Wednesday, October 27, 2010

मतगणना बाद बिहार कि किस्मत का फैसला

मतगणना के बाद बिहार कि किस्मत का फैसला आने वाला चुनाव परिणाम तय करेगा। क्यों कि बिहार में दो ही पार्टियों के बीच सीधा संघर्ष है।
- एन डी जिसमे जनता दल यु और बीजेपी का गटबंधन है।
- आरजेडी और लोजपा का गटबंधन है।
कांग्रेस पार्टी तीसरे स्थान पर रहेगी और वह बिहार में अपनी उपस्थिति दर्ज कराएगी।
बिहार विधान सभा चुनाव २०१० विकाश बनाम जातिवाद का सीधा संघर्ष है। चुनाव परिणाम आने के बाद ही यह तय होगा कि बिहार में विकाश कि जीत हुई या जातिवाद कि।
अगर विकाश कि जीत होती है तो एन डी ए कि सरकार फिर से सत्ता में आएगी और पिछले पांच सालो में जो विकाश कार्य हुए है वह और आगे बढेगा तथा बाहरी उद्योगपतियों का आने का रास्ता प्रसस्त होगा। तब अगले पाँच साल में बिजली कि समस्या, रोजगार कि समस्या, विद्यालय एवं महाविद्यालय कि समस्या, सरकारी हस्पतालों कि समस्या, गाँव-गाँव तक सड़के पहुँचाने कि समस्या, ला एंड ऑडर और दुरुस्त करने कि समस्या तथा आवागमन के रास्ते को और सुचारू गति प्रदान करने कि समस्या से बिहार को पूरी तरह से न भी सही लेकिन निजाद मिलेगी।

अगर आरजेडी और लोजपा कि सरकार बनती है तो जातिवाद कि जीत होगी। शुरू के दौर में सब कुछ ढहर सा जायेगा और लोग सरकार कि नीतियों का आकलन करेंगे, शायद इस आकलन में डेढ़ या दो साल का समय लग जाये। अगर सरकार कि नीतियाँ जनता के प्रति, राज्य के प्रति, विकाश के प्रति माकूल रहा तो फिर जनता लालू प्रसाद और रामविलास पासवान के प्रति अपने विश्वास को बना पायेगी। अगर लालू प्रसाद और रामविलास पासवान जनता को जो उम्मीदे दिए है उस पर सही नहीं उतरते है तो यह लालू प्रसाद और रामविलास पासवान के लिए आंखरी चुनाव साबित होगा। पिछले पंद्रह साल तक आरजेडी कि सरकार बिहार कि सत्ता में रही है लेकिन बिहार को कोई दिशा नहीं दे पाई थी बल्कि इनके शासन-काल में बिहार कि दशा और ख़राब हुई। इस चुनाव में अगर लालू प्रसाद और रामविलास पासवान कि पार्टी बिहार कि सत्ता में आती है तो शायद अपने पिछले गलतियों से सबक लेते हुए आगे विकाश के कार्यों पर ध्यान देंगे तथा बिहार को एक सही दिशा देंगे।
आज़ादी के बाद से बिहार कि सत्ता चालीस वर्षो तक कांग्रेस के हाथ में रही लेकिन विकाश के नाम पर बिहार बाटम लाइन पर रहा और बिहार में जो विकाश होना चाहिए वह नहीं हुआ। कांग्रेस के शासन से त्रस्त होकर यहाँ कि जनता श्री लालू प्रसाद के पक्छ में अपना जनादेश दिया। लालू प्रसाद पंद्रह साल तक बिहार कि सत्ता में रहे लेकिन इन्हों ने भी बिहार के विकाश पर कोई ध्यान नहीं दिया, बल्कि इनके शासन काल में बिहार कि स्थिति और ख़राब हुई। लालू प्रसाद के शासन से त्रस्त होकर बिहार कि जनता एनडीए (जनता दल यु + बीजेपी) को अपना जनादेश दिया। बिहार में एनडीए कि सरकार सत्ता में आई और मुख्यमंत्री श्री नितीश कुमार बने। सत्ता में आने के साथ ही इन्हों ने बिहार के ला एंड ऑडर को दुरुस्त किया, कानून का राज कायम होने से यहाँ के वाशियों को सकून मिला। फिर उन्हों ने पूरी तरह बर्बाद हो गई बिहार कि सड़कों पर ध्यान दिया, सड़कें बहुत हद तक अच्छी हुई तथा कुछ नई सड़कें भी बनी। जजर हालत में पहुँच चुकी सरकारी हस्पतालों को बहुत हद तक ठीक किया तथा डाक्टरों कि उपस्थिति अनिवार्य हुई जिससे मरीजों कि तायदात में वृद्धि हुई साथ ही मुफ्त कि दवाएं भी मिलने लगी। बिहार के स्कूलों में लड़के लड़कियों कि संख्या में कुछ ज्यादा ही वृद्धि हुई क्यों कि सरकार के तरफ से मुफ्त में साईकिल एवं स्कुल यूनिफार्म बांटे गए।

सरकार किसी कि भी बने बिहार कि समस्याओं से उसे रु-बरु होना पड़ेगा और उसके लिए पहल करनी पड़ेगी :- ला-एंड- आडर का और दुरुस्त होना, विद्यालय, महाविद्यालय को बहुतायात में खोलना पड़ेगा ताकि बिहारी बच्चे उच्च शिक्झा के लिए दुसरे राज्यों में न जाएँ। बिजली कि समस्या से बिहार को उबारना पड़ेगा ताकि कल-कारखाने खुल सके और लोंगो को रोजगार मुहैया हो सके। कृषि को उद्योग का दर्जा देना पड़ेगा जिससे किसान संपन्न हो सके और मजदूरों का पलायन रुक सके। सड़कें गाँव-गाँव तक बनानी पड़ेगी ताकि लोंगों का आवा-गमन सुचारू रूप से हो सके। उत्तर बिहार में हर साल जो बाढ़ के रूप में कहर आता है और गाँव का गाँव उस बाढ़ में बह जाता है उस बाढ़ के पानी को रोकने के लिए डैम बनवाने पड़ेंगे जिससे पन-बिजली का उत्पादन भी होगा और बाढ़ का पानी खेंतो में सिचाई के काम भी आएगा। गाँव-गाँव तक सरकारी हस्पताल खोलने होंगे ताकि गाँव का कोई भी व्यक्ति बिना इलाज के न मर सके।
बिहार में जब रोजगार मिलने लगेगा तो लोंगो का पलायन अपने-आप रुक जायेगा, हर माह जो करोडो रुपये दुसरे राज्यों को चले जाते है उच्च शिझा के नाम पर वह पैसा बिहार में ही रहेगा, बिहार में सम्पन्नता आएगी, बिहार आत्म निर्भर बनेगा, मावोवाद भी धीरे-धीरे ख़त्म हो जायेगा तथा मावोवादी भी आम लोगों कि तरह जिंदगी बसर करने लगेंगे। यह सब संभव है बसरते कि इस राज्य के बनने वाले मुखिया इन बातो पर अमल करें।

Monday, October 25, 2010

भीड़ जुटाता उड़न खटोला (बिहार विधान सभा चुनाव)

बिहार विधान सभा चुनाव में उड़न खटोला (हेलीकाप्टर) का प्रयोग धड़ल्ले से सभी पार्टियाँ अपने चुनाव प्रचार में कर रही है, चाहे वो कांग्रेस पार्टी हो या राजद, लोजपा हो या बीजेपी, जनता दल यू हो या बसपा ये सभी पार्टियों ने चुनाव से पहले ही चुनाव प्रचार के लिए उड़न खटोले (हेलीकाप्टर) कि व्यवस्था या बुकिंग कर लिए थे। हेलीकाप्टर के प्रयोग से हमारे राजनेताओं को दो फायदे मिले है , पहला .... ज्यादा से ज्यादा सभाओं को संबोधित करने का समय मिला, दूसरा.... ग्रामीण छेत्रो में हेलीकाप्टर देखने के लिए आये लोंगो की भीड़ क्यों की आज हेलीकाप्टर भीड़ जुटाने का एक सशक्त माध्यम बन कर उभरा है। आज के नेतावों में अब आकर्षण नहीं रहा जो भीड़ जुटा सके। पहले नेता के नाम पर लोंगो की भीड़ जुटती थी और वो नेता मोटर गाड़ी से यात्रा कर अपनी सभाओ को संबोधित करते थे ऐसा नहीं की आज विधान सभा का छेत्रफल बडा हो गया है या भारत की सीमाएं बढ़ गई है जो चुनाव प्रचार के लिए हेलीकाप्टर (उड़न खटोला) की जरुरत बनी है बल्क्ति हुआ ये है की ना ही विधान सभा का छेत्रफल बढ़ा है ना ही भारत की सीमाएं बढ़ी है बल्कि हमारे राज नेताओं ने अपने आकर्षण को खो दिया है अब उनमे वो आकर्षण या भाषण में वह दम नहीं रहा जो लोंगो को प्रभावित कर सके या उनके नाम पर भीड़ जुट सके आज यही कारण है कि सभी पार्टियों को लोंगो की भीड़ जुटाने के लिए हेलीकाप्टर (उड़न खटोला) ,फिल्म अभिनेता या क्रिकेट खिलाडी कि जरुरत पड़ती है ताकि ज्यादा से ज्यादा भीड़ को जुटाया जा सके
अब वैसे भीड़ को जुटाने से फायदा क्या जो हेलीकाप्टर देखने या फिल्म अभिनेता को देखने आई है हेलीकाप्टर देखने वाली भीड़ हेलीकाप्टर देखेगी वो नेता द्वारा दिए हुए भाषण पर ध्यान नहीं देगी हाँ फिल्म अभिनेताओं से एक फायदा और होता है उनके नाम पर लोंगो कि भीड़ भी जुटती है और उनके द्वारा दिए भाषण को जनता सुनती भी है लेकिन अभिनेतावों द्वारा दिए हुए भाषण का छनिक ही प्रभाव लोंगो के मन मस्तिष्क पर रहता है क्यों कि वह राजनेता नहीं है बल्कि फिल्म अभिनेता है
हमारे राजनेता बिहार जैसे गरीब प्रदेश में हेलीकाप्टर (उड़न खटोला) का इस्तमाल कर वैसे गाँव के लोंगो के बीच भाषण देने पहुंचते है जहाँ सही तरीके से तन पर कपडा नहीं है हीं पेट में अन्न का दाना, मेहनत मजदूरी कर एक वक्त का खाना जुटा पाना जहाँ मुस्किल है वैसे जगहों पर ये राजनेता हेलीकाप्टर का इस्तेमाल करते है। क्या ये गरीबो का या गरीबी का माखौल नहीं उड़ा रहे है। यह गरीबी और पिछड़ापन ही है जहाँ कोसो दूरी तय कर गाँव के लोग हेलीकाप्टर देखने आते है और विडम्बना यह की भीड़ को देख राजनेता यह समझते है कि भाषण सुनने के लिए लोग आये है।

Saturday, October 23, 2010

आपन डफली आपन राग

बिहार विधान सभा चुनाव प्रचार में सभी पार्टियों के नेता अपने-अपने तरीके से अपने पार्टी कि बाते जनता के सामने रखी है।

आरजेडी सुप्रीमो श्री लालू प्रसाद.... जनता कि सरकार जनता के लिए बनाने कि बात करते है तथा पिछले पंद्रह सालों में जो विकाश का काम बिहार में नहीं किये थे वो चुनाव में जितने के बाद विकाश करने कि बात करते है इसीलिए अपने भाषण में यह बार-बार कह रहे है .... जैसे मैंने भारतीय रेल को चमकाया और दुनियाँ देखती रह गई उसी तरह मै बिहार को चमकाउंगा। शायद लालू जी अपने पिछली गलतियों से तौबा कर लिए है इसीलिए बिहार में विकाश कि बात करते है। "अब पछताना क्या जब चिड़ियाँ चुंग गई खेत"

लोजपा सुप्रीमो श्री रामविलास पासवान .... ये भी बिहार में विकाश करने कि बात कहते है साथ ही जनता के बीच अपने दिए गए भाषणों में बहुत सारी उम्मीदे दे रहे है जैसे - पच्चास हजार रुपया हर गरीब व्यक्ति को दिया जायेगा जिसका सूद नहीं लगेगा, हर गरीब व्यक्ति को घर बनाने के बारह डिसमिल जमीन मुफ्त में दिया जायेगा तथा बी तक कि पढाई और पुस्तक मुफ्त में दिया जायेगा। इनके भाषण में केवल आश्वाशन ही आश्वाशन है।

जनता दल यू के श्री नितीश कुमार (वर्तमान मुख्यमंत्री बिहार) .... ये केवल बिहार के विकाश कि बात कर रहे है। जनता के बीच अपने दिए भाषणों में पांच साल तक अपने द्वारा किये हुए कामो का मजदूरी (वोट) मांग रहे है। हाँ यह सही है कि ये मजदूरी (वोट) पाने के हकदार है, क्यों कि पूरी तरह बर्बाद बिहार को इन्हों ने आबाद किया है, विकाश कि गाड़ी को पटरी पर ला दिए है अब इसका दौड़ने का समय है और वह अगला पांच साल होगा जिसमे विकाश कि गाड़ी दौड़ेगी। इसलिए अगर विकाश कि गाड़ी को दौड़ना है तो नितीश कुमार को मजदूरी (वोट) देनी ही होगी।

भाजपा के श्री सुशिल कुमार मोदी (वर्तमान उप-मुख्यमंत्री बिहार) ....... ये भी बिहार में विकाश कि बात कर रहे है या भजपा के जितने भी नेता बिहार रहे है वो जनता के बीच अपने भाषण में केवल विकाश कि बात कहते है, क्यों कि जे डी यू और बीजेपी ने मिल कर इस विकाश कि गाड़ी को आगे बढाया है। इसलिए बीजेपी और जे डी यू ये दोनों पार्टियाँ मजदूरी (वोट) पाने का हक रखती है। इसलिए विकाश कि गाड़ी को दौड़ाने के लिए इनको मजदूरी (वोट) देना ही पड़ेगा।

कांग्रेस पार्टी (वर्तमान में केंद्र कि सत्ता पर आशिन) ..... यह पार्टी भारत कि सबसे पुरानी राजनितिक पार्टी है भारत के बहुत से राज्यों में इसकी सरकार है तथा केंद्र में भी इसी पार्टी का शासन है। इस पार्टी के बड़े से बड़ा नेता अपने भाषणों में विकाश कि कोई बात नहीं कर रहे है ना ही जनता के बीच कोई आश्वाशन दे रहे है ना ही यह बता रहे है कि बिहार कि सत्ता में आने के बाद वह बिहार को किस रास्ते पर ले जायेंगा , चाहे वो कांग्रेस अध्यच्छ श्री मति सोनिया गाँधी हो या उनके पुत्र राहुल गाँधी, प्रधान मंत्री श्री मनमोहन सिंह या दिल्ली कि मुख्यमंत्री शिला दीक्षित, सचिन पायलट, जायसवाल साहब ये सभी राजनेता मुद्दा विहीन भाषण दे रहे है, अगर इनके पास कोई मुद्दा है तो बस एक मुद्दा है ..... केंद्र के पैसे से बिहार का विकाश हुआ, केंद्र के पैसे को नितीश कुमार अपना पैसा बता रहे है।

लगता है केंद्र अलग है और बिहार अलग है या बिहार भारत का अंग नहीं है या बिहार का पैसा टैक्स के रूप में केंद्र को नहीं जाता है जो हाय तौबा ये लोग मचाये है कही यह तो नहीं ..... केंद्र द्वारा दिए हुए पैसे को कांग्रेस अपना पैसा तो नहीं समझ रही है जो कांग्रेस के हर नेता अपने भाषण में पैसे का ही जिक्र कर रहा है

खैर कुछ भी हो बिहार में विकाश तो हुआ है चाहे वह बिहार के पैसे से हुआ हो या केंद्र के पैसे से हुआ हो, क्यों कि आज हर पार्टी के नेता यह स्वीकार कर लिए है कि बिहार में विकाश हुआ है। तो क्यों नहीं सभी पार्टियाँ एक साथ मिल कर बिहार में विकाश कि गाड़ी को और तेज रफ़्तार देने में मदद करे। एक दुसरे का टांग खीचने से राज्य का या देश का विकाश नहीं हो सकता है। अगर कोई व्यक्ति अच्छा काम करता है तो उसे और बढ़ावा देना चाहिए ताकि वो और अच्छा काम करे।

Friday, October 22, 2010

अब विकाश कि लहर चलने वाली है

बिहार का चुनाव क्या हो रहा है सभी छोटे बड़े राजनेताओं कि जुबान पर बस विकाश का ही मुद्दा छाया हुआ है अब हर नेता अपनी जनसभा में केवल विकाश कि बात कर रहा है चाहे वह कांग्रेस हो, आर.जे.डी हो, लोजपा हो, बीजेपी हो, जे.डी.यू हो या कमनिष्ट पार्टी हो, सभी एक ही राग अलाप रहे है और वह है "विकाश"
देर से ही सही अब राजनीतिक पार्टियों को यह लगने लगा है कि भारत कि जनता को बहुत दिनों तक बेवकूफ बना लिया है चाहे वह जाती के नाम हो, धर्म के नाम पर हो या गरीबी के नाम पर हो, लेकिन अब भारतीय जनता को ये राज नेता और बेवकूफ नहीं बना सकते क्यों कि आज कि ७० फीसदी नौजवान पीढ़ी पढ़ी-लिखी और सुलझी हुई है यह २१ वीं शदी कि पीढ़ी है यह जाती, धर्म से ऊपर उढ़ कर सोंचती है आज कि युवा पीढ़ी दिल का नहीं दिमाग का इस्तेमाल करती है अब पढ़े लिखे मुसलमान नौजवान पीढ़ी अपने को अल्प-संख्यक कहलाना पसंद नहीं करते है क्यों कि अल्प-संख्यक शब्द उनको गाली लगता है, वो भी भारतीय है तो अल्प-संख्यक क्यों कहा जाता है यह चेतना पढ़े-लिखे नौजवान पीढ़ियों में आई है यह पीढ़ी अपने राज्य अपने सूबे में विकाश चाहती है, अब यह पीढ़ी राजनेतावों के चिकनी-चुपड़ी बातो में नहीं आने वाली है, आज कि युवा पीढ़ी समझदार पीढ़ी है इसीलिए अब सभी राजनीतिक पार्टियाँ भी अपना स्टैंड बदलने लगी है और विकाश कि बाते करने लगी है क्यों कि अब उन्हें भी यह समझ आने लगा है कि बात बनाने से वोट नहीं मिलने वाला है, काम के बदले ही वोट मिलेगा, इसलिए विकाश कि बाते करने लगे है
राज्य के विकाश के मुद्दे कि शुरुआत भी बिहार से ही हुआ जैसे कि देश कि आज़ादी कि शुरुआत गाँधी जी ने बिहार कि धरती से ही किये थे, एक बिहारी ने पुरे भारत से कांग्रेस कि सत्ता को उखाड़ फेंका था वह जयप्रकाश नारायण बिहार से ही थे और राज्य के विकाश का मुद्दा एक बिहारी ने ही उठाया है वह बिहार के वर्तमान मुख्य-मंत्री नितीश कुमार है विकाश कि बाते अभी बिहार में हो रही है लेकिन जैसे-जैसे भारत के और राज्यों में चुनाव आएगा वहां कि जनता भी विकाश कि ही बात करेगी तथा विकाश ही चुनावी मुद्दा बनेगा अभी तो यह शुरुआत है आगे-आगे देखिये होता है क्या ? विकाश कि लहर चल पड़ी है अब इसके आंधी में पूरा देश, देश कि पूरी जनता कि एक ही आवाज़ होगी और वह आवाज़ होगी ......"विकाश" केवल विकाश हर सूबे में विकाश हर राज्य में विकाश पुरे देश में विकाश, अब आम जनता अपने सरकार से सिर्फ विकाश चाहेगी अब राजनेतावों कि कि चिकनी-चुपड़ी बाते जनता को दिग्भ्रमित नहीं कर पायेगी अब राजनेतावों को जनता काम के बदले अपना वोट देगी समय रहते राजनेतावों को सम्हल जाना चाहिए क्यों कि अब पढ़े-लिखे वोटरों से राजनेतावों का पाला पड़ने वाला है अब राजनेतावों के दिन बदलने वाले है काँटों भरे रास्ते से इनको गुजरना होगा क्यों कि २१वीं शदी कि पीढ़ी पढ़ी-लिखी पीढ़ी है यह अपने एक एक पैसे का हिसाब राजनेतावों से लेगी
बिहार के चुनाव में विकाश मुख्य मुद्दा उभर कर सामने आया है .... नितीश कुमार विकाश कि बाते करते है तो बात समझ में आती है क्यों कि उन्हों ने सूबे में थोडा ही सही विकाश कि गाड़ी को पटरी पर ला तो दिए है अगर लालू जी विकाश कि बात करते है तो बेमानी लगता है क्यों कि उन्हों ने पंद्रह साल में बिहार में कोई विकाश नहीं किये और पासवान जी ये तो केवल केंद्र में मंत्री रहे है इनके लिए तो पूरा भारत एक है तो फिर बिहार जैसे एक राज्य को ये क्या अहमियत देंगे, अब रही कांग्रेस पार्टी ये विकाश कि बात तो कर ही नहीं रही है इसके सभी बड़े नेता केवल एक ही राग अलाप रहे है .... केंद्र के पैसे से बिहार का विकाश हुआ है

Sunday, October 17, 2010

"किसे वोट दे" बिहार चुनाव

बिहार में चुनावी जंग छिड़ी है सभी पार्टियाँ अपने-अपने तरीके से चुनावी प्रचार शुरू कर दिए है. सभी पार्टियों के दिग्गज नेता कमर कस कर चुनावी मैदान में उतार चुके है और अपने-अपने तरीके से जनता को प्रभावित या गुमराह करने लगे है। इलेक्ट्रोनिक मिडिया वाले भी चुनावी प्रचार कि कवरेज ज्यादा से ज्यादा दिखाने कि कोशिश कर रहे है तथा "अगला मुख्य-मंत्री कौन" का सर्वे भी शुरू कर दियें है। एक मीडिया हाउस द्वरा कराये गये सर्वेक्षण में मुख्यमंत्री पद के अन्य दावेदारों में राजद नेता लालू यादव को मात्र १७ फीसद, लोजपा नेता रामविलास पासवान को फीसद, राबड़ी देवी को फीसद और भाजपा नेता सुशील मोदी को फीसद लोगों ने स्वीकार है ।जबकि नीतीश कुमार ६६ फीसदी लोगों की पहली पसंद हैं | ’सहारा न्यूज नेटवर्कके इस सर्वेक्षण में राज्य के तकरीबन सभी विधानसभा क्षेत्रों को शामिल किया गया था.
कांग्रेस पार्टी के महा-सचिव राहुल गाँधी, प्रधान-मंत्री मनमोहन सिंह तथा कांग्रेस अध्यक्छ श्री मति सोनिया गाँधी ने बिहार में विकाश का श्रेय केंद्र द्वारा अधिक पैसा दिया जाना बताते है। यह अच्छी बात है कि केंद्र ने बिहार को ज्यादा पैसा दिया जो बिहार के विकाश के कार्य में लगा, तो फिर पिछले चालीस वर्षों तक बिहार कि सत्ता कांगेस के हाथो में थी तब बिहार में विकाश क्यों नहीं नज़र आया ? मतलब साफ है कि कांग्रेस पार्टी के किसी भी मुख्य-मंत्री में बिहार के विकाश को लेकर कोई सपना या इच्छाशक्ति नहीं थी या फिर उनको कार्य करने कि शैली नहीं आती थी जिसके चलते बिहार का विकाश नहीं हो पाया....... तो फिर हम कांग्रेस को वोट क्यों दे ? यह सभी को मालूम है कि केंद्र में जिसकी सरकार है उसी कि सरकार अगर राज्य में है तो उस राज्य को वितीय सहायता ज्यादा मिलाती है अगर किसी राज्य में दुसरे पार्टी कि सरकार है तो उसके हक के बराबर ही वितीय सहायता मिलाती है उससे ज्यादा नहीं ? तो फिर यह कांग्रेस बार-बार क्यों कहती है कि बिहार को केंद्र द्वारा वितीय सहायता ज्यादा दिया गया है ? जब कि केंद्र में कांग्रेस कि सरकार है और बिहार में NDA की सरकार है।
पिछले पंद्रह साल तक राष्ट्रिय जनता पार्टी [RJD] कि सरकार बिहार में थी उस समय-अवधी में भी बिहार में कोई विकाश नहीं हुआ, बल्कि वह पंद्रह साल बिहार के काले अध्याय के सामान था उसी समय-काल में बिहार से बिहारियों का पलायन सबसे ज्यादा हुआ था , यहाँ के बच्चे उच्च शिझा के लिए दुसरे राज्यों में पढने के लिए गए, बिहार कि बदनामी पुरे देश में हुई, असमाजिक तत्वों का बोल-बाला इसी समय अवधि में हुआ, शिझा के स्तर में गिरावट सबसे ज्यादा इसी समय काल में हुआ, बिहार कि सड़कों का बुरा हाल, ला एंड आडर के स्तर में गिरावट इसी समय अवधि में हुआ है। आज राष्ट्रिय जनता पार्टी के नेता चुनावी प्रचार में विकाश कि बाते करते है तो आप पिछले पंद्रह साल तक जब सत्ता में थे तो थोडा भी बिहार का विकाश क्यों नहीं किये ? अब आप पर कैसे यकीन किया जाय कि बिहार कि सत्ता अगर आपके हाथ में आएगी तो आप बिहार का विकाश करेंगे ? हम अपना बहुमूल्य वोट आपको क्यों दे ?
श्री राम विलाश पासवान ...... ये केवल बिहार से चुनाव जीतते है, बिहार के लिए नहीं जीते है, अगर बिहार के लिए जीते तो शायद MP का चुनाव जरुर जीतते। श्री पासवान ने अभी तक निरीह और गरीब जनता के वोट से केंद्र में केवल सत्ता के सुख का उपभोग किया है। अब सत्ता से हटने बाद इनको जनता याद आने लगी है। इन्हों ने परिवार वाद को सबसे ज्यादा बढ़ावा दिया है। ये अपने चुनाव प्रचार में ५०,०००/- पच्चास हजार रुपया गरीबो को देने कि बात कहते है जिसका कोई सूद नहीं लगेगा , क्या वाणिज्य बैंक ऐसा करेगी ? क्या केंद्र सरकार या राज्य सरकार का ऐसा कोई सर्कुलर है जो बिना सूद लिए ही या बिना गिरवी रखे बैंक पैसा बाँट दे साथ ही आधा डिसमिल जमीन गरीबो को देने कि बात करते है समझ में नहीं आती है कि ये आधा डिसमिल जमीन काहा से देंगे। शायद यह गुमराह करने वाला भाषण है । हम अपना वोट इनको क्यों दे, जो कि केवल अपने लिए जीते है ?
नितीश कुमार वर्तमान में बिहार के मुख्य-मंत्री....... पिछले पांच साल से बिहार के मुख्य-मंत्री है तथा पिछले पांच सालो में अपने सरकार द्वारा किये हुए कार्यो का मजदूरी बिहार कि जनता से मांग रहे है ताकि अगले पांच साल के लिए फिर इनकी सरकार बन सके।
नितीश कुमार जब पांच साल पहले बिहार के मुख्य-मंत्री बने तो उस समय बिहार बदहाली के आलम से गुजर रहा था, ला एंड ऑडर नाम कि कोई चीज ही नहीं थी, शिच्छा के स्तर में बहुत ज्यादा गिरावट आ गया था, बिहार के सडको कि हालत खस्ता-हाल थी उद्योग धंधे बंद पड़े हुए थे बहुत हद तक बड़े व्यापारी-वर्ग, बड़े किसान एवं मजदूरों का पलायन बिहार से हो चूका था। असमाजिक तत्वों का बोल-बाला था , वैसे समय में नितीश कुमार मुख्य-मंत्री बने और इस बदहाल बिहार को फिर से सँवारने कि चुनौती को स्वीकार किया। इन पांच सालों में आज बिहार कि सड़के अच्छी हालत में है, अब गाँव के कोई बीमार व्यक्ति को शहर के हस्पताल में आने के लिए कंधो कि जरुरत नहीं पड़ती है क्यों कि सड़के होने से अब गाँव में ही गाड़ियाँ मिल जाती है, अब किसान अपने अनाज को शहरो में लाकर ऊँचे दामो में बेच रहे है क्यों कि अब किसानो को बिचौलिए कि जरुरत नहीं है। यातायात का साधन बढ़ा है, जो रास्ते पहले चार घंटे में पुरे होते थे अब सड़कें होने से एक घंटे में पुरे हो जाते है। ला एंड ऑडर बहुत हद तक दुरुस्त है पिछले पांच सालों में करीब ४९ हजार अपराधियों को न्यायलय द्वारा शज़ा सुनाई गई हैअब कही जाने पर डर नहीं लगता है। अब देर रात तक सडको पर लोग नज़र आते है। स्कूलों में लड़के एवं लड़कियों कि संख्या में इजाफा हुआ है अब गाँव के स्कूलों में भी बच्चे नज़र आने लगे है, यह सायकिल और स्कूल यूनिफार्म का नतीजा है जो नितीश कुमार ने चलाई थी अब उसके परिणाम नज़र आने लगे है। अब सरकारी हस्पतालों में डाक्टर भी बैठते है मरीज भी नज़र आते है तथा दवाईयाँ भी मिलती है। कुछ नए कालेज खुले है कुछ खुलने के कगार पर है। बहुत हद तक जो बिहार का नाम धूमिल हुआ था अब धीरे-धीरे साफ़ होने लगा है तथा दुसरे राज्यों में बिहारी कहने में अब शर्म नहीं आती है। हाँ इन पांच सालों में बिहार कि तस्वीर बदली है। नितीश कुमार पहले बिहार के मुख्य-मंत्री है जो बिहार के हित के बारे में शोंचे है इसके पहले कोई मुख्य-मंत्री बिहार के हित के बारे में नहीं सोंचा है।
अब हम खुद आकलन कर ले कि हम किसे वोट दे ? फिर से बदहाल बिहार बनाना है तो उसके लिए कांग्रेस पार्टी है राष्ट्रिय जनता दल है तथा लो.ज.पा है। अगर खुशहाल बिहार बनाना है तो भारतीय जनता पार्टी तथा जनता दल यू है।

Friday, August 27, 2010

टूटते दरख़्त

संयुक्त परिवार अब बीते ज़माने कि बात लगने लगी है। आज का पढ़ा-लिखा इंसान संकीर्ण विचार का हो गया है। उसकी सोंच इतनी छोटी हो गई है कि, उसने जीने का दायरा भी छोटा कर लिया है। अब परिवार का मतलब होता है पति-पत्नी और उनके द्वारा उत्पन्न बच्चे। ऐसे छोटे परिवार बड़े शहरों में बहुत तायदाद में मिलेंगे, क्यों कि बड़े शहरों में पढ़े-लिखे लोगों कि संख्या ज्यादा है। पढने के बाद लोगों के विचार बड़े होते है सोंच बड़ी होती है उनके दायरे बड़े होते है लेकिन परिवार के नाम पर उनकी सोंच छोटी हो जाती है। उनके दायरे सिमट कर इतनी छोटी हो जाती है कि पत्नी और बच्चे तक ही सिमित रह जाती है। अब बड़े शहरों में संयुक्त परिवार के बराबर ही देखने को मिलेगा, लेकिन अभी भी गाँव और कश्बो में संयुक्त परिवार ही ज्यादातर मिलेगा, क्यों कि गाँव और कश्बो में पढ़े-लिखे लोगों कि संख्या कम है। उनका जीने का दायरा बहुत बड़ा है, उनके विचार बहुत बड़े है वो दिल से बहुत ही अमीर है। वो एक बड़े परिवार के लिए लिए जीते है उस परिवार में दादा-दादी, माता-पिता, भैया-भाभी, भाई-बहन, फुआ, छोटे भाई कि पत्नी और छोटे-छोटे हम सभी के बच्चे। सभी का आपस में प्यार, मिल-जुल कर रहना, जहाँ परिवार के एक सदस्य कि ख़ुशी पुरे परिवार कि ख़ुशी होती है तथा कोई एक सदस्य कि परेशानी पुरे परिवार कि परेशानी होती है। घर में जो सबसे बड़े होते वही घर के मुखिया होते है उनकी बात सभी को मान्य होती है। परिवार के बच्चों के अभिभावक केवल माता-पिता ही नहीं होते है दादा-दादी और भाई-बहन भी होते है अब ऐसा मिला जुला प्यार भरा परिवार टुकडो-टुकडो में टूटने लगा है क्यों कि अब सभी घरों में सरस्वती वास (निवास) करने लगी है।
मै आज से पच्चीस साल पहले एक संयुक्त परिवार का सदस्य था परिवार के सभी सदस्य पढाई पूरी करने के बाद नौकरी में गए तथा शादी होने के बाद एक-एक कर सभी लोगों ने अपने परिवार के साथ उस घर से विदा ले ली जहा उनका बचपन और जवानी का कुछ लम्हा बिता था, क्यों कि मेरे संयुक्त परिवार में सरस्वती का वास हो गया था। आज हमारे परिवार के लोग भिन्न-भिन्न शहरों में अपनी जिंदगी जी रहे है। शायद तन्हा और अकेला ?
संयुक्त परिवार के टूटने से लोगों में संकीर्णता कुछ ज्यादा ही गई है, अन्दर से अकेलेपन का डर बना रहता है दूर-दूर तक अपना कोई नज़र नहीं आता है, बच्चे जब अपनी पढ़ाई पूरी करके अपने कामो में व्यस्त हो जाते है तो यह अकेलापन और खलने लगता है। यह तब तक अच्छा लगता है जब तक मै अपने कामो में व्यस्त हूँ लेकिन बुढ़ापा बहुत ही दुखदाई हो जाता है। शायद यह संयुक्त परिवार के टूटने का ही नतीजा है।

Wednesday, August 25, 2010

भारतीय संस्कृति पर बढ़ा खतरा

भारत वर्ष पर अंग्रेजों का हुकुमत तक़रीबन दो सौ सालों तक रहा है १५ अगस्त १९४७ को वह भारत छोड़ कर अपने मुल्क को वापस चले गए , लेकिन जाने से पहले उन्होंने इस धरती पर कुछ बीज़ रोप कर गए थे। अब वो बीज़ अंकुरित होकर विशाल पेड़ का रूप धारण कर लिया है, उस पेड़ कि शाखाएं इतनी बढ़ी इतनी बढ़ी कि आज पुरे मुल्क में फ़ैल चुकी है। आज कुकुरमुत्ते कि तरह पुरे भारत में इंग्लिश मीडियम कि स्कूलें खुली हुई है या खुल रही है। अब माध्यमिक विद्यालयों में बच्चा वर्ग पहला वर्ग या दूसरा वर्ग नहीं होता है बल्कि प्रेप, नर्सरी, के जी और के जी- 1 से क्लास शुरू होता है। अब छोटे बच्चे " " नहीं पढ़ते है वो "A B C D" से अपनी पढाई शुरू करते है। माँ बाप भी अपने बच्चों को इंग्लिस मीडियम स्कूलों में दाखिला दिलाकर गौर्वान्तित महशुस करते है। इंग्लिस मीडियम कि स्कूलें पहले महानगरों में हुआ करती थी धीरे-धीरे बड़े शहरों से होते हुए छोटे शहरों तक बढ़ी अब हालत यह है कि यह गावं और छोटे कस्बे तक फ़ैल गई है। इसके फैलाव का ही कारण है कि आज हिंदी माध्यम कि स्कूलें नहीं खुल रही है और जो पहले से थी वो बंद हो गई है या बंद होने के कगार पर है। अब हिंदी माध्यम के स्कूलों में बच्चे पढने के लिए नहीं जाते है क्यों कि माता-पिता अपने बच्चे को हिंदी पढ़ाने में तौहीनी समझते है
" यह कितनी बड़ी बिडम्बना है हिंदुस्तान कि अपनी भाषा हिंदी है और हम हिन्दुस्तानी ही अपनी हिंदी भाषा के दुश्मन बन बैठे है " इसे जाहिल और गवारों कि भाषा मान बैठे है हम अपने बच्चों को किस रास्ते पर डाल रहे है अगर हमारी रफ़्तार यही रही तो आने वाली पीढियां हिंदी जानेगी ही नहीं आज से पच्चीस तीस साल पहले ज्यादातर हिंदी माध्यम कि स्कूलें हुआ करती थी जिसमे छठा वर्ग से अंग्रेजी कि पढाई शुरू होती थी पूरी पढाई हिंदी में होती थी केवल एक पेपर अंग्रेजी का होता था आठवी वर्ग से अंग्रेजी दो पेपर हो जाता था लेकिन अब स्कूलों में पूरी पढाई अंग्रेजी में होती है सिर्फ एक पेपर हिंदी का होता है वह भी एक्झिक विषय का मतलब यह कि अगर बच्चा चाहे तो हिंदी रख सकता और नहीं तो उसके जगह पर कोई और विषय रख सकता है पहले संस्कृत एक्झिक विषय होता था
उस अंग्रेजी के एक पेपर ने आज ऐसा पांव पसारा कि अंग्रेजी मुख्य हो गया और हिंदी एक्झिक
हमलोग जब विद्यालय में पढ़ते थे तो उन दिनों कोई सहपाठी अंग्रेजी में कोई आवेदन लिखता था तो हम विद्यार्थी उस लड़के को बहुत महत्त्व देते थे, शायद उस वक्त यह समझ में नहीं आता था कि यही अंग्रेजी भाषा सर्वोपरि हो जाएगी, क्यों कि हमलोगों कि मातृभाषा हिंदी थी, बोल-चाल कि भाषा हिंदी थी पढाई पूरी तरह हिंदी में करते थे हाँ एक विषय अंग्रेजी का होता था अब समझ में आने लगा कि इस भाषा में आकर्षण है, रोब है तभी तो हम अभिभावक अपने बच्चे को अंग्रेजी पढ़ाने पर तुले हुए है जो मेरे अन्दर जो कमियां रह गई थी वह बच्चों के मध्यम से पूरी होते देख रहे है आज हम अपनी भावी पीढ़ियों को अंग्रेज बनते देख रहे है आज उनकी शिच्छा, रहन-सहन, खान-पान, बोल-चाल अंग्रेजो कि तरह होते देख रहे है आज हम इतने खुले विचार धारा के हो गए है अब लड़का या लड़की में फर्क नहीं करते है अब लड़कियां भी लड़के के कपडे पहन कर कदम से कदम मिला कर चलने लगी है अब लड़के का ही चार पांच गर्ल फ्रेंड नहीं होती है बल्कि लड़कियों का भी चार पांच बॉय फ्रेंड होते है अब लड़कों के साथ-साथ लड़कियां भी नशा पान करने लगी है, स्वछन्द जिन्दगी जीने लगी है अब हमारी वर्तमान पीढियां पूरी तरह अंग्रेज हो गई है जो मैंने अपने बच्चों में बुनियाद डाली थी आज वह पूरी तरह साकार हो गया है
अब इसके दुष्परिणाम भी सामने आने लगे है आज के बच्चे अपने बूढ़े हो चले माता-पिता को साथ रखना नहीं चाहते है क्यों कि उनके पास समय नहीं है आज यही कारण है कि महानगरों एवं बड़े शहरों में "ओल्ड एज होम" नाम से बहुत सी संस्थाएं चलती है, अभी यह संस्थाएं महानगरों एवं बड़े शहरों तक ही सीमित है लेकिन अगले बीस सालों में यह छोटे शहर एवं गाँव तक खुल जाएगी यह दूसरी सभ्यता के नक़ल का ही परिणाम है कि आज हमारी भावी पीढियां एक ऐसे कगार पर खडी है जो पूरी तरह अंग्रेज ही है ही पूरी तरह भारतीय हम अभिभावक ही दोषी है इस दुष्परिणाम के हमारी भावी पीढियां नहीं है बच्चा तो बच्चा होता है उसे जो चाहते है हम बनाते है हम अभिभावक अन्दर से इतने कुंठित तथा हीनभावना से ग्रसित है कि अपने ही बच्चे को एक ऐसे मुकाम पर खड़ा कर दिए है जहाँ अपनी पहचान ही खो दिया है
मै अंग्रेजी के विरोध में नहीं हूँ अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है इस भाषा कि जानकारी जरुरी है इसके वगैर विदेशो में काम नहीं चल सकता है उच्च शिच्छा में भी इस भाषा ज्ञान होना जरुरी है मै अंग्रेजी सभ्यता का विरोध करता हूँ अंग्रेजी सभ्यता अगर भारत में पनपने लगी तो हमारी सभ्यता खतरे में पड़ जाएगी