोई दूसरी दुनियां से आये हुए लोग है . क्यों की आपलोग भारत के भाग्य विधाता है। आप लोग भी उसी हाड़ मांस से बने हुए लोग है जीस हाड़ मांस से भारत की आम आदमी बनी है। फिर आम आदमी और आप में इतना फर्क क्यों है। आम आदमी अपनी छोटी कमाई में में ही गुज़ारा कर लेता है लेकिन आपलोगों को छोटी कमाई रास नहीं आती इसलिए इतने बड़े-बड़े घोटाले करते है जिसकी कल्पना आम आदमी सपने में भी नहीं कर सकता। लगता है आम आदमी से आपलोगों का पेट बड़ा है इसीलिए बड़े से बड़ा घोटाला कर के भी आपलोग आराम से पचा लेते है और डकार भी नहीं आती, यानि अभी और बड़े-बड़े घोटाला करना बाकि है। क्या यह देश आपलोगों का नहीं है ? क्या भारत की जनता इस देश की नहीं है ? अगर यह देश आपलोगों का है और इस देश में निवास करने वाली जनता इसी देश की है तो फिर इस देश के प्रति आपलोगों का कुछ तो कर्तव्य बनता है या फिर देश के प्रति यहाँ की जनता के प्रति आपलोगों का कोई कर्तव्य ही नहीं बनता। लगता तो यही है की जनता से वोट लेने का बाद आपलोग जनता को ही भूल जाते है। अगर जनता आपको याद रहती तो कम से कम महंगाई बढ़ाते और घोटाले छोटे करते ताकि देश की आर्थिक स्थिति इतनी ख़राब नहीं होती। लगता तो यही है की इस देश के प्रति आपलोगों के दिल में कोई सहानभूति नहीं है यहाँ की जनता के प्रति कोई हमदर्दी नहीं है। अगर देश के प्रति सहानभूति होती तो आपलोग इतने बड़े घोटाले कर सफ़ेद पैसे को काला नहीं करते। आज सफ़ेद पैसा काला होने के कारण ही आपलोगों को बार-बार महंगाई बढ़ानी पड़ रही है ताकि देश के खजाने में राजस्व आ सके। अगर आपलोग छोटे घोटाले करते तो देश की आर्थिक स्थिति ठीक रहती और आप जो आम आदमी को गैस सिलिंडर , डीज़ल पर जो सब्सिडी देते थे वह आम लोगों को आज भी मिलता रहता। घोटाले तो आपलोग किये लेकिन इसका खामियाजा कौन भुगत रहा है, इस देश की आम जनता ? आपलोगों को मालूम है एक परिवार के लिए आपलोग साल में मात्र छः सिलिंडर दे रहे है, क्या वह एक दिन में मात्र एक ही बार खाना खायेगा, क्यों की अगर दो बार खाना और नास्ता बनता है तो फिर साल में छः सिलिंडर कम पड़ जायेगा बाकि सिलिंडर खरीदने के लिए उसकी जेब ढीली करनी पड़ेगी। अगर मान लीजिये अतिरिक्त सिलिंडर खरीदने के लिए वह सक्षम नहीं है तो क्या करेगा वह आम आदमी ? आपलोग देश के सर्वोच्च पद पर बैठे है जनता के पैसों से ही आपलोगों का गुज़ारा होता है उसी के पैसों पर आपलोग मौज मस्ती करते है विदेश यात्रा करते है, महंगा से महंगा इलाज कराते है इस देश में इलाज न करा कर विदेश में इलाज कराते है। महंगी से महंगी गाड़ियों में सफ़र करते है, मुफ्त में आपलोगों को आवास मिलता है। खाने पीने की हर चीज आपलोगों को मुफ्त में मिलती है। आपलोगों को मालूम है की यह सब भारत के जनता के पैसों से होता है तो फिर उसी जनता को सब्सिडी के रूप में कुछ पैसे लौटते थे  तो जनता पर कोई मेहरबानी तो नहीं करते थे बल्कि जनता आप पर मेहरबानी कर रही है की उसके पैसों पर आप पल रहे है। आप अभी सत्ता में है तो जनता का ख्याल कीजिये क्यों की जनता से आप है आपसे जनता नहीं है। 

Monday, September 24, 2012

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह "दिनकर" का जन्मदिन

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह "दिनकर" का आज के दिन 23 सितम्बर 1908 को बिहार के बेगुसराय जिले के सिमरिया गाँव में हुआ था ! उनकी प्राथमिक शिक्षा गाँव के ही स्कूल में व उसके बाद बारो मध्य विधालय से। मैट्रिक मोकामा हाई स्कूल से तथा पटना यूनिवर्सिटी से इंटर व इतिहास प्रतिष्ठा की डिग्री। दिनकर जी द्वारा साहित्य सृजन - विजय सन्देश, प्रणभंग, रेणुका, हुँकार, कुरुछेत्र, रसवंती, बापू, रश्मिरथी, उर्वशी, हरे को हरी नाम, मिर्च का राजा, सामधेनी, उजली आग, संस्कृति के चार उपाय, विवाह की मुसीबते, धर्म नैतिकता व विज्ञान, बट पीपल तथा अन्य और रचनाएं है। उनका संसदीय जीवन 1952 से 1964 तक राजसभा के सांसद के रूप में रहा।                                                   
उनके द्वारा लिखित रचनाएं तो बहुत सी है लेकिन मै रश्मिरथी पर चर्चा कर रहा हूँ।
दिनकर जी ने रश्मिरथी में महाभारत काल के एक ऐसे वीर चरित्र को रश्मिरथी का नायक बनाये है जो हमारे सभ्य समाज में वैसे पात्र की कोई पहचान नहीं होती या सामाजिक मर्यादाओं में कोई महत्त्व नहीं दिया जाता है, जिसके पिता की पहचान न हो यानि नाजायज संतान। 
वीर कर्ण थे तो सूर्य पुत्र लेकिन उनके पूरे जीवन काल में सूतपुत्र कहकर ही उनको संबोधित किया गया है। पांडवो के बड़े भ्राता होने बावजूद भी उनको पांडवो से कोई सम्मान नहीं मिला बल्कि उनको हर तरह से छलने की कोशिश की गई है। माता कुंती को यह मालूम होने के बाद भी की कर्ण उनका ही पुत्र है, लोक लज्जा के डर से कर्ण को नहीं अपना सकी। छोटे भ्रातावों के द्वारा बार-बार अपमानित होने के बाद भी माता कुंती द्वारा कोई प्रतिक्रिया व्यक्त न करना यह लोक-लज्जा ही तो थी ऐसे में कर्ण को युर्योधन के द्वारा मान-सम्मान मिलता है।
क्यों की युर्योधन पांडवो को देखना नहीं चाहता था और उसने कर्ण की वीरता को देख चूका था उसे यह मालूम हो गया था की कर्ण अर्जुन से भी बड़ा वीर योद्धा है। और उसने कर्ण के बल पर ही महाभारत की लड़ाई लड़ने की ठान ली। महाभारत के परिणाम तो सभी को मालूम है।
रश्मिरथी से :-
रंग-भूमि में अर्जुन था जब समाँ अनोखा बाँधे,
बढ़ा भीड़-भीतर से सहसा कर्ण शरासन साधे।
कहता हुआ, 'तालियों से क्या रहा गर्व में फूल?
अर्जुन! तेरा सुयश अभी क्षण में होता है धूल।'


'तूने जो-जो किया, उसे मैं भी दिखला सकता हूँ,
चाहे तो कुछ नयी कलाएँ भी सिखला सकता हूँ।
आँख खोल कर देख, कर्ण के हाथों का व्यापार,
फूले सस्ता सुयश प्राप्त कर, उस नर को धिक्कार।'


इस प्रकार कह लगा दिखाने कर्ण कलाएँ रण की,
सभा स्तब्ध रह गयी, गयी रह आँख टँगी जन-जन की।
मन्त्र-मुग्ध-सा मौन चतुर्दिक् जन का पारावार,
गूँज रही थी मात्र कर्ण की धन्वा की टंकार।



Thursday, September 20, 2012

भारत में एफ डी आई का आना

ऍफ़ डी आई को लेकर आज देश में हो हल्ला मचा हुआ है, कांगेस यह तर्क दे रही है इसके आने से देश आर्थिक रूप से मजबूत होगा, किसानो को अपने उत्पादन पर ज्यादा मुनाफा होगा देश में रोजगार बढेगा यानि कि सब कुछ अच्छा ही अच्छा होगा लेकिन हमें उन दिनों को याद रखना चाहिए जब आज से २७० साल पहले ब्रितानी ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में व्यापार करने के लिए आई थी और उसके क्या परिणाम हुए यह हम सब अच्छी तरह जानते है! उन्हों ने दो सौ सालों तक हमारे देश पर शासन किया, अगर महात्मा गाँधी नहीं होते तो आज भी हमारे देश में ब्रिटिश हुकुमत ही होता ! कोका-कोला और पेप्सी के आने से हमारे देश में वह उद्योग बंद हो गए जहाँ कभी फेंटा, लिम्का और गोल्ड स्पाट जैसे सोफ्ट ड्रिंक बनते थे क्यों कि आज कोका-कोला और पेप्सी जैसी कंपनियों ने या तो इन उत्पादों को बंद करा दिया या फिर वह वहां अपना उत्पादन करने लगी ! माना कि विदेशी कंपनियों के आने से तात्कालिक भारत के लोगों को फायदा तो होगा लेकिन आगे चल कर क्या होगा ?  यही होगा आज किसान अपने दामो पर उसे अपना माल देंगे लेकिन कुछ ही सालो के अन्दर ये विदेशी कम्पनियाँ किसानो के उत्पादन का मूल्य खुद तय करेंगी और अपने शर्तो पर सामान लेंगी ! विदेशी कम्पनियाँ हमारे देश में यहाँ के लोगों का भला या देश का आर्थिक मदद करने के लिए नहीं आ रही है बल्कि अपने पैसे के बल पर हमारे देश का सामान खरीद कर हमें ही बेचेगी और मुनाफा कमा कर अपने देश की आर्थिक मदद करेगी ! ले देकर अब यही लगने लगा है की हम आज फिर से उसी अतीत के तरफ लौटने लगे है जब हमारा देश गुलाम था ! हमारे देश के नेताओं को यह समझना चाहिए की यह देश हमारा है इसकी दीवारे इतनी मजबूत करे की कोई विदेशी कम्पनियाँ हमारे देश में आकर हमारे लोगों को नहीं ढगे !

Thursday, August 30, 2012

बे-नकाब होती भारतीय राजनीति

केंद्र कि सत्ता में आसीन कांग्रेस पार्टी तथा उसकी सहयोगी पार्टी यूपीए कि सरकार तथा विपक्ष में बैठी भारतीय जनता पार्टी तथा उसकी सहयोगी पार्टी एनडीऐ के सांसद एक दुसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगा रहे है और यह साबित करने पर तुले हुए है कि कौन बड़ा घोटालाबाज़ है! जिसका नतीजा यह हो रहा है कि इनके खिंचा तान में संसदीय कार्य पूरी तरह से ठप पड़ गया है और जनता का करोडो रुपया प्रतिदिन संसदीय कार्य पर खर्च तो हो रहे है लेकिन काम कुछ नहीं हो रहा है ! क्या भारतीय जनता मूक दर्शक बनी बैठी है या फिर बेनकाब हो रहे भारतीय राजनीति को देख रही है ? आज आरोप और प्रत्यारोप कि राजनितिक भाषा उस नीचले स्तर तक पहुँच गई है जहाँ विपक्ष के नेता सत्तारूढ़ पार्टी पर यह आरोप लगा रहे है कि कोयला के गबन में कांग्रेस पार्टी को "मोटामाल" मिला है तो सत्तारूढ़ पार्टी कि सुप्रीमो भारतीय जनता पार्टी पर यह आरोप लगा रही है कि यह "ब्लेकमेलर" पार्टी है और बेचारी भारतीय निरीह जनता इन दोनों पार्टियों के आरोपों को सुन रही है, समझने कि कोशिश कर रही है और शोंच रही है क्या भारतीय राजनीति इतनी जल्दी अपनी गरिमा को खो दी या हमलोगों ने गलत विचार धरा के उम्मीदवार को अपना नेता चुन संसद में भेज दिए जो आपस में मिलजुल कर बड़े-बड़े घोटाले तो कर रहे है और अपनी छवि को साफ सुथरी बताने के लिए एक दुसरे पर आरोप और प्रत्यारोप लगा रहे है और जनता के पैसों को लूट रहे है!
भारत एक प्रजातांत्रिक देश है और प्रजातंत्र कि परिभाषा है :- "जनता का, जनता के लिए, जनता के द्वारा "।
जनता का :- यानि भारतवर्ष कि पूरी संपदा, उसका छेत्रफल, नदी, समुन्द्र, खनिज, पर्वत यह सब भारतीय जनता का है न कि किसी पार्टी विशेष कि,इसलिए भारत कि हर जनता को यह सोंचना पड़ेगा कि उसका प्रतिनिधि कैसा हो जो उसकी संपदा कि रक्षा कर सके ?
जनता के लिए :- जनता के हितो कि रक्षा के लिए भारतीय संसद है जो भारतीय जनता का सर्वोच्च सदन है।
जनता के द्वारा :- जनता के द्वारा चुने हुए उसके नेता, जन-प्रतिनिधि या नायक, जनता के हितो कि रक्षा करते है।
क्या आपके सांसद आपकी संपदाओं कि रक्षा कर पा रहे है, शायद नहीं, अगर भारतीय जनता के संपदाओं कि रक्षा होती तो आज इतने बड़े-बड़े घोटाले नहीं होते । नीचे कुछ उदाहरण दे रहे है जो आज़ादी के बाद से अबतक कितने घोटाले इन राजनेताओ ने किये है ।
आजादी से अब तक देश में काफी बड़े घोटालों का इतिहास रहा है। नीचे भारत में हुए बड़े घोटालों का संक्षिप्त विवरण दिया गया है-
जीप खरीदी (१९४८)
आजादी के बाद भारत सरकार ने एक लंदन की कंपनी से २००० जीपों को सौदा किया। सौदा ८० लाख रुपये का था। लेकिन केवल १५५ जीप ही मिल पाई। घोटाले में ब्रिटेन में मौजूद तत्कालीन भारतीय उच्चायुक्त वी.के. कृष्ण मेनन का हाथ होने की बात सामने आई। लेकिन १९५५ में केस बंद कर दिया गया। जल्द ही मेनन नेहरु केबिनेट में शामिल हो गए।
साइकिल आयात (१९५१)
तत्कालीन वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के सेकरेटरी एस.ए. वेंकटरमन ने एक कंपनी को साइकिल आयात कोटा दिए जाने के बदले में रिश्वत ली। इसके लिए उन्हें जेल जाना पड़ा।
मुंध्रा मैस (१९५८)
हरिदास मुंध्रा द्वारा स्थापित छह कंपनियों में लाइफ इंश्योरेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया के १.२ करोड़ रुपये से संबंधित मामला उजागर हुआ। इसमें तत्कालीन वित्त मंत्री टीटी कृष्णामचारी, वित्त सचिव एच.एम.पटेल, एलआईसी चेयरमैन एल एस वैद्ययानाथन का नाम आया। कृष्णामचारी को इस्तीफा देना पड़ा और मुंध्रा को जेल जाना पड़ा
तेजा ऋण
१९६० में एक बिजनेसमैन धर्म तेजा ने एक शिपिंग कंपनी शुरू करने केलिए सरकार से २२ करोड़ रुपये का लोन लिया। लेकिन बाद में धनराशि को देश से बाहर भेज दिया। उन्हें यूरोप में गिरफ्तार किया गया और छह साल की कैद हुई।
पटनायक मामला
१९६५ में उड़ीसा के मुख्यमंत्री बीजू पटनायक को इस्तीफा देने केलिए मजबूर किया गया। उन पर अपनी निजी स्वामित्व कंपनी 'कलिंग ट्यूब्सÓ को एक सरकारी कांट्रेक्ट दिलाने केलिए मदद करने का आरोप था।
मारुति घोटाला
मारुति कंपनी बनने से पहले यहां एक घोटाला हुआ जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का नाम आया। मामले में पेसेंजर कार बनाने का लाइसेंस देने के लिए संजय गांधी की मदद की गई थी।
कुओ ऑयल डील
१९७६ में तेल के गिरते दामों के मददेनजर इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन ने हांग कांग की एक फर्जी कंपनी से ऑयल डील की। इसमें भारत सरकार को १३ करोड़ का चूना लगा। माना गया इस घपले में इंदिरा और संजय गांधी का भी हाथ है।
अंतुले ट्रस्ट
१९८१ में महाराष्ट्र में सीमेंट घोटाला हुआ। तत्कालीन महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एआर अंतुले पर आरोप लगा कि वह लोगों के कल्याण के लिए प्रयोग किए जाने वाला सीमेंट, प्राइवेट बिल्डर्स को दे रहे हैं।
एचडीडब्लू दलाली (१९८७)
जर्मनी की पनडुब्बी निर्मित करने वाले कंपनी एचडीडब्लू को काली सूची में डाल दिया गया। मामला था कि उसने २० करोड़ रुपये बैतोर कमिशन दिए हैं। २००५ में केस बंद कर दिया गया। फैसला एचडीडब्लू के पक्ष में रहा।
बोफोर्स घोटाला
१९८७ में एक स्वीडन की कंपनी बोफोर्स एबी से रिश्वत लेने के मामले में राजीव गांधी समेत कई बेड़ नेता फंसे। मामला था कि भारतीय १५५ मिमी. के फील्ड हॉवीत्जर के बोली में नेताओं ने करीब ६४ करोड़ रुपये का घपला किया है।
सिक्योरिटी स्कैम (हर्षद मेहता कांड)
१९९२ में हर्षद मेहता ने धोखाधाड़ी से बैंको का पैसा स्टॉक मार्केट में निवेश कर दिया, जिससे स्टॉक मार्केट को करीब ५००० करोड़ रुपये का घाटा हुआ।
इंडियन बैंक
१९९२ में बैंक से छोटे कॉरपोरेट और एक्सपोटर्स ने बैंक से करीब १३००० करोड़ रुपये उधार लिए। ये धनराशि उन्होंने कभी नहीं लौटाई। उस वक्त बैंक के चेयरमैन एम. गोपालाकृष्णन थे।
चारा घोटाला
१९९६ में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव और अन्य नेताओं ने राज्य के पशु पालन विभाग को लेकर धोखाबाजी से लिए गए ९५० करोड़ रुपये कथित रूप से निगल लिए।
तहलका
इस ऑनलाइन न्यूज पॉर्टल ने स्टिंग ऑपरेशन के जारिए ऑर्मी ऑफिसर और राजनेताओं को रिश्वत लेते हुए पकड़ा। यह बात सामने आई कि सरकार द्वारा की गई १५ डिफेंस डील में काफी घपलेबाजी हुई है और इजराइल से की जाने वाली बारक मिसाइल डीलभी इसमें से एक है।
स्टॉक मार्केट
स्टॉक ब्रोकर केतन पारीख ने स्टॉक मार्केट में १,१५,००० करोड़ रुपये का घोटाला किया। दिसंबर, २००२ में इन्हें गिरफ्तार किया गया।
स्टांप पेपर स्कैम- २०,००० करोड़
यह करोड़ो रुपये के फर्जी स्टांप पेपर का घोटाला था। इस रैकट को चलाने वाला मास्टरमाइंड अब्दुल करीम तेलगी था।
सत्यम घोटाला
२००८ में देश की चौथी बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी सत्यम कंप्यूटर्स के संस्थापक अध्यक्ष रामलिंगा राजू द्वारा १४००० करोड़ रूपये का घोटाले का मामला सामने आया। राजू ने माना कि पिछले सात वर्षों से उसने कंपनी के खातों में हेरा फेरी की।
मनी लांडरिंग
२००९ में मधु कोड़ा को चार हजार करोड़ रुपये की मनी लांडरिंग का दोषी पाया गया। मधु कोड़ा की इस संपत्ति में हॉटल्स, तीन कंपनियां, कलकत्ता में प्रॉपर्टी, थाइलैंड में एक हॉटल और लाइबेरिया ने कोयले की खान शामिल थी।
बोफोर्स घोटाला - ६४ करोड़ रु.
मामला दर्ज हुआ - २२ जनवरी, १९९० सजा - किसी को नहीं वसूली - शून्य
एच.डी. डब्ल्यू सबमरीन- ३२ करोड़ रु.
मामला दर्ज हुआ - ५ मार्च, १९९० (सीबीआई ने अब मामला बंद करने की अनुमति मांगी है।) सजा - किसी को नहीं, वसूली - शून्य
(१९८१ में जर्मनी से ४ सबमरीन खरीदने के ४६५ करोड़ रु. इस मामले में १९८७ तक सिर्फ २ सबमरीन आयीं, रक्षा सौदे से जुड़े लोगों द्वारा लगभग ३२ करोड़ रु. की कमीशनखोरी की बात स्पष्ट हुई।)
स्टाक मार्केट घोटाला- ४१०० करोड़ रु.
मामला दर्ज हुआ - १९९२ से १९९७ के बीच ७२, सजा - हर्षद मेहता (सजा के १ साल बाद मौत) सहित कुल ४ को, वसूली - शून्य
(हर्षद मेहता द्वारा किए गए इस घोटाले में लुटे बैंकों और निवेशकों की भरपाई करने के लिए सरकार ने ६६२५ करोड़ रुपए दिए, जिसका बोझ भी करदाताओं पर पड़ा।)
एयरबस घोटाला- १२० करोड़ रु.
मामला दर्ज हुआ - ३ मार्च, १९९०, सजा - अब तक किसी को नहीं, वसूली - शून्य, (फ्रांस से बोइंग ७५७ की खरीद का सौदा अभी भी अधर में, पैसा वापस नहीं आया)
दूरसंचार घोटाला-१२०० करोड़ रुपए
मामला दर्ज हुआ - १९९६, सजा - एक को, वह भी उच्च न्यायालय में अपील के कारण लंबित, वसूली - ५.३६ करोड़ रुपए
(तत्कालीन दूरसंचार मंत्री सुखराम द्वारा किए गए इस घोटाले में छापे के दौरान उनके पास से ५.३६ करोड़ रुपए नगद मिले थे, जो जब्त हैं। पर गाजियाबाद में घर (१.२ करोड़ रु.), आभूषण (लगभग १० करोड़ रुपए) बैंकों में जमा (५ लाख रु.) शिमला और मण्डी में घर सहित सब कुछ वैसा का वैसा ही रहा। सूत्रों के अनुसार सुखराम के पास उनके ज्ञात स्रोतों से ६०० गुना अधिक सम्पत्ति मिली थी।)
यूरिया घोटाला- १३३ करोड़ रुपए
मामला दर्ज हुआ - २६ मई, १९९६, सजा - अब तक किसी को नहीं, वसूली - शून्य
(प्रधानमंत्री नरसिंहराव के करीबी नेशनल फर्टीलाइजर के प्रबंध निदेशक सी.एस.रामाकृष्णन ने यूरिया आयात के लिए पैसे दिए, जो कभी नहीं आया।)
सी.आर.बी- १०३० करोड़ रुपए
मामला दर्ज हुआ - २० मई, १९९७, सजा - किसी को नहीं, वसूली - शून्य
(चैन रूप भंसाली (सीआरबी) ने १ लाख निवेशकों का लगभग १ हजार ३० करोड़ रु. डुबाया और अब वह न्यायालय में अपील कर स्वयं अपनी पुर्नस्थापना के लिए सरकार से ही पैकेज मांग रहा है।)
केपी- ३२०० करोड़ रुपए
मामला दर्ज हुआ - २००१ में ३ मामले, सजा - अब तक नहीं, वसूली - शून्य
(हर्षद मेहता की तरह केतन पारेख ने बैंकों और स्टाक मार्केट के जरिए निवेशकों को चूना लगाया।)
UP Food Grain Scam 2003, ३५००० हजार करोड़
झारखण्ड चीकतशालय धन कांड २००९
मधु कोड़ा खदान घोटाला २००९
ताज कारीडोर घोटाला उत्तर प्रदेश २००१
2G स्पेक्ट्रम घोटाला - १ लाख ७६ हजार करोड़ का ।
कामन वेल्थ घोटाला - ७०,००० करोड़
खेल के नाम पर ये घोटाले हुए ।
आदर्श हाऊसिंग सोसाईटी घोटाला
हाऊसिंग लोन घोटाला
बेलेकेरिया पोर्ट घोटाला कर्नाटका
कर्नाटका वक्फ बोर्ड घोटाला २००,००० करोड़
नेशनल रुरल हेल्थ मिसन कांड उत्तर प्रदेश १०,००० हजार करोड़
कोयला घोटाला २०१२
१८५,५९१,३४ करोड़ का घोटाला
इन सभी घोटालो पर ध्यान दिया जाय तो किसी भी पार्टी कि छवी साफ़ नज़र नहीं आती, सभी घोटालो के कीचड़ में आकंठ डूबे हुए है । ऐसे में पक्ष और विपक्ष के नेता एक दुसरे पर कीचड़ उछाल रहे है तो इसमें हैरानी कि बात नहीं है और भारत कि जनता कि यह बिडम्बना है कि उसके सामने यह सब हो रहा है और वह मूक दर्शक बनी अपने संपत्ति को लुटवा रही है।
यानी कि अब राजनेताओं में समाज सेवा न होकर केवल भारतीय सम्पतियों को लुटने का काम रह गया है।

Monday, November 14, 2011

क्या यही लोकतंत्र है ?

भारत एक लोकतान्त्रिक देश है और लोकतंत्र में जनता के द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि बहुमत के हिसाब से ही केंद्र या राज्य में अपनी सरकार बनाते है। सरकार का कार्य होता है वह राज्य या देश कि जनता के हितो का ध्यान रखे जैसे स्वतन्त्रता कि आज़ादी, अराजकता और मुनाफाखोरी देश में ना फैले, जनता कि जान और माल कि रक्षा, देश कि सीमाएं पूरी तरह चाक चौकस बंद हो ताकि बाहरी आक्रमण देश पर हो सके। अगर सरकार इन सभी कार्यो का निर्वाह पूरी ईमानदारी से करती है तो वह एक लोकतान्त्रिक सरकार है और वह अपने जनता के विश्वासों पर खरा उतरती है।
लेकिन वर्तमान में केंद्र कि सरकार क्या इन सभी बातों पर ध्यान दे रही है ? शायद नहीं, अगर ध्यान देती तो आज देश में जीस हिसाब से महंगाई बढ रही है क्या वह अराजकता और मुनाफाखोरी नहीं है ? क्या उद्योगपतियों के हितो का ध्यान रखना और आम जनता के हितो का ध्यान रखना, क्या यह जनतंत्र है ? पेट्रोल के दामो में बेतहासा बढ़ोतरी कर सरकार जनता को क्या बताना चाहती है। पेट्रोल कम्पनियां जरा सा नुकसान में जाती है तो वह केंद्र सरकार पर दाम बढ़ाने का दबाव बनाने लगती है और केंद्र सरकार उनके दबाव में आकर दाम बढ़ाने कि अनुमति दे देती है क्या यह एक जनतांत्रिक सरकार है ? अगर जनतांत्रिक सरकार होती तो कंपनियों को यह हिदायत करती कि पेट्रोल का दाम नहीं बढेगा बल्कि कम्पनियाँ अपने खर्चे में कमियां लाये, लेकिन केंद्र कि वर्तमान सरकार जनता के हितो का ध्यान रख उद्योगपतियों का ध्यान रखी जिसका नतीजा हुआ कि पेट्रोल के दामो में बार-बार इजाफा होता गया और महंगाई भी उसी अनुपात में बढती गई। लेकिन सरकार को इससे कोई मतलब नहीं, महंगाई बढती है तो बढे। केंद्र कि सरकार ने प्रतिदिन ३२/- रुपया कमाने वाले को अमीर मानती है यानि गरीबी रेखा से ऊपर है वह आदमी लेकिन उस आदमी कि औकात इतनी भी नहीं है कि वह एक लीटर पेट्रोल खरीद सके ? इस देश का दुर्भाग्य ही है कि ३२/- रुपया कमाने वाला व्यक्ति अमीर तो है लेकिन एक लीटर पेट्रोल खरीदने कि उसकी हैसियत नहीं है। क्या यह सरकार कि गलत नीतियों का परिणाम नहीं है।
हमारे देश के प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह एक कुशल राजनेता के साथ-साथ एक अच्छे विद्वान्, अर्थशास्त्री और विचारक भी है। एक मजे हुए अर्थशास्त्री के रूप में उनकी ज्यादा पहचान है। अपने कुशल और ईमानदार छवि कि वज़ह से सभी राजनैतिक दलों में उनकी अच्छी साख है। लेकिन एक कुशल समाजसेवी नहीं है। वह देश कि अर्थव्यवस्था को ऊँचाइयों पर ले जा तो सकते है जिसका फायदा उद्योगपतियों और कुछ खास मुट्ठी भर लोगो को होगा। क्यों कि वह अर्थशास्त्री है और हर चीज में मुनाफा देखते है क्या देश में बढ़ रही गरीबी और महंगाई में भी मुनाफा ही देख रहे है ? देश कि जनता आज परेशान हाल है सौ रुपये में हम एक झोला सब्जी भी खरीद कर नहीं ला सकते और सरकार कहती है कि बत्तीस रुपया कमाने वाला व्यक्ति अमीर है। जनता के पैसो पर राज करने वाले सत्ता पर आसीन राजनेतावों जनता कि आवाज़ को पहचानो उसकी नब्ज को टटोलो जनता से तुम हो तुमसे जनता नहीं है उसके पैसे को लूटना बंद करो, महंगाई पर अंकुश लगाओ, देश में बढ़ रही मुनाफाखोरी और अराजकता पर रोक लगाओ, उद्योगपतियों पर भी अंकुश लगाओ वह उत्त्पादन पर ज्यादा मुनाफाखोरी ना करे। कही ऐसा ना हो कि जनता ही तुमको लूट ले क्यों कि भारतीय जनता कि सहनशीलता कि एक सीमा है कही ऐसा ना हो कि अपना खज़ाना भरने के चक्कर में तुम उस सीमा को पार कर जाओ जहाँ भारतीय जनता अपनी सहनशीलता खो दे। फिर क्या हस्र होगा, इतिहास इसका गवाह है।
हमारे अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री जिनकी ईमानदारी कि कसमे खाई जा सकती है क्यों कि सभी राजनैतिक पार्टियों के लोग इनको ईमानदार ही कहते है। इन्ही के मंत्रिमंडल में आसीन भूतपूर्व संचार मंत्री .राजा ने 2G स्पेक्ट्रम घोटाल इतना बड़ा किया जो अभीतक के घोटालो में सरताज है। यह घोटल एक लाख छिहत्तर हजार करोड़ का है जो देश कि आज़ादी के बाद से अभीतक के घोटालो में सबसे बड़ा घोटाला है। अभी श्री .राजा तिहाड़ जेल कि शोभा बढ़ा रहे है।
हमारे देश के भूतपूर्व खेल मंत्री श्री सुरेश कलमाड़ी जी कामनवेल्थ खेल में घोटालो का ऐसा खेल खेला जो सत्तर हजार करोड़ का था अब ये तिहाड़ जेल में कोई और खेल खेलने के मनसूबे तैयार कर रहे है।
महारास्ट्र के भूतपूर्व मुख्यमंत्री श्री अशोक चौव्हान ने तो वो कारनामे किये जो बे मिसाल है वो कारगिल के शहीदों के लिए बने आवास में ही उलट-फेर कर दिए। यानि कि मुर्दे के शारीर से ही कफ़न छीन लिए। अब ऐसे राजनेताओं से क्या उम्मीद कर सकते है और मनमोहन सिंह को कैसे ईमानदार कहा जा सकता है क्यों कि ये सभी घोटाले उनके नाक के नीचे हुई है।
ये राजनेता किस मिट्टी या धातु के बने है जो कितना भी खा ले है फिर भी पेट नहीं भरता है। इनकी तुलना अगर भिखारियों से कि जाय तो ज्यादा तार्किक लगता है, क्यों कि भिखारियों को आप कितना भी खिला दो लेकिन उनका पेट नहीं भरता, वही हाल हमारे राजनेताओं का है, और ऐसे ही नेता इस देश कि बाग़ डोर सम्हाले बैठे है।
अब हमारे देश कि सीमाएं कितनी चाक चौकस बंद है यह भी देख लीजिये १३ दिसम्बर २००१ को कुछ बन्दुकधारी आतंकवादी हमारे लोकतंत्र कि मंदिर संसद पर हमला कर देते है, गनीमत है कि हमारे सभी सांसद और मंत्री सही सलामत बच जाते है, हाँ कुछ पुलिसकर्मी जख्मी होते है और कुछ कि जान जाती है। इस घटना को अंजाम देने वाला मुज़रिम मिलने के बाद भी अभीतक सरकारी मेहमान बना जेल में रोटियां तोड़ रहा है।
अब भारत कि आर्थिक राजधानी मुंबई पर २६ नवम्बर २००८ को समुन्द्र के रास्ते आतंकवादी आते है और मुंबई महानगरी में AK-47 से निरीह और निहत्थे नागरिको पर गोलियों कि बौछार कर देते है। इस हमले में बहुत से निर्दोष मारे जाते है। क्या हमारी देश कि सीमाएं पूरी तरह चाक चौकस बंद है ? शायद नहीं। ऐसी आतंकवादी घटनाएँ हर साल इस देश में घटती है चाहे वो बम ब्लास्ट हो सीरियल ब्लास्ट हो या गोलियों कि बौछार हो मारे तो निरीह प्राणी ही जाते है और हमारा देश वैसे आतंकवादियों को पकड़ने के बाद भी सरकारी मेहमान बना कर जेलों में बंद रखती है और उसके हिफाज़त के लिए जनता का करोडो रुपया उस पर खर्च करती है क्या ऐसे आतंकवादियों को जो सरेआम कत्लेआम किये है क्या इनको भी सरेआम फांसी नहीं दे दी जानी चाहिए ? इनसे सहानभूति कैसी ?
अगर आप इन राजनेताओं से अच्छे कि उम्मीद करते है तो यह आपकी भूल है, यह देश इन मुट्ठी भर राजनेताओं का नहीं है बल्कि यह देश आपका अपना है इसे अच्छा या बुरा बनाना आपके हाथो में है। प्रजातंत्र में जनता अगर खुशहाल है तो देश चहुओर तरक्की करता है अगर जनता दुखी है तो देश पिछड़ता है

Wednesday, November 2, 2011

अन्ना टीम को बदनाम कर केंद्र में बैठी सरकार देश से क्या कहना चाह रही है .

अन्ना टीम के सदस्यों को बदनाम करने कि चाल चल कर केंद्र में आसीन कांग्रेस कि सरकार (कांग्रेस कि सरकार कहना इसलिए उपयुक्त है क्यों कि यूपीए कि सरकार में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी है तथा सभी मुख्य विभाग अगर कुछ को छोड़ दिया जाय तो कांग्रेस के पास ही है।) आखिर भारतीय जनता को क्या बताना चाहती है ? क्या वह यह बताना चाहती है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ वही व्यक्ति आवाज़ उठा सकता है जिसके पुरे जीवन में कभी किसी प्रकार का झूठा या सही कभी कोई आरोप न लगे हों ? ऐसा व्यक्ति तो शायद मिलना मुश्किल ही होगा, क्यों कि वह इंसान ही होगा, भगवान तो आयेगें नहीं, फिर वैसे इंसान को कहाँ तलाश किया जाय। भगवान भी जब इंसान के रूप में इस मृत्युलोक में जन्म लिए है तो उन पर भी आरोप लगे है चाहे त्रेतायुग में रामचंद्र रहे हो या द्वापरयुग में जन्मे श्री कृष्ण। हम सभी तो कलयुग में जी रहे है जिसमे कल, बल और छल ही प्रमुख है अब ऐसे कलयुग में हम कहाँ से वैसे इंसान को लाये जो ऊपर से नीचे तक साफ़, सुथरा और स्वच्छ छवि का हो जो भारत में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठा सके और केंद्र में बैठी कांग्रेस कि सरकार उसका इतिहास, भूगोल खघालने के बाद भी कोई नुक्ताचीनी न निकाल सके ? ऐसा इंसान कहाँ से लाया जाय ? क्यों कि इस भौतिक युग में कांग्रेस जिस इंसान कि उम्मीद कर रही है वैसा इंसान तो मिलना संभव नहीं है और अगर वैसा इंसान नहीं मिलेगा तो फिर भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाने का हक भी नहीं बनता है, क्यों कि कांग्रेस तो बार-बार यही कह रही है चाहे वो कांग्रेस के शिखंडी दिग्विजय सिंह से कहवाये या कोई और प्रवक्ता से। दिग्विजय सिंह एक वरिष्ट कांग्रेसी नेता है उनके बयानों को सुनकर लगता नहीं कि जो शब्द वो बोल रहे है वो शब्द उनके अपने हो, आखिर कबतक ऐसे बयनो को बोल-बोल कर अपनी खिल्ली उडवाते रहेगें ? अब तो लोग उनके बयानों को सुनना भी पसंद नहीं करते है।
आज अन्ना हजारे जनता कि आवाज़ बन गए है क्या कांग्रेस या उसकी सहयोगी पार्टियाँ इन बातो को नहीं समझती है या राजनीती कि कोई और खेल खेली जा रही है। जनता सरकार से क्या मांग कर रही है, यही न कि लोकपाल कानून बनाया जाय, क्यों कि भारतीय जनता भ्रष्टाचार और महंगाई से त्रस्त हो चुकी है इसलिए इसपर अंकुश लगाने के लिए कानून बनाया जाय, वह अपनी चुनी हुई सरकार से लोकपाल कानून बनाने कि मांग कर रही है और सरकार है कि जनता कि बात ही नहीं समझ रही है। केंद्र कि सरकार क्या वह भारतीय जनता कि सहनशीलता देखना चाहती है या वह यह समझ रही है कि अन्ना टीम को तोड़ दो फिर कोई भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाएगा। शायद सरकार यह गलत सोंच रही है। कांग्रेस के ही प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गाँधी ने भी एक बार जनता कि आवाज़ दबाने के लिए पुरे देश में इमरजेंसी लगा दी थी और विपच्छ के जितने भी नेता थे सभी को जेल में डाल दिया गया था जिसका हस्र यह हुआ कि कांग्रेस को पुरे भारत से अपनी सत्ता से हाथ धोना पड़ा था। समय रहते केंद्र कि सरकार को यह समझना चाहिए कि यह लड़ाई अन्ना बनाम कांग्रेस नहीं है बल्कि जनता बनाम कांग्रेस है।