Saturday, February 28, 2026

वक्त के साथ बदलते रिश्ते

वक्त के साथ बदलते रिश्ते 

यह तस्वीर एक माँ और उसके दो बच्चों की है, जो आज बड़े होकर अपनी शादीशुदा ज़िंदगी जी रहे हैं, लेकिन अब माँ के साथ नहीं रहते। यह तस्वीर सिर्फ एक पल को कैद नहीं करती, बल्कि एक कहानी कहती है—प्यार, त्याग और समय के साथ बदलती रिश्तों की कहानी।

​इस तस्वीर में माँ अपने बच्चों के साथ खड़ी है, उनके कंधों पर हाथ रखकर। उसकी आँखों में वात्सल्य और गर्व साफ झलक रहा है। बच्चे भी अपनी माँ के आंचल में सुरक्षित और खुश दिख रहे हैं। यह दृश्य बताता है कि कैसे एक माँ अपने बच्चों के लिए पूरी दुनिया होती है, और बच्चे माँ के लिए जीवन का आधार। उस समय, शायद उन्हें यह कल्पना भी नहीं होगी कि एक दिन वे बड़े होंगे और अपने जीवन साथी के साथ अपनी अलग दुनिया बसा लेंगे।

​समय का चक्र चलता रहा, बच्चे बड़े हुए, उन्हें अपनी शिक्षा और करियर की राहें मिलीं। फिर आया वह पड़ाव जब उन्होंने अपने जीवन साथी चुने और अपने नए परिवारों की नींव रखी। यह हर माँ का सपना होता है कि उसके बच्चे खुश रहें, सफल हों और अपना परिवार बसाएं। लेकिन इस खुशी के साथ एक कड़वी सच्चाई भी जुड़ी होती है—बच्चों का घर से दूर चले जाना।

​आज वे बच्चे अपने जीवन में व्यस्त हैं, शायद शहरों में, या देशों में, अपनी-अपनी जिम्मेदारियों को निभाते हुए। वे अपने बच्चों को पाल रहे हैं, अपने रिश्तों को सहेज रहे हैं। इस सब में, कहीं न कहीं, उस माँ की यादें, उसका प्यार और उसका अकेलापन भी शामिल है। माँ आज भी शायद उन पुरानी यादों को संजोए बैठी होगी, जब उसके बच्चे उसके पास थे। शायद वह हर त्योहार पर, हर खुशी के मौके पर उन्हें याद करती होगी।

​यह सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं है, बल्कि आज के समाज की एक सामान्य तस्वीर है जहाँ बच्चे बेहतर अवसरों या अपनी सुविधा के लिए माता-पिता से दूर रहने लगते हैं। यह बदलाव ज़रूरी है, स्वाभाविक है, लेकिन इसके साथ कई भावनाएँ जुड़ी होती हैं। माँ और बच्चों का रिश्ता कभी नहीं बदलता, भले ही दूरियाँ आ जाएँ। यह तस्वीर इस बात की गवाही है कि माँ का प्यार हमेशा अटल रहता है, चाहे बच्चे कहीं भी हों, कितने भी बड़े क्यों न हो जाएँ।

​यह तस्वीर हमें याद दिलाती है कि रिश्तों की अहमियत क्या है, और हमें अपने माता-पिता के प्रति हमेशा कृतज्ञ रहना चाहिए, भले ही हम उनके साथ शारीरिक रूप से न रह पा रहे हों। उन्हें समय देना, उनसे बात करना और यह एहसास दिलाना कि वे आज भी हमारे जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, यही हमारे लिए सबसे बड़ा कर्तव्य है।

अजय केशरी 

Friday, February 13, 2026

मनेर की मज़ार








मनेर का मकदूम साह दौलत मज़ार: मुगल स्थापत्य का जीवंत प्रतीकपटना से मात्र तीस किलोमीटर दूर, मनेर कस्बा बिहार की धरती पर एक ऐतिहासिक धरोहर को समेटे हुए है। यहाँ सूफी संत मकदूम साह दौलत का मज़ार स्थित है, जो भक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। सन १६०८ के आसपास इनकी मृत्यु हुई, और उनके नाम से जुड़ी यह इमारत मुगल कालीन स्थापत्य की उत्कृष्ट मिसाल है। सफेद संगमरमर की चमक और नाजुक नक्काशी इसे दूर से ही आकर्षित करती है।मकदूम साह दौलत एक प्रमुख सूफी संत थे, जिनकी शिक्षाएँ प्रेम, भक्ति और मानवता पर आधारित थीं। मुगल सम्राट जहाँगीर के काल में यह मज़ार निर्मित हुआ, जो स्थानीय शासकों और मुगल दरबार के संरक्षण में फला-फूला। इमारत का मुख्य गुंबद ऊँचा और सुंदर है, जिसमें अरबी-पर्शियन शिलालेख उत्कीर्ण हैं। चारों ओर मेहराबदार गलियारे और जालीदार खिड़कियाँ हैं, जो मुगल शैली की विशेषता दर्शाती हैं—जैसे ताजमहल या हुमायूँ का मज़ार। संगमरमर पर फूल-पत्तियों की बारीक नक्काशी और छतरीदार मीनारें इसे राजसी वैभव प्रदान करती हैं।यह मज़ार न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि बिहार के मुस्लिम-सूफी इतिहास का साक्षी भी है। हर साल उर्स के अवसर पर हजारों भक्त इकट्ठा होते हैं, जहाँ कव्वाली और दरगाह की फिजा आस्था को गहरा करती है। पटना के शहरी भागदौड़ से दूर, मनेर की शांत वादियाँ इस ऐतिहासिक स्थल को और भी रहस्यमय बनाती हैं। पर्यटक और इतिहास प्रेमी यहाँ आकर मुगल युग की भव्यता को महसूस कर सकते हैं।
अजय केशरी 



































Friday, January 18, 2013

ज़मीदोह होती भारतीय राजनीति



आज देश की राजनीति का आलम यह है की अब ये नेता नामक प्राणी या मंत्री समाजसेवी कम लूटेरे ज्यादा हो गए है एक समय वो भी था जब देश के राजनेताओं की तस्वीर को लोग फ्रेम कराकर घरों में टांगते थे उस नेता को अपना आदर्श मानते थे उसके चरित्र को अपने जीवन में अपनाते थे उसके नक़्शे कदम पर चलते की कोशिश करते थे और उसका अनुशरण कर उसी की तरह बनना चाहते थे  धीरे-धीरे समय बदला लोग बदले व्यापार करने का तरीका बदला साथ में बदली राजनीति करने का तरीका अब हालत यह है की राजनेता समाज सेवा करने के लिए या देश को दिशा देने के लिए राजनीति में नहीं आ रहे है बल्कि राजनीति के माध्यम से धनोपार्जन करने के लिए राजनीति में आ रहे है खुदा न खस्ता अगर राजनीती में इनकी पैठ बन जाती है और ये मंत्री पद पा लेते है तो इनकी तो पौबारह हो जाती है। पद, पावर और पैसा सबकुछ इनके पास आ जाता है । पद, पैसा और पावर आने के बाद इन नेताओं की सोंच में एक बहुत बड़ा परिवर्तन आता है अब ये आम से खास बन जाते है और उन खास लोगों के बीच में हमेशा अपनी उपस्थिति बनाये रखना चाहते है जिसका नतीजा यह होता है की ये पैसा कमाने के लिए अपने पद और पावर का दुरूपयोग करना शुरू कर देते है, ये इतने भ्रष्ट और पतीत जाते है की अपने पद पर बने रहने के लिए उद्योगपतियों से (चाहे वह देशी हो या विदेशी) किसी भी स्तर पर समझौता करने को तैयार हो जाते है चाहे देश या देश की जनता चूल्हे भांड में क्यों न जाय ? एक बार राजनीति में पैठ बनाने के बाद ये नेता वंशवाद का  सिलसिला शुरू कर देते है अब ये एक एक कर अपने भाई, भतीजा, पत्नी, बेटा और बेटी तक को राजनीति में लाना शुरू कर देते है, अब ऐसे चरित्रवान नेताओं के सगे सम्बन्धी कितने चरित्रवान हो सकते है यह सभी को मालूम है । अब ऐसे नेता या मंत्री से देश की जनता या देश क्या उम्मीद कर सकता है जो चारित्रिक तौर पर भ्रष्ट हो चुके है। आज राजनीती का आलम यह है की भारत की जीतनी भी राजनितिक पार्टियां है वह किसी न किसी व्यक्ति विशेष की अपनी प्राइवेट लिमिटेड पार्टी है और इनकी पार्टी में ऐसे ही व्यक्ति का पदार्पण हो सकता है जो पार्टी आलाकमान की चाहे वह गलत बात ही क्यों ना करता हो, उनकी गलत नीतियाँ ही क्यों ना हो हाँ में हाँ मिलाना पड़ेगा मतलब यह की पार्टी आलाकमान के इच्छाओं के अनुरूप चलना पड़ेगा उनके विरुद्ध जाकर आप उनके पार्टी में बने नहीं रह सकते है यानि की अपनी इक्षावों की तिलांजलि देकर कर ही उनके पार्टी में बने रह सकते है ।  अब ऐसे नेता से भारत की आम जनता क्या उम्मीद कर सकती है जो चुना तो जाता है जनता के द्वारा लेकिन सुनता केवल है अपने पार्टी आलाकमान का ।  क्या वो जनता का प्रतिनिधि हो सकता है ? क्या वह जनता के भला के लिए आवाज़ उठा सकता है ? आज इस देश में एक या दो ही पार्टियाँ बची है जिसके अध्यक्षों का चुनाव होता है तो पुराने चेहरे की जगह नया चेहरा नज़र आता है लेकिन भारत की ऐसी तमाम पार्टियाँ है चाहे वह राष्ट्रिय स्तर की हो या छेत्रीय स्तर की सभी का आलम यह है की उसके अध्यक्ष एक ही होते है और वही उस पार्टी का सर्वेसर्वा (मालिक) होता है । 
अब जो प्राइवेट लिमिटेड पार्टियाँ है क्या वह जनता के उम्मीदों पर खरा उतरती है, नहीं, क्यों की वह जनता का वोट पैसे देकर खरीदती है या गलत आश्वासन देकर जनता को मुर्ख बना कर वोट हांसिल करती है । आज राजनितिक पार्टियों का आलम यह है की चुनावी आमसभा में खुल्लमखुल्ला जनता को यह आश्वाशन देते है की हमारी सरकार अगर बनती है तो हम वैसे विद्यार्थियों को टेबलेट या लैपटॉप देंगे जो मैट्रिक की पढाई कर रहा है या वैसे लोगों को जो गरीब है इतने वर्गफीट का दो कमरे का मकान मुहैया कराएगें ऐसे तरह तरह के आश्वासन देकर ये राजनितिक पार्टियाँ जनता को लालच देकर उसका वोट हांसिल करती है भले चुनाव जीतने के बाद जनता से किये वादे उसे याद रहे या न रहे । लेकिन जनता को मुर्ख बना कर वोट तो हांसिल कर ही लेते है । आज राष्ट्रिय स्तर की कोई भी ऐसी पार्टी नहीं है जो पूर्ण बहुमत हांसिल कर केंद्र की सत्ता में सरकार बना सके, उसे केंद्र में सरकार बनाने की लिए छेत्रीय पार्टियों से समझौता करना पड़ता है और यही से शुरू होता है छेत्रीय पार्टियों की ब्लैकमेलिंग । अब वो अपने सांसदों की संख्याओं के आधार पर मलाईदार मंत्री पद की मांग करते है और सरकार बनाने की मज़बूरी में ही सही उनको वह मंत्री पद देना पड़ता है और यही से शुरू होता है लूट खसोट, जनता के पैसों का बंदरबांट। केंद्र में अब किसी एक पार्टी की सत्ता नहीं है बल्कि कई एक पार्टियाँ मिलकर सत्ता चलाती है जिसका नाम दिया गया है यूपीए और एनडीए । जिस पार्टी का सबसे ज्यादा सांसद होते है, प्रधानमंत्री का पद उसी पार्टी को जाता है भले ही प्रधानमंत्री पद के लायक उस पार्टी में कोई व्यक्ति हो या ना हो। अब जहाँ जोड़ तोड़ कर बहुमत जुटा कर सरकार बनाई जाती है वहां क्या जनता के हितों के लिए या देश के हितों के लिए सोंच सार्थक हो सकती है ? आज केंद्र में यूपीए की सरकार है जिसमे सबसे ज्यादा सांसद कांग्रेस पार्टी के है इस आधार पर प्रधानमंत्री का पद कांग्रेस के खाते में है और श्री मनमोहन सिंह जो राज्यसभा से सांसद है वो प्रधानमंत्री पद के योग्य उम्मीदवार समझे गए इसलिए प्रधानमंत्री के पद पर उनको बैठाया गया, अब इनके प्रधानमंत्रित्व काल में क्या क्या हुआ इससे पूरा देश अवगत है। आज महंगाई का आलम यह है की सौ रुपये की कीमत दस रुपये के बराबर पहुँच गई है। इनके शासनकाल में जमीन आसमान और पाताल तक घोटाले हो चुके है, गरीब और गरीब हुआ है अमीर और अमीर, गैस सिलिंडर पर जो सब्सिडी मिलता था वह सब्सिडी हटा ली गई है और एक परिवार को साल में मात्र छह सिलिंडर ही कंट्रोल रेट पर मिलेगा। इनकी सरकार ने महात्मा गाँधी के नाम पर गाँव में मनरेगा के तहत 365 दिनों में मात्र 100 दिन का रोज़गार मुहैया कराने का कानून बनाया ताकि गाँव के लोगों को मजदूर बनाकर जीने पर मजबूर किया जाय, अब आम लोगों को सब्सिडी का पैसा देने की बात की जा रही है, यानि आम लोगों को भिखारी बनाने पर आमादा है ये यूपीए की सरकार। जनता का ही पैसा जनता को देकर यह सरकार वाहवाही लूटना चाहती है, यूपीए की सरकार यह नहीं चाहती की भारत के लोग आत्मसम्मान से जी सके। भारत सरकार को इसके लिए पहल करनी चाहिए। आज तक इस देश में जितने भी घोटाले हुए है अगर भारत के राजनेता उन घोटालों को रोक पाते तो सचमुच भारत आज फिर से सोने की चिड़ियाँ बन जाता और इस देश में एक बार फिर दूध की नदियाँ बहती लेकिन ऐसा नहीं हो सका। आज तक इस देश को सभी लोगों ने लूटा है चाहे वो मुग़ल साम्राज्य रहा हो, ब्रितानियाँ सरकार रही हो या फिर देश आज़ाद होने बाद देश के राजनेता। अब भी समय है की हम इस देश को एक बार फिर इसका पुराना अतीत लौटा सकते है अगर हमारे देश के राजनेता देश का हर नागरिक इस देश को अपना समझे और देश को आगे बढ़ाने के लिए प्रयत्नशील हो।

Monday, October 8, 2012

चक्रव्यह में फंसा आम आदमी

महंगाई के चक्रव्यह में आज भारत का आम आदमी फंस कर रह गया है .हमारे देश के माननीय राजनीति के आकाओं देश के महान राजनेताओं, देश के सर्वोच्च पद पर बैठे माननीय मंत्रियों, उधोग जगत के माननीय उधोगपतियों, देश के वुरोक्रेट्सों क्या आप लोगो को यह लगता है की आपलोग इसी दुनियां के है या कोई दूसरी दुनियां से आये हुए लोग है . क्यों की आपलोग भारत के भाग्य विधाता है। आप लोग भी उसी हाड़ मांस से बने हुए लोग है जीस हाड़ मांस से भारत की आम आदमी बनी है। फिर आम आदमी और आप में इतना फर्क क्यों है। आम आदमी अपनी छोटी कमाई में में ही गुज़ारा कर लेता है लेकिन आपलोगों को छोटी कमाई रास नहीं आती इसलिए इतने बड़े-बड़े घोटाले करते है जिसकी कल्पना आम आदमी सपने में भी नहीं कर सकता। लगता है आम आदमी से आपलोगों का पेट बड़ा है इसीलिए बड़े से बड़ा घोटाला कर के भी आपलोग आराम से पचा लेते है और डकार भी नहीं आती, यानि अभी और बड़े-बड़े घोटाला करना बाकि है। क्या यह देश आपलोगों का नहीं है ? क्या भारत की जनता इस देश की नहीं है ? अगर यह देश आपलोगों का है और इस देश में निवास करने वाली जनता इसी देश की है तो फिर इस देश के प्रति आपलोगों का कुछ तो कर्तव्य बनता है या फिर देश के प्रति यहाँ की जनता के प्रति आपलोगों का कोई कर्तव्य ही नहीं बनता। लगता तो यही है की जनता से वोट लेने का बाद आपलोग जनता को ही भूल जाते है। अगर जनता आपको याद रहती तो कम से कम महंगाई बढ़ाते और घोटाले छोटे करते ताकि देश की आर्थिक स्थिति इतनी ख़राब नहीं होती। लगता तो यही है की इस देश के प्रति आपलोगों के दिल में कोई सहानभूति नहीं है यहाँ की जनता के प्रति कोई हमदर्दी नहीं है। अगर देश के प्रति सहानभूति होती तो आपलोग इतने बड़े घोटाले कर सफ़ेद पैसे को काला नहीं करते। आज सफ़ेद पैसा काला होने के कारण ही आपलोगों को बार-बार महंगाई बढ़ानी पड़ रही है ताकि देश के खजाने में राजस्व आ सके। अगर आपलोग छोटे घोटाले करते तो देश की आर्थिक स्थिति ठीक रहती और आप जो आम आदमी को गैस सिलिंडर , डीज़ल पर जो सब्सिडी देते थे वह आम लोगों को आज भी मिलता रहता। घोटाले तो आपलोग किये लेकिन इसका खामियाजा कौन भुगत रहा है, इस देश की आम जनता ? आपलोगों को मालूम है एक परिवार के लिए आपलोग साल में मात्र छः सिलिंडर दे रहे है, क्या वह एक दिन में मात्र एक ही बार खाना खायेगा, क्यों की अगर दो बार खाना और नास्ता बनता है तो फिर साल में छः सिलिंडर कम पड़ जायेगा बाकि सिलिंडर खरीदने के लिए उसकी जेब ढीली करनी पड़ेगी। अगर मान लीजिये अतिरिक्त सिलिंडर खरीदने के लिए वह सक्षम नहीं है तो क्या करेगा वह आम आदमी ? आपलोग देश के सर्वोच्च पद पर बैठे है जनता के पैसों से ही आपलोगों का गुज़ारा होता है उसी के पैसों पर आपलोग मौज मस्ती करते है विदेश यात्रा करते है, महंगा से महंगा इलाज कराते है इस देश में इलाज न करा कर विदेश में इलाज कराते है। महंगी से महंगी गाड़ियों में सफ़र करते है, मुफ्त में आपलोगों को आवास मिलता है। खाने पीने की हर चीज आपलोगों को मुफ्त में मिलती है। आपलोगों को मालूम है की यह सब भारत के जनता के पैसों से होता है तो फिर उसी जनता को सब्सिडी के रूप में कुछ पैसे लौटते थे  तो जनता पर कोई मेहरबानी तो नहीं करते थे बल्कि जनता आप पर मेहरबानी कर रही है की उसके पैसों पर आप पल रहे है। आप अभी सत्ता में है तो जनता का ख्याल कीजिये क्यों की जनता से आप है आपसे जनता नहीं है। 

Monday, September 24, 2012

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह "दिनकर" का जन्मदिन

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह "दिनकर" का आज के दिन 23 सितम्बर 1908 को बिहार के बेगुसराय जिले के सिमरिया गाँव में हुआ था ! उनकी प्राथमिक शिक्षा गाँव के ही स्कूल में व उसके बाद बारो मध्य विधालय से। मैट्रिक मोकामा हाई स्कूल से तथा पटना यूनिवर्सिटी से इंटर व इतिहास प्रतिष्ठा की डिग्री। दिनकर जी द्वारा साहित्य सृजन - विजय सन्देश, प्रणभंग, रेणुका, हुँकार, कुरुछेत्र, रसवंती, बापू, रश्मिरथी, उर्वशी, हरे को हरी नाम, मिर्च का राजा, सामधेनी, उजली आग, संस्कृति के चार उपाय, विवाह की मुसीबते, धर्म नैतिकता व विज्ञान, बट पीपल तथा अन्य और रचनाएं है। उनका संसदीय जीवन 1952 से 1964 तक राजसभा के सांसद के रूप में रहा।                                                   
उनके द्वारा लिखित रचनाएं तो बहुत सी है लेकिन मै रश्मिरथी पर चर्चा कर रहा हूँ।
दिनकर जी ने रश्मिरथी में महाभारत काल के एक ऐसे वीर चरित्र को रश्मिरथी का नायक बनाये है जो हमारे सभ्य समाज में वैसे पात्र की कोई पहचान नहीं होती या सामाजिक मर्यादाओं में कोई महत्त्व नहीं दिया जाता है, जिसके पिता की पहचान न हो यानि नाजायज संतान। 
वीर कर्ण थे तो सूर्य पुत्र लेकिन उनके पूरे जीवन काल में सूतपुत्र कहकर ही उनको संबोधित किया गया है। पांडवो के बड़े भ्राता होने बावजूद भी उनको पांडवो से कोई सम्मान नहीं मिला बल्कि उनको हर तरह से छलने की कोशिश की गई है। माता कुंती को यह मालूम होने के बाद भी की कर्ण उनका ही पुत्र है, लोक लज्जा के डर से कर्ण को नहीं अपना सकी। छोटे भ्रातावों के द्वारा बार-बार अपमानित होने के बाद भी माता कुंती द्वारा कोई प्रतिक्रिया व्यक्त न करना यह लोक-लज्जा ही तो थी ऐसे में कर्ण को युर्योधन के द्वारा मान-सम्मान मिलता है।
क्यों की युर्योधन पांडवो को देखना नहीं चाहता था और उसने कर्ण की वीरता को देख चूका था उसे यह मालूम हो गया था की कर्ण अर्जुन से भी बड़ा वीर योद्धा है। और उसने कर्ण के बल पर ही महाभारत की लड़ाई लड़ने की ठान ली। महाभारत के परिणाम तो सभी को मालूम है।
रश्मिरथी से :-
रंग-भूमि में अर्जुन था जब समाँ अनोखा बाँधे,
बढ़ा भीड़-भीतर से सहसा कर्ण शरासन साधे।
कहता हुआ, 'तालियों से क्या रहा गर्व में फूल?
अर्जुन! तेरा सुयश अभी क्षण में होता है धूल।'


'तूने जो-जो किया, उसे मैं भी दिखला सकता हूँ,
चाहे तो कुछ नयी कलाएँ भी सिखला सकता हूँ।
आँख खोल कर देख, कर्ण के हाथों का व्यापार,
फूले सस्ता सुयश प्राप्त कर, उस नर को धिक्कार।'


इस प्रकार कह लगा दिखाने कर्ण कलाएँ रण की,
सभा स्तब्ध रह गयी, गयी रह आँख टँगी जन-जन की।
मन्त्र-मुग्ध-सा मौन चतुर्दिक् जन का पारावार,
गूँज रही थी मात्र कर्ण की धन्वा की टंकार।



Thursday, September 20, 2012

भारत में एफ डी आई का आना

ऍफ़ डी आई को लेकर आज देश में हो हल्ला मचा हुआ है, कांगेस यह तर्क दे रही है इसके आने से देश आर्थिक रूप से मजबूत होगा, किसानो को अपने उत्पादन पर ज्यादा मुनाफा होगा देश में रोजगार बढेगा यानि कि सब कुछ अच्छा ही अच्छा होगा लेकिन हमें उन दिनों को याद रखना चाहिए जब आज से २७० साल पहले ब्रितानी ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में व्यापार करने के लिए आई थी और उसके क्या परिणाम हुए यह हम सब अच्छी तरह जानते है! उन्हों ने दो सौ सालों तक हमारे देश पर शासन किया, अगर महात्मा गाँधी नहीं होते तो आज भी हमारे देश में ब्रिटिश हुकुमत ही होता ! कोका-कोला और पेप्सी के आने से हमारे देश में वह उद्योग बंद हो गए जहाँ कभी फेंटा, लिम्का और गोल्ड स्पाट जैसे सोफ्ट ड्रिंक बनते थे क्यों कि आज कोका-कोला और पेप्सी जैसी कंपनियों ने या तो इन उत्पादों को बंद करा दिया या फिर वह वहां अपना उत्पादन करने लगी ! माना कि विदेशी कंपनियों के आने से तात्कालिक भारत के लोगों को फायदा तो होगा लेकिन आगे चल कर क्या होगा ?  यही होगा आज किसान अपने दामो पर उसे अपना माल देंगे लेकिन कुछ ही सालो के अन्दर ये विदेशी कम्पनियाँ किसानो के उत्पादन का मूल्य खुद तय करेंगी और अपने शर्तो पर सामान लेंगी ! विदेशी कम्पनियाँ हमारे देश में यहाँ के लोगों का भला या देश का आर्थिक मदद करने के लिए नहीं आ रही है बल्कि अपने पैसे के बल पर हमारे देश का सामान खरीद कर हमें ही बेचेगी और मुनाफा कमा कर अपने देश की आर्थिक मदद करेगी ! ले देकर अब यही लगने लगा है की हम आज फिर से उसी अतीत के तरफ लौटने लगे है जब हमारा देश गुलाम था ! हमारे देश के नेताओं को यह समझना चाहिए की यह देश हमारा है इसकी दीवारे इतनी मजबूत करे की कोई विदेशी कम्पनियाँ हमारे देश में आकर हमारे लोगों को नहीं ढगे !

Thursday, August 30, 2012

बे-नकाब होती भारतीय राजनीति

केंद्र कि सत्ता में आसीन कांग्रेस पार्टी तथा उसकी सहयोगी पार्टी यूपीए कि सरकार तथा विपक्ष में बैठी भारतीय जनता पार्टी तथा उसकी सहयोगी पार्टी एनडीऐ के सांसद एक दुसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगा रहे है और यह साबित करने पर तुले हुए है कि कौन बड़ा घोटालाबाज़ है! जिसका नतीजा यह हो रहा है कि इनके खिंचा तान में संसदीय कार्य पूरी तरह से ठप पड़ गया है और जनता का करोडो रुपया प्रतिदिन संसदीय कार्य पर खर्च तो हो रहे है लेकिन काम कुछ नहीं हो रहा है ! क्या भारतीय जनता मूक दर्शक बनी बैठी है या फिर बेनकाब हो रहे भारतीय राजनीति को देख रही है ? आज आरोप और प्रत्यारोप कि राजनितिक भाषा उस नीचले स्तर तक पहुँच गई है जहाँ विपक्ष के नेता सत्तारूढ़ पार्टी पर यह आरोप लगा रहे है कि कोयला के गबन में कांग्रेस पार्टी को "मोटामाल" मिला है तो सत्तारूढ़ पार्टी कि सुप्रीमो भारतीय जनता पार्टी पर यह आरोप लगा रही है कि यह "ब्लेकमेलर" पार्टी है और बेचारी भारतीय निरीह जनता इन दोनों पार्टियों के आरोपों को सुन रही है, समझने कि कोशिश कर रही है और शोंच रही है क्या भारतीय राजनीति इतनी जल्दी अपनी गरिमा को खो दी या हमलोगों ने गलत विचार धरा के उम्मीदवार को अपना नेता चुन संसद में भेज दिए जो आपस में मिलजुल कर बड़े-बड़े घोटाले तो कर रहे है और अपनी छवि को साफ सुथरी बताने के लिए एक दुसरे पर आरोप और प्रत्यारोप लगा रहे है और जनता के पैसों को लूट रहे है!
भारत एक प्रजातांत्रिक देश है और प्रजातंत्र कि परिभाषा है :- "जनता का, जनता के लिए, जनता के द्वारा "।
जनता का :- यानि भारतवर्ष कि पूरी संपदा, उसका छेत्रफल, नदी, समुन्द्र, खनिज, पर्वत यह सब भारतीय जनता का है न कि किसी पार्टी विशेष कि,इसलिए भारत कि हर जनता को यह सोंचना पड़ेगा कि उसका प्रतिनिधि कैसा हो जो उसकी संपदा कि रक्षा कर सके ?
जनता के लिए :- जनता के हितो कि रक्षा के लिए भारतीय संसद है जो भारतीय जनता का सर्वोच्च सदन है।
जनता के द्वारा :- जनता के द्वारा चुने हुए उसके नेता, जन-प्रतिनिधि या नायक, जनता के हितो कि रक्षा करते है।
क्या आपके सांसद आपकी संपदाओं कि रक्षा कर पा रहे है, शायद नहीं, अगर भारतीय जनता के संपदाओं कि रक्षा होती तो आज इतने बड़े-बड़े घोटाले नहीं होते । नीचे कुछ उदाहरण दे रहे है जो आज़ादी के बाद से अबतक कितने घोटाले इन राजनेताओ ने किये है ।
आजादी से अब तक देश में काफी बड़े घोटालों का इतिहास रहा है। नीचे भारत में हुए बड़े घोटालों का संक्षिप्त विवरण दिया गया है-
जीप खरीदी (१९४८)
आजादी के बाद भारत सरकार ने एक लंदन की कंपनी से २००० जीपों को सौदा किया। सौदा ८० लाख रुपये का था। लेकिन केवल १५५ जीप ही मिल पाई। घोटाले में ब्रिटेन में मौजूद तत्कालीन भारतीय उच्चायुक्त वी.के. कृष्ण मेनन का हाथ होने की बात सामने आई। लेकिन १९५५ में केस बंद कर दिया गया। जल्द ही मेनन नेहरु केबिनेट में शामिल हो गए।
साइकिल आयात (१९५१)
तत्कालीन वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के सेकरेटरी एस.ए. वेंकटरमन ने एक कंपनी को साइकिल आयात कोटा दिए जाने के बदले में रिश्वत ली। इसके लिए उन्हें जेल जाना पड़ा।
मुंध्रा मैस (१९५८)
हरिदास मुंध्रा द्वारा स्थापित छह कंपनियों में लाइफ इंश्योरेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया के १.२ करोड़ रुपये से संबंधित मामला उजागर हुआ। इसमें तत्कालीन वित्त मंत्री टीटी कृष्णामचारी, वित्त सचिव एच.एम.पटेल, एलआईसी चेयरमैन एल एस वैद्ययानाथन का नाम आया। कृष्णामचारी को इस्तीफा देना पड़ा और मुंध्रा को जेल जाना पड़ा
तेजा ऋण
१९६० में एक बिजनेसमैन धर्म तेजा ने एक शिपिंग कंपनी शुरू करने केलिए सरकार से २२ करोड़ रुपये का लोन लिया। लेकिन बाद में धनराशि को देश से बाहर भेज दिया। उन्हें यूरोप में गिरफ्तार किया गया और छह साल की कैद हुई।
पटनायक मामला
१९६५ में उड़ीसा के मुख्यमंत्री बीजू पटनायक को इस्तीफा देने केलिए मजबूर किया गया। उन पर अपनी निजी स्वामित्व कंपनी 'कलिंग ट्यूब्सÓ को एक सरकारी कांट्रेक्ट दिलाने केलिए मदद करने का आरोप था।
मारुति घोटाला
मारुति कंपनी बनने से पहले यहां एक घोटाला हुआ जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का नाम आया। मामले में पेसेंजर कार बनाने का लाइसेंस देने के लिए संजय गांधी की मदद की गई थी।
कुओ ऑयल डील
१९७६ में तेल के गिरते दामों के मददेनजर इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन ने हांग कांग की एक फर्जी कंपनी से ऑयल डील की। इसमें भारत सरकार को १३ करोड़ का चूना लगा। माना गया इस घपले में इंदिरा और संजय गांधी का भी हाथ है।
अंतुले ट्रस्ट
१९८१ में महाराष्ट्र में सीमेंट घोटाला हुआ। तत्कालीन महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एआर अंतुले पर आरोप लगा कि वह लोगों के कल्याण के लिए प्रयोग किए जाने वाला सीमेंट, प्राइवेट बिल्डर्स को दे रहे हैं।
एचडीडब्लू दलाली (१९८७)
जर्मनी की पनडुब्बी निर्मित करने वाले कंपनी एचडीडब्लू को काली सूची में डाल दिया गया। मामला था कि उसने २० करोड़ रुपये बैतोर कमिशन दिए हैं। २००५ में केस बंद कर दिया गया। फैसला एचडीडब्लू के पक्ष में रहा।
बोफोर्स घोटाला
१९८७ में एक स्वीडन की कंपनी बोफोर्स एबी से रिश्वत लेने के मामले में राजीव गांधी समेत कई बेड़ नेता फंसे। मामला था कि भारतीय १५५ मिमी. के फील्ड हॉवीत्जर के बोली में नेताओं ने करीब ६४ करोड़ रुपये का घपला किया है।
सिक्योरिटी स्कैम (हर्षद मेहता कांड)
१९९२ में हर्षद मेहता ने धोखाधाड़ी से बैंको का पैसा स्टॉक मार्केट में निवेश कर दिया, जिससे स्टॉक मार्केट को करीब ५००० करोड़ रुपये का घाटा हुआ।
इंडियन बैंक
१९९२ में बैंक से छोटे कॉरपोरेट और एक्सपोटर्स ने बैंक से करीब १३००० करोड़ रुपये उधार लिए। ये धनराशि उन्होंने कभी नहीं लौटाई। उस वक्त बैंक के चेयरमैन एम. गोपालाकृष्णन थे।
चारा घोटाला
१९९६ में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव और अन्य नेताओं ने राज्य के पशु पालन विभाग को लेकर धोखाबाजी से लिए गए ९५० करोड़ रुपये कथित रूप से निगल लिए।
तहलका
इस ऑनलाइन न्यूज पॉर्टल ने स्टिंग ऑपरेशन के जारिए ऑर्मी ऑफिसर और राजनेताओं को रिश्वत लेते हुए पकड़ा। यह बात सामने आई कि सरकार द्वारा की गई १५ डिफेंस डील में काफी घपलेबाजी हुई है और इजराइल से की जाने वाली बारक मिसाइल डीलभी इसमें से एक है।
स्टॉक मार्केट
स्टॉक ब्रोकर केतन पारीख ने स्टॉक मार्केट में १,१५,००० करोड़ रुपये का घोटाला किया। दिसंबर, २००२ में इन्हें गिरफ्तार किया गया।
स्टांप पेपर स्कैम- २०,००० करोड़
यह करोड़ो रुपये के फर्जी स्टांप पेपर का घोटाला था। इस रैकट को चलाने वाला मास्टरमाइंड अब्दुल करीम तेलगी था।
सत्यम घोटाला
२००८ में देश की चौथी बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी सत्यम कंप्यूटर्स के संस्थापक अध्यक्ष रामलिंगा राजू द्वारा १४००० करोड़ रूपये का घोटाले का मामला सामने आया। राजू ने माना कि पिछले सात वर्षों से उसने कंपनी के खातों में हेरा फेरी की।
मनी लांडरिंग
२००९ में मधु कोड़ा को चार हजार करोड़ रुपये की मनी लांडरिंग का दोषी पाया गया। मधु कोड़ा की इस संपत्ति में हॉटल्स, तीन कंपनियां, कलकत्ता में प्रॉपर्टी, थाइलैंड में एक हॉटल और लाइबेरिया ने कोयले की खान शामिल थी।
बोफोर्स घोटाला - ६४ करोड़ रु.
मामला दर्ज हुआ - २२ जनवरी, १९९० सजा - किसी को नहीं वसूली - शून्य
एच.डी. डब्ल्यू सबमरीन- ३२ करोड़ रु.
मामला दर्ज हुआ - ५ मार्च, १९९० (सीबीआई ने अब मामला बंद करने की अनुमति मांगी है।) सजा - किसी को नहीं, वसूली - शून्य
(१९८१ में जर्मनी से ४ सबमरीन खरीदने के ४६५ करोड़ रु. इस मामले में १९८७ तक सिर्फ २ सबमरीन आयीं, रक्षा सौदे से जुड़े लोगों द्वारा लगभग ३२ करोड़ रु. की कमीशनखोरी की बात स्पष्ट हुई।)
स्टाक मार्केट घोटाला- ४१०० करोड़ रु.
मामला दर्ज हुआ - १९९२ से १९९७ के बीच ७२, सजा - हर्षद मेहता (सजा के १ साल बाद मौत) सहित कुल ४ को, वसूली - शून्य
(हर्षद मेहता द्वारा किए गए इस घोटाले में लुटे बैंकों और निवेशकों की भरपाई करने के लिए सरकार ने ६६२५ करोड़ रुपए दिए, जिसका बोझ भी करदाताओं पर पड़ा।)
एयरबस घोटाला- १२० करोड़ रु.
मामला दर्ज हुआ - ३ मार्च, १९९०, सजा - अब तक किसी को नहीं, वसूली - शून्य, (फ्रांस से बोइंग ७५७ की खरीद का सौदा अभी भी अधर में, पैसा वापस नहीं आया)
दूरसंचार घोटाला-१२०० करोड़ रुपए
मामला दर्ज हुआ - १९९६, सजा - एक को, वह भी उच्च न्यायालय में अपील के कारण लंबित, वसूली - ५.३६ करोड़ रुपए
(तत्कालीन दूरसंचार मंत्री सुखराम द्वारा किए गए इस घोटाले में छापे के दौरान उनके पास से ५.३६ करोड़ रुपए नगद मिले थे, जो जब्त हैं। पर गाजियाबाद में घर (१.२ करोड़ रु.), आभूषण (लगभग १० करोड़ रुपए) बैंकों में जमा (५ लाख रु.) शिमला और मण्डी में घर सहित सब कुछ वैसा का वैसा ही रहा। सूत्रों के अनुसार सुखराम के पास उनके ज्ञात स्रोतों से ६०० गुना अधिक सम्पत्ति मिली थी।)
यूरिया घोटाला- १३३ करोड़ रुपए
मामला दर्ज हुआ - २६ मई, १९९६, सजा - अब तक किसी को नहीं, वसूली - शून्य
(प्रधानमंत्री नरसिंहराव के करीबी नेशनल फर्टीलाइजर के प्रबंध निदेशक सी.एस.रामाकृष्णन ने यूरिया आयात के लिए पैसे दिए, जो कभी नहीं आया।)
सी.आर.बी- १०३० करोड़ रुपए
मामला दर्ज हुआ - २० मई, १९९७, सजा - किसी को नहीं, वसूली - शून्य
(चैन रूप भंसाली (सीआरबी) ने १ लाख निवेशकों का लगभग १ हजार ३० करोड़ रु. डुबाया और अब वह न्यायालय में अपील कर स्वयं अपनी पुर्नस्थापना के लिए सरकार से ही पैकेज मांग रहा है।)
केपी- ३२०० करोड़ रुपए
मामला दर्ज हुआ - २००१ में ३ मामले, सजा - अब तक नहीं, वसूली - शून्य
(हर्षद मेहता की तरह केतन पारेख ने बैंकों और स्टाक मार्केट के जरिए निवेशकों को चूना लगाया।)
UP Food Grain Scam 2003, ३५००० हजार करोड़
झारखण्ड चीकतशालय धन कांड २००९
मधु कोड़ा खदान घोटाला २००९
ताज कारीडोर घोटाला उत्तर प्रदेश २००१
2G स्पेक्ट्रम घोटाला - १ लाख ७६ हजार करोड़ का ।
कामन वेल्थ घोटाला - ७०,००० करोड़
खेल के नाम पर ये घोटाले हुए ।
आदर्श हाऊसिंग सोसाईटी घोटाला
हाऊसिंग लोन घोटाला
बेलेकेरिया पोर्ट घोटाला कर्नाटका
कर्नाटका वक्फ बोर्ड घोटाला २००,००० करोड़
नेशनल रुरल हेल्थ मिसन कांड उत्तर प्रदेश १०,००० हजार करोड़
कोयला घोटाला २०१२
१८५,५९१,३४ करोड़ का घोटाला
इन सभी घोटालो पर ध्यान दिया जाय तो किसी भी पार्टी कि छवी साफ़ नज़र नहीं आती, सभी घोटालो के कीचड़ में आकंठ डूबे हुए है । ऐसे में पक्ष और विपक्ष के नेता एक दुसरे पर कीचड़ उछाल रहे है तो इसमें हैरानी कि बात नहीं है और भारत कि जनता कि यह बिडम्बना है कि उसके सामने यह सब हो रहा है और वह मूक दर्शक बनी अपने संपत्ति को लुटवा रही है।
यानी कि अब राजनेताओं में समाज सेवा न होकर केवल भारतीय सम्पतियों को लुटने का काम रह गया है।