Wednesday, November 2, 2011

अन्ना टीम को बदनाम कर केंद्र में बैठी सरकार देश से क्या कहना चाह रही है .

अन्ना टीम के सदस्यों को बदनाम करने कि चाल चल कर केंद्र में आसीन कांग्रेस कि सरकार (कांग्रेस कि सरकार कहना इसलिए उपयुक्त है क्यों कि यूपीए कि सरकार में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी है तथा सभी मुख्य विभाग अगर कुछ को छोड़ दिया जाय तो कांग्रेस के पास ही है।) आखिर भारतीय जनता को क्या बताना चाहती है ? क्या वह यह बताना चाहती है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ वही व्यक्ति आवाज़ उठा सकता है जिसके पुरे जीवन में कभी किसी प्रकार का झूठा या सही कभी कोई आरोप न लगे हों ? ऐसा व्यक्ति तो शायद मिलना मुश्किल ही होगा, क्यों कि वह इंसान ही होगा, भगवान तो आयेगें नहीं, फिर वैसे इंसान को कहाँ तलाश किया जाय। भगवान भी जब इंसान के रूप में इस मृत्युलोक में जन्म लिए है तो उन पर भी आरोप लगे है चाहे त्रेतायुग में रामचंद्र रहे हो या द्वापरयुग में जन्मे श्री कृष्ण। हम सभी तो कलयुग में जी रहे है जिसमे कल, बल और छल ही प्रमुख है अब ऐसे कलयुग में हम कहाँ से वैसे इंसान को लाये जो ऊपर से नीचे तक साफ़, सुथरा और स्वच्छ छवि का हो जो भारत में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठा सके और केंद्र में बैठी कांग्रेस कि सरकार उसका इतिहास, भूगोल खघालने के बाद भी कोई नुक्ताचीनी न निकाल सके ? ऐसा इंसान कहाँ से लाया जाय ? क्यों कि इस भौतिक युग में कांग्रेस जिस इंसान कि उम्मीद कर रही है वैसा इंसान तो मिलना संभव नहीं है और अगर वैसा इंसान नहीं मिलेगा तो फिर भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाने का हक भी नहीं बनता है, क्यों कि कांग्रेस तो बार-बार यही कह रही है चाहे वो कांग्रेस के शिखंडी दिग्विजय सिंह से कहवाये या कोई और प्रवक्ता से। दिग्विजय सिंह एक वरिष्ट कांग्रेसी नेता है उनके बयानों को सुनकर लगता नहीं कि जो शब्द वो बोल रहे है वो शब्द उनके अपने हो, आखिर कबतक ऐसे बयनो को बोल-बोल कर अपनी खिल्ली उडवाते रहेगें ? अब तो लोग उनके बयानों को सुनना भी पसंद नहीं करते है।
आज अन्ना हजारे जनता कि आवाज़ बन गए है क्या कांग्रेस या उसकी सहयोगी पार्टियाँ इन बातो को नहीं समझती है या राजनीती कि कोई और खेल खेली जा रही है। जनता सरकार से क्या मांग कर रही है, यही न कि लोकपाल कानून बनाया जाय, क्यों कि भारतीय जनता भ्रष्टाचार और महंगाई से त्रस्त हो चुकी है इसलिए इसपर अंकुश लगाने के लिए कानून बनाया जाय, वह अपनी चुनी हुई सरकार से लोकपाल कानून बनाने कि मांग कर रही है और सरकार है कि जनता कि बात ही नहीं समझ रही है। केंद्र कि सरकार क्या वह भारतीय जनता कि सहनशीलता देखना चाहती है या वह यह समझ रही है कि अन्ना टीम को तोड़ दो फिर कोई भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाएगा। शायद सरकार यह गलत सोंच रही है। कांग्रेस के ही प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गाँधी ने भी एक बार जनता कि आवाज़ दबाने के लिए पुरे देश में इमरजेंसी लगा दी थी और विपच्छ के जितने भी नेता थे सभी को जेल में डाल दिया गया था जिसका हस्र यह हुआ कि कांग्रेस को पुरे भारत से अपनी सत्ता से हाथ धोना पड़ा था। समय रहते केंद्र कि सरकार को यह समझना चाहिए कि यह लड़ाई अन्ना बनाम कांग्रेस नहीं है बल्कि जनता बनाम कांग्रेस है।


Monday, September 19, 2011

लूट मची है लूट मची, जहाँ भी देखो मची है लूट

लूट मची है लूट मची, जहाँ भी देखो मची है लूट
मंत्री , सांसद या नेता हो चाहे कोई अभिनेता हो
उद्योगपति हो या व्यापारी चाहे कोई हो अधकारी
लूट रहे है ऐसे मिलकर जैसे है नहीं इनका देश
भिखारी तुम बनकर ऐसे लूट रहे हो अपना देश
देश तुम्हारा अपना ही है जिससे है तेरी पहचान
सभी लूटे है तेरे देश को तुम तो लूटना बंद करो
नहीं कोई चंगेज के वंशज नाही तूम अंग्रेज हो
वही लुटेरे लुटेरे थे जो लूट लिए थे तेरे देश को
इच्छाओं पर रोक लगाओ नहीं तो बढ़ता जायेगा
इसकी पूर्ति कभी होगी क्या कोई कर पाया है
क्या तुम पूरा कर पाओगे, जो तेरी अभिलाषा है
नहीं करोगे मरोगे ऐसे त्यागो अब तुम लालच को
देश तुम्हारा अपना ही है इसको अब समृद्ध करो

त्रादसी...


आज़ादी जब मिली हमें तो,
देश बंटा था दो टुकडो में.!

हिंदुस्तान का मस्तक काटा,
फिर बनाया पाकिस्तान.!

जिन्ना कि ही चाहत थी,
देश बंटा था दो हिस्सों में.!

एक हिस्सा इस्लाम को माना,
एक का हुआ था बन्टाधार.!

बन्टाधार में सभी धर्म है,
उसका नाम है हिंदुस्तान.!

धर्म नहीं जब राष्ट कि कोई,
उसका नाम क्यों हिन्दुस्थान.?

#अजय57






Thursday, September 15, 2011

महंगाई क़ी एक और मार

डरे हुए हम लोग सभी है मनमानी कर रही सरकार।
बढ़ा
बढ़ा कर महंगाई को जीना कर दिया है दुश्वार
ऐसा
जीना क्या जीना जहाँ मर मर के हर रोज जिए
जिन्दा हो तो निकलो तुम फिर छीनो अपना अधिकार

एक बार फिर तेल विपणन कंपनियों ने पेट्रोल कि कीमतों में ३.१४ रूपये का इजाफा कर मध्यवर्गीय लोगो कि परेशानियाँ बढ़ा दी है या ये कहे कि उनके मासिक बज़ट पर प्रहार किया है। हर बार तो अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल के दाम महंगे होने से पेट्रोल के दाम बढ़ते थे लेकिन इस बार पेट्रोल का दाम बढने का कारण दूसरा ही है। डालर के मुकाबले रूपये के कमज़ोर होने से कच्चे तेल का आयत महंगा पड़ने कि आड़ में पेट्रोल कि कीमतों में ३.१४ रुपए इजाफा किया गया है। पिछले वर्ष जून से अब तक पेट्रोल के दाम दस बार से ज्यादा बढ़ चुके है अगर बढ़ने कि रफ्तार यही रही तो इस साल के अंत तक पेट्रोल कि किमत १००/- रुपए प्रति लीटर तक पहुँच जायेगा। सरकार ने पेट्रोलियम पदार्थों के मूल्य पर से नियंत्रण मानो कंपनियों की मनमानी के लिए हटा लिया हो। जब मन में आया दाम बढ़ा दिया। कंपनियों के घाटे की चिंता तो सरकार को है। आम आदमी के दम निकलने की चिंता कौन करेगा ?
पेट्रोल की ज्यादा खपत मध्यम वर्ग में होता है। चाहे वो दोपहिया गाड़ी (मोटरसाईकिल, स्कूटर या स्कूटी) या तीन चक्के की गाड़ी ऑटो रिक्शा अगर वो चार चक्के की गाड़ी लेता है तो अधिकांश पेट्रोल माडल ही होता है।
क्या सरकार जनता की परेशानियाँ नहीं समझ रही है। पेट्रोल की कीमत बढने से महंगाई और बढ़ेगी, लोगों पर अतिरिक्त भोझ बढ़ता जायेगा। यह सरकार के हित में भी गलत ही होगा क्यों की जनता सरकार से दूरियां बढ़ाएगी। अगला चुनाव जीतना भी वर्तमान सरकार के लिए मुश्किल हो जायेगा। या कही सरकार यह तो नहीं सोंच रही है की पांच साल के लिए सत्ता जो हाथ में आई है इसमें जीतना लूटना हो लूट लो क्यों की अगला चुनाव तो हम जितने नहीं जा रहे है इसलिए महंगाई दर इतना ऊपर कर दो की अगले चुनाव के बाद जो सरकार चुन कर आएगी उसे मुसीबतों का सामना करना पड़े। फिर हमारे पास बहुत समय रहेगा नई सरकार को बदनाम करने के लिए और तबतक जनता हमारी गलतियों को भूल गई रहेगी। (यानि की पांच साल के अन्तराल के बाद सत्ता में आने का खेल शुरू होगा)
महंगाई का अगर आलम यही रहा तो लोग अन्दर ही अन्दर टूटते जायेगें (आक्रोशित होंगे) नतीजा यह होगा की लोग सडको पर फिर से उतरेगे और इस बार कोई अन्ना नहीं होंगे बल्कि जनता होगी सिर्फ आक्रोशित जनता जिसका नेत्रित्व जनता ही करेगी वैसे में हमारे मुट्ठी भर राजनेताओ का क्या होगा जो अपने को राजा समझ बैठे है।

लालच बुरी बला है बचपन में पढ़ा था मैंने

लालच बुरी बला है
बचपन
में पढ़ा था मैंने
लालच बुरी बला को
मै
छोड़ दिया था पहले
था आदर्श कुछ अपना भी
नहीं
इसे अपनाएंगे
रुखी सुखी खायेंगे
पर मस्तक नहीं झुकायेंगे
बचपन से जब हम जंवा हुए
अपने
पैरों पर खड़ा हुए
बचपन कि वो सब बाते
मै
भूल गया था अबतक
अब याद नहीं आदर्श कि बाते
याद
नहीं है बचपन
कंधो पर जब बोझ पड़ा तो
भूल गया आदर्श कि बाते
अब याद नहीं आदर्श कि बाते
चाह है आगे बढ़ने कि
जो मिल जाता वो छोटा है
जो नहीं मिला उसे पाना है
मै मृगतृष्णा में भटक गया
और लालच में फंसता ही गया
इस लालच का कोई अंत नहीं है
यह तो बढ़ता जाता है
इस लालच में है गँवा दिए
अपना जमीन अपना ज़मीर
अब गया वो बचपन गई जवानी
बुढ़ापे संग डोल रहा
पाया क्या है समझ न आता
जो खोया वह सोंच रहा
खो दिया मै जीवन अपना
हाथ लगा ना कोई सपना

Monday, September 5, 2011

...आवाज़...: अन्ना कि ललकार

...आवाज़...: अन्ना कि ललकार: अन्ना कि ललकार पर उमड़ा जन सैलाब है।
आगे-आगे बढ़ते जाओ मंजिल तेरे पास है।।
थकना नहीं न डरना है बस आगे ही बढना है।
आगे बढ़कर लेलो त...