Saturday, September 3, 2011

जन-आन्दोलन

अन्ना हजारे का आन्दोलन एक सवाल खड़ा करता है भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश में इतने बृहत् पैमाने पर जन-आन्दोलन क्यों सफल होता है। एक तरफ जनता खड़ी तो दूसरी तरफ सरकार। भारत को आज़ादी मिले ६४ साल ही हुआ है लेकिन इन ६४ सालों में ऐसा जन-आन्दोलन दो बार हो चूका है। पहला जन-आन्दोलन १९७४ में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेत्रित्व में हुआ था उस समय भी केंद्र में कांग्रेस पार्टी ही सत्ता में थी और दूसरा जन-आन्दोलन २०११ में अन्ना हजारे के नेत्रित्व में हुआ और इत्तफाकन इस बार भी केंद्र में कांग्रेस पार्टी ही सत्ता में है।
ऐसे जन-आन्दोलन क्यों सफल होते है:-
[१] जनता द्वारा चुने हुए जन-प्रतिनिधि अपने कार्यो को जनता के हितो में नहीं करते है जिसके कारण जनता के अन्दर आक्रोश बढ़ने लगता है जिसके कारण ऐसे जन-आन्दोलन उभरते है।
[२] लोकतान्त्रिक व्यवस्था में अगर किसी एक पार्टी कि सरकार दो तीन चुनाव जीत कर लगातार सत्ता में रहती है तो वह अपनी मनमानी करने लगती है जिसका असर जनता पर पड़ता है। क्यों कि लगातार सत्ता में रहने वाली सरकार जनता के हितो का ख्याल नहीं रखती है यानि वह निरंकुस शासक कि तरह कार्य करने लगती है और वही पर जनता के अन्दर आक्रोश बढ़ने लगता है फिर वह आक्रोश जन-आन्दोलन का रूप ले लेता है।
पिछला चुनाव जीत कर जब कांग्रेस पार्टी केंद्र कि सत्ता में आई तो सबकुछ ठीक-ठाक था उसने कार्य भी अच्छा किये, भारत कि अर्थ-व्यवस्था को एक नई ऊंचाई दी, जनता को भी लगा कि सरकार देशहित में कार्य कर रही है इसलिए जनता दुसरे चुनाव में कांग्रेस के प्रति ज्यादा उत्सुकता दिखाई और इसके सांसदों कि संख्या पिछले चुनाव के वनिस्पत ज्यादा सांसद चुनाव जीत कर लोकसभा में आये। शायद जनता से यही चुक हुई जिसका फायदा कांग्रेस पार्टी ने उठाई।
दुसरे दौर में कांग्रेस पार्टी केंद्र कि सत्ता पर फिर काबिज़ हुई और उसके बाद महंगाई बे-लगाम बढती गई, सरकार ने ध्यान ही नहीं दिया कि इस बढती महंगाई में जनता कैसे अपने जीवन को चला पाएंगी मध्यमवर्ग और नीचलावर्ग इस महंगाई में पीस ही गया लोगों का जीवन स्तर ऊपर उठने के बजाय और नीचे ही गिरता चला गया। जो इस महंगाई का सामना नहीं कर पाए वो दुनियां से ही पलायन कर गए। इस महंगाई के दौर में अमीर और अमीर बना और गरीब और गरीब हुआ। यह सरकार के गलत नीतियों का ही परिणाम था।
इसी सरकार में कुछ इतने बड़े-बड़े घोटाले हुए जिसकी कल्पना भी आम जनता नहीं कर सकती है। 2G स्पैक्ट्रम घोटाल १७६३७९ करोड़ रूपये का , कामन वेल्थ गेम घोटाला यह ८००० करोड़ रुपये का , आदर्श हाऊसिंग सोसाइटी घोटाला (कारगिल युद्ध में शहीद सैनिको के परिजनों के लिए तथा कारगिल के वीरों के लिए) और न जाने छोटे बड़े कितने घोटाले होंगे जो उजागर नहीं हो पाए है।
स्विट्जरलैंड के बैंक में सत्तर लाख करोड़ रुपया भारत का जो कालाधन के रूप में पड़ा है उसके लिए भी सरकार कोई पहल नहीं कर रही है ताकि उस रुपये को भारत लाकर देश को एक सम्प्पन राष्ट बनाया जा सके।
देश कि आर्थिक स्थिति सुधरी है लेकिन किसके लिए क्या गाँव में रहने वाला किसान जो पूरी जिंदगी खेतो में हल चला कर भी दो वक्त कि रोटियां नहीं जुटा पाता है अपने परिवार को एक अच्छी जिंदगी नहीं दे पाता है। वह मजदुर जो गावों में रहता है जो पूरी जिन्दगी मजदूरी करता है फिर भी कभी पेट भर खाना नहीं खा पाता है। उसे क्या मालूम कि देश तरक्की कर रहा है, क्यों कि उसके दिनचर्या में कोई तबदीली नहीं आई है जैसा वह कल था वैसा ही आज भी है।
लोकसभा और राज्यसभा में जितने भी सांसद है वो सभी करोडपती या अरबपती है (वो भले ही पहले गरीबी से आये हो लेकिन आज वो गरीब नहीं है ) ये गरीबो के बारे क्या सोंचेगे इनको तो कारपोरेट घराने से मतलब है और ये कार्पोरेट घराने के लिए काम भी करते है और उन्ही के हितो के लिए संसद में कानून भी बनाते है।
संसद में सच्चे समाजसेवी नेताओं कि संख्या कम होने लगी है जब कोई समाजसेवी नेता सांसद बनता है तो वह समाज कि हितो कि बात करता है या उनके लिए उनके हितो के लिए संसद में आवाज़ उठता है लेकिन अब चुनाव हाईटेक हो गया है। अब चुनाव जीतने के लिए ज्यादा पैसो कि जरुरत पड़ती है। अब उम्मीदवार ऐ सी रूम में बैठ कर चुनाव जीतने कि प्लानिंग करते है और चुनाव जीतते है। जब ये बेशुमार पैसे खर्च कर चुनाव जीतते है तो फिर गरीबो के बारे में क्यों सोंचेंगे ?
अब भारतीय राजनीत में अधिवक्ताओ कि संख्या तेजी से बढ़ने लगी है वर्तमान सरकार में ज्यादातर मंत्रिपद अधिवक्ता के ही हाथ में है साथ ही साथ विपच्छ में भी लोकसभा और राज्यसभा में विपच्छ के नेता पद पर अधिवक्ता ही विराजमान है। अब ये अधिवक्ता अपने केश के लिए उलटे सीधे गवाह खड़ा करते है सच को झूठ और झूठ को सच बनाकर केश जीतते है। तो ये समाज का क्या भला कर सकते है ? माना ये पढ़े लिखे अच्छा वक्ता है कानून का ज्ञान इन्ही के पास है लेकिन यह जरुरी नहीं एक अच्छा पढ़ा लिखा व्यक्ति एक अच्छा राजनेता या समाजसेवक बन सके।
अन्ना हजारे का आन्दोलन कामयाब होने का मुख्य कारण यही है कि वर्तमान केंद्र में बैठी सरकार जनता के हितो का ख्याल नहीं किया अगर ख्याल किया होता तो इस तरह का आन्दोलन कभी कामयाब होता ही नहीं। आज जनता अपने चुने हुए जन-प्रतिनिधि तथा सरकार से उदासीन है। ऐसी नौबत क्यों आई इस पर सांसद और सरकार को मंथन करना चाहिए, कहाँ सरकार के कार्यो में चुक हुई जिसके चलते अन्ना हजारे का आन्दोलन कामयाब हुआ और सरकार को उनके मांगों के सामने झुकना पड़ा।


Friday, August 26, 2011

अन्ना कि ललकार

अन्ना कि ललकार पर उमड़ा जन सैलाब है।
आगे-आगे बढ़ते जाओ मंजिल तेरे पास है।।
थकना नहीं न डरना है बस आगे ही बढना है।
आगे बढ़कर लेलो तुम जो तेरा अधिकार है।।
अन्ना कि ललकार पर उमड़ा जन सैलाब है।
अन्ना हजारे के अनशन का आज बारहवा दिन है और वो आज भी उसी मुस्तैदी से खड़े है जैसा कि पहले दिन खड़े थे। भगवन अन्ना के शारीरिक शक्ति को इतनी शक्ति प्रदान करें कि अन्ना जनता कि लड़ाई जीत सके। यह लड़ाई जनता बनाम सांसद हो गई है। हमारे जन प्रतिनिधि संसद में जाकर उसी जनता को भूल गए है जो जनता अपना बहुमूल्य वोट देकर इनको संसद में भेजी है। भारत एक लोकतान्त्रिक देश है और लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि होती है ये हमारे सांसद भली प्रकार समझते है फिर ना जाने कौन सी ऐसी लालच है जो जनता कि आवाज़ ये नहीं सुन पा रहें है। जनता में अशीम शक्ति है लेकिन जनता अपनी शक्ति को नहीं पहचानती है जिसका फायदा जन-प्रतिनिधि उठाते रहते है लेकिन जब जनता जाग जाती है तो फिर कोई ताकत उसको रोक नहीं पाति है। जैसे बाढ़ का पानी, चक्रवात, तूफ़ान, ज्वालामुखी इन सब को रोकना असंभव है उसी प्रकार जन-सैलाब को रोक पाना मुस्किल है जैसे ज्वालामुखी जब तक शांत रहता है तब-तक सब कुछ ठीक-ठाक रहता है लेकिन जब ज्वालामुखी फूटता है तो उसके सैलाब में हर चीज नेस्तनाबूद होते चला जाता है। उसी तरह जन-सैलाब है समय रहते उसकी आवाज़ को पहचान लेनी चाहिए नहीं तो इसके सैलाब में भी सब-कुछ ख़त्म हो जाता है।
यह आन्दोलन अन्ना हजारे ने शुरू तो कि लेकिन अब यह आन्दोलन जनता का आन्दोलन बन गया है और जनता यह समझने लगी है कि अन्ना हजारे उनके लिए अन्न छोड़कर आज बारह दिनों से अनशन पर बैठे है लेकिन संसद में बैठे हमारे सांसद जनता कि भावनाओं को नहीं समझ पा रहें है। अभी तक सब कुछ शांत है लेकिन जैसे ही अन्ना के साथ कुछ होता है तो फिर इस आन्दोलन को रोक पाना मुस्किल हो जायेगा क्यों कि इस आन्दोलन को नेत्रित्व देने वाले सिर्फ अन्ना है और फिर अन्ना विहीन आन्दोलन किस दिशा में जायेगा यह कहना बहुत मुस्किल है क्यों कि भीड़ का न कोई सोंच है ना कोई सक्ल।
भारतीय जनता एक लड़ाई अंग्रेजो से लड़ी तो देश कि आज़ादी हांसिल कि दूसरी जब लड़ाई लड़ी तो कोंग्रेस पार्टी कि सत्ता को पुरे देश से उखाड़ फेकी अब तीसरी लड़ाई वह भ्रष्टाचार से लड़ रही है और इसमें भी जीत जनता कि ही होगी।

Wednesday, August 24, 2011

भ्रष्टाचार एक बीमारी

भ्रष्टाचार एक लाइलाज बीमारी है जब यह बीमारी किसी को होती है तो उसके लक्छन शारीर पर विभिन्न प्रभाव डालते है :- जैसे
(१) इस बीमारी का प्रभाव सबसे पहले मानव के मस्तिस्क पर होता उसके सोंचने समझने कि शक्ति छिड हो जाती है उसे अच्छे और बुरे में पहचान करना मुस्किल हो जाता, वह सिर्फ और सिर्फ अपने बारे में सोंचता है उसे ज्यादा कोई भी चीज कम ही लगती है उसकी इकच्छाएं अनंत हो जाती है वह थोड़े में यकीन नहीं करता। उसे हर चीज ज्यादा चाहिए (यानि वह असंतोष ग्रसित हो जाता है।)
(२) इस बीमारी का प्रभाव मानव के विचारों पर पड़ता है। एक अच्छे खासे विचारधारा का व्यक्ति बुरे विचारधारा का बन जाता है। उसकी सोंच में विचार में प्रतिदिन परिवर्तन होते है। वह व्यभिचारी और बुरे कर्मो में लिप्त रहने लगता है, चारित्रिक तौर पर उसका पतन हो जाता है। (यानि वह कुकर्म ग्रसित हो जाता है।)
(३) इस बीमारी का प्रभाव मानव के कार्य करने कि छमता पर भी पड़ता है। जो व्यक्ति भ्रटाचार ग्रसित हो जाता है वह अपने मासिक वेतन पर या जो कार्य के लिए जीस कुर्शी पर बैठा है, वह उसके साथ न्याय नहीं कर पाता है और गलत तरीके से पैसे लेकर गलत कार्य करता है। उसमे सही काम करने कि छमता न के बराबर हो जाती है और गलत तरीके से पैसे लेने पर उसकी कार्य छमता दुगनी हो जाती है। मतलब जिस कार्य के लिए उसको मासिक वेतन मिलता है उसके लिए वो वफादार नहीं होता है बल्कि उस व्यक्ति के लिए वह ज्यादा वफादार होता है जो उसको रिश्वत में कुछ पैसे दिए है । (यानि वह भ्रष्टाचार ग्रसित हो जाता है।)
(४) इस बीमारी का प्रभाव भ्रष्टाचार में लिप्त मानव के व्यक्तित्व पर तो पड़ता ही है साथ ही साथ उसके पत्नी, बेटा, बेटी और भाई, बहनों पर भी पड़ता है। गलत तरीके से पैसे आने पर वो भी गलत-गलत सौख पाल लेते है, नतीजा होता है कि सौख को पूरा करने के लिए वह किसी भी स्तर तक नीचे गिरते चले जाते है। आज खुलेआम ऐसे लड़के लड़कियां पार्टी, क्लब, होटल, रेस्टुरेंट वगैरह जगहों पर मिल जायेगें जिनको देख कर आप सोंचने पर मजबूर हो जायेगें कि ये भारतीय है या अंग्रेज, ज्यादातर इसमें वैसे ही लड़के या लड़कियां है जिनके माता या पिता रिश्वत खोर होते है।
(५) इस बीमारी का प्रभाव आदमी को ऐसा लालची और स्वार्थी बना देता है जो अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए वह उन सीमाओं को भी लाँघ जाता है जहाँ मानवता ख़त्म हो जाती है। यानि अपने स्वार्थ के लिए किसी कि जान तक भी ले-लेता है । यह भ्रष्टाचार कि ही देन है जो उपरी तौर पर चमक दमक दिखाई तो देता है किन्तु अन्दर ही अन्दर मानशिक तौर पर खोखला कर देता है।
इन्सान जब स्कूल या कॉलेज में पढाई करता है तब उसके आदर्श और विचार बहुत ऊँचे होते है वह परिवार, समाज और देश को एक दिशा देने कि बात करता है, वह सामाजिक बन्धनों को मान्यता देता है, वह अपने द्वारा अर्जित या मासिक वेतन मिलने पर गरीबों को कुछ हिस्सा देने कि बात करता है, उस वक्त उसमे परोपकार कि भावना देश, समाज और परिवार के प्रति कर्तव्य, इन सभी भावनावों से ओतप्रोत रहता है। पर जब वह सरकारी नौकरी में जाता है तब भी कुछ वर्षो तक वह ठीक ठाक ही रहता है लेकिन जहाँ उसे भ्रष्टाचार रूपी बीमारी ग्रसित करती है तब वह उन सभी आदर्शो को भूल जाता है जो उसने विद्यार्थी जीवन में सोंचा था।

Tuesday, August 23, 2011

पूरे भारत में कांग्रेस को मिले वोट

अन्ना के आन्दोलन से जुड़े अपार जन समूह को देखने के बाद भी हमारे मंत्री और सांसद आन्दोलन के विरोध में बोलने से चुक नहीं रहे है। शायद इसकी खामियाजा आने वाले वक्त में भुगतना पड़ेगा।
हमारे कानून मंत्री श्री सलमान खुर्शीद साहब ने अपनी टिप्पड़ी में यह कहे है कि "सरकार अन्ना के आन्दोलन से कत्तई चिंतित नहीं है, क्यों कि यह आन्दोलन पूरे देश का प्रतिनिधित्व नहीं करता है, एक या दो लाख लोगों कि आवाज़ और उनकी इच्छा महत्वपूर्ण है, लेकिन उनकी इच्छा से ही किसी मुद्दे का हल नहीं हो सकता है।
यानि कि भारत कि जनसंख्या के हिसाब से दो लाख लोंगो कि गिनती नगण्य है जैसा कि सलमान खुर्शीद साहब कह रहे है। अगर भारतीय जनसँख्या का आकलन हम करे तो २०११ में ,२१०,१९३,४२२ जनसँख्या है, अब कांग्रेस पार्टी कि वोट संख्या देख ले जो पिछले चुनाव में मिले है पूरे भारत से , वह १५३४८२३५६ है। यानि कि सवा अरब कि आबादी में कांग्रेस पार्टी को साढ़े पंद्रह करोड़ वोट ही मिले जिसका प्रतिशत 12.६८% होता है तो फिर कांग्रेस पार्टी को कैसे कहा जा सकता है कि वह पूरे देश का नेत्रित्व कर रही है। मै देश कि जनसँख्या और कांग्रेस को मिले वोट कि बात नहीं कर रहा हूँ मैंने केवल आईना दिखाया, कोई भी संख्या बड़ी या छोटी नहीं होती है उसकी मांग को देखिये वह सही है या गलत है
आज जनता अन्ना हजारे के आन्दोलन से जुडती जा रही है हर दिन इसकी संख्या बढती जा रही है यह आन्दोलन दिल्ली से निकल कर भारत के हर बड़े शहरों से होते हुए छोटे शहरों गावों और कस्बो तक पहुँच गई है और आप सांसदों और मंत्रियों को एक दो लाख आदमी ही नज़र रहा है यह एक या दो लाख आदमी नहीं है यह जनता कि आवाज़ है उसकी आवाज़ को पहचानिए और समय रहते उसके जायज मांगो को मान लीजिये कही ऐसा हो कि जनता ही आपको छोड़ दे फिर हाथ मलते रह जाना पड़ेगा समुंदरी तूफ़ान में वही नाविक अपने नाव को किनारे पर ला पाता है जो तूफ़ान कि रुख को पहचान लेता है वैसे बहुत से नाविक उसी तूफ़ान में डूब जाते है जो तूफ़ान के रुख को नहीं पहचान पाते है समय रहते जनता कि आवाज़ को पहचानिए
रही बात जनता कि क्या वह कोई गलत मांग कर रही है वह आपसे जन लोकपाल कानून बनाने कि बात कर रही है क्यों कि जनता तंग चुकी है महंगाई, रिश्वतखोरी, बड़े-बड़े घोटाले, मुनाफाखोरी आदि आदि से


Monday, August 22, 2011

अन्ना का आन्दोलन

दिल्ली की सडकों पर उमड़ा जन सैलाब अद्भुत, अद्वितीय है, यह जन सैलाब दिल्ली की सडको से बढ़ते-बढ़ते अब भारत के हर राज्य, जिला और कस्बो तक बढ़ते जा रहा है, यह किसी को उम्मीद भी नहीं थी की एक छोटा सा आन्दोलन जन सैलाब में परिवर्तित हो जायेगा और भारत के कोने कोने तक पहुँच जायेगा ! इस आन्दोलन से जुड़ रहे लोग ऐसा नहीं की अनपढ़, गंवार और बेवकूफ लोग है बल्कि आज की पढ़ी लिखी २१वी सदी की जनता है वह अपना अच्छा और बुरा भली प्रकार समझती है और दिल्ली जैसे महानगर की जनता इतनी वेवकूफ नहीं है की भीड़ का हिस्सा बने, बल्कि इस आन्दोलन में जुड़े वह लोग है जो सरकार के प्रति उसके गलत नीतियों के प्रति, नीत नए उजागर हो रहे बड़े बड़े घोटाले, महंगाई इस सबसे त्रस्त लोग है उनकी कुंठित पड़ी भवनाएँ अब उबाल पर आ गई है, यह जन आक्रोश ही है जो सड़कों पर नज़र आने लगी है, इस जन सैलाब में शामिल वो लोग है जो अन्दर ही अन्दर कुंठित थे इनको कोई सही प्लेटफार्म नहीं मिल पा रहा था जहाँ अपनी भावनावों और बेवसी को व्यक्त कर सके, वह प्लेटफार्म अन्ना हजारे के आन्दोलन ने दिया जहाँ लोग टुकड़ियों में जुड़ने लगे टुकड़ियाँ भीड़ में तब्दील हुई और भीड़ जन-सैलाब में तब्दील होती चली गई अब तो यह जन-सैलाब भारत के हर शहरों से बढ़ता हुआ गाँव और कस्बो तक पहुँच गया है लेकिन हमारे सांसदों और मंत्रियों को यह समझ नहीं आ रहा है क्या गलत है और क्या सही है ! इसी जनता के द्वारा चुन कर ये सांसद बने है और उसी जनता की भावनावो को ये समझ नहीं पा रहे है, जनता अपना हक मांग रही है वह रिश्वतखोरी, दलाली, मंहगाई, बड़े-बड़े घोटाले इस सब से तंग आ चुकी है और उसके लिए एक जन-लोकपाल कानून बनाने की बात कर रही है तो सरकार वह कानून या तो बनाना नहीं चाहती है या फिर अपने शर्तो पर बनाना चाहती है, शायद संसद में बैठे सांसद या सरकार में बैठे मंत्री यह भूल रहे है जनता की आवाज़ को दबा देंगे, जब भी कोई जन-आन्दोलन हुआ है तो उसका परिणाम भी आया है चाहे वह महात्मा गाँधी का आन्दोलन हो या जयप्रकाश नारायण का उसके परिणाम सामने आये है, महात्मा गाँधी और जयप्रकाश नारायण ने आन्दोलन में अपना नेत्रित्व प्रदान किये और लोग जुड़ते गए इसका परिणाम भी सामने आया एक ने देश को आज़ादी दिलाई तो दुसरे ने केंद्र ही नहीं राज्यों से भी उस कांग्रेस की सरकार को सत्ता विहीन कर दिया जो देश की आज़ादी के बाद से केंद्र और पूरे भारत पर आसन जमाये बैठे था ! अन्ना हजारे तो आन्दोलन को नेत्रित्व ही प्रदान कर रहे है जनता उनके आन्दोलन से अपने आप जुडती जा रही है, इस आन्दोलन का भी परिणाम सामने आएगा, क्यों की जनता में जीतनी शक्ति है वह किसी भी सरकार में नहीं होती है, इसलिए सत्ता में बैठे लोंगो को हवा की रुख का पहचान होना चाहिए, समय रहते चेत जाना चाहिए कही ऐसा ना हो की पांव तले धरती ही खिसक जाये !

Wednesday, December 22, 2010

बिहार गौरव गीत


हमें गर्व है हम है बिहारी , भारत कि शान है ।
जहाँ भी देखो सबसे ऊपर बिहारी का नाम है॥
सीता जी कि जन्मभूमि है ,ज्ञान भूमि यह राम की।
कर्म भूमि यह गाँधी जी की, है इसको अभिमान रे॥
आर्यभट्ट ने शून्य दिया तो, गणनाओ का ज्ञान हुआ।
महावीर और गौतमबुद्ध को यही सत्य का ज्ञान हुआ॥
गुरुगोविंद ने शस्त्र उठाकर शिख्खो को सम्मान दिया।
शेरशाह ने सड़क बना कर एक शूत्र में बांध दिया॥
नालंदा ने ज्योत जला कर पुरे विश्व को ज्ञान दिया ।
बाल्मीकि रामायण लिखकर इसको और महान किया॥
मधुबनी कि भितिचित्रों कि अपनी ही पहचान है ।
सूर्य कि पूजा यहाँ पे होती ऐसा पर्व महान है ॥
कलाकारों में बिस्मिल्ला और ठाकुर जी का नाम है।
दिनकर जी कि है यह भूमि , रेणु की पहचान है ॥
राष्ट्रपति राजेंदर बाबु जयप्रकाश महान है ।
आज़ादी कि लड़ी लड़ाई वीर कुंवर सिंह शान है॥
सम्राटो में अशोक का सबसे ऊपर नाम है ।
गंगा कि यह पावन धरती इसकी यह पहचान है ॥
कल- कल करती नदियाँ बहती हरियाली कि शान है।
पाटलिपुत्र कि इस धरती को बारम-बार प्रणाम है।
हमें गर्व है हम है बिहारी , भारत कि शान है ।
जहाँ भी देखो सबसे ऊपर बिहारी का नाम है॥

Friday, December 3, 2010

हिम्मते मर्दा तो मददे खुदा.

वह बचपन में ही माँ के प्यार से बंचित हो गया था पिता ने दूसरी शादी कर ली थी उसकी उम्र यही कोई सात आठ साल कि रही होगी। उसका बचपन नितांत अकेला था सालो वह अपनी माँ कि यादो में गुमसुम होकर घर के किसी कोने में घंटो आंसू बहाया करता था क्यों कि उसको अपनी माँ से बहुत लगाव था। उसकी माँ क्या गई उसका बचपन ही चला गया। उसकी देख भाल करने वाला भी कोई नहीं था, वह था तो संयुक्त परिवार का ही हिस्सा लेकिन परिवार में भी उसके प्रति किसी कि सोंच सकारात्मक नहीं थी उसका बचपन इन बातों को हमेसा महसुश करता था इसीलिए वह अपने घर में बहुत कम समय गुजार पाता था और अपने बचपन के दोस्तों के साथ ज्यादा समय गुजारता था। जैसे तैसे करके उसने सरकारी स्कूल से मैट्रिक तक कि पढाई कि, मैट्रिक में उसने प्रथम श्रेणी में परीक्षा पास किया जिसके कारण बारह सौ रूपये का उसको स्कालरशिप मिला उस स्कालरशिप के पैसे से ही उसने बीए तक कि पढाई की। पढाई ख़त्म होने के बाद अपने दोस्तों के साथ अपना समय बर्बाद करता था वह समझ नहीं पाता था कि आगे क्या करेगा क्यों कि उसे सही रास्ता बताने वाला भी कोई नहीं था पढाई ख़त्म होने के बाद जब बेकार समय बर्बाद होता है तो लोग उसे आवारा या बदचलन कहते है शायद उसके साथ भी यह बात लागु होती थी जब उसे कोई रास्ता नज़र नहीं आया और हर तरफ से निराष हो गया तो दुसरे शहर में सरकारी नौकरी कर रहे अपने छोटे चाचा से कोई काम धंधा करने के लिए कहा उसके चाचा ने कहा ठीक है तुम मेरे साथ चलो देखता हूँ तुम्हारे लिए कौन सा काम ठीक रहेगा और वो अपने साथ लेकर दुसरे शहर को चले गए क्यों कि वो सरकारी नौकरी में एक अच्छे ओहदे पर थे इसलिए ठीकेदारी करने के लिए उससे कहे और वह ठीकेदारी का काम करने लगा उसके स्वभाव से वह काम मेल नहीं खाता था फिर भी वह काम करता था क्यों कि बेकार से बेगार भला होता है कुछ सालों बाद वह पटना गया और अपने चाचा के घर पर ही रहने लगा चाचा ने शायद उसकी बेबसी को समझे और उससे एक दुकान करने के लिए कहे उसने एक जेनरल स्टोर कि दुकान खोला कुछ सालों बाद उसके चाचा ने एक अच्छी सी लड़की देख उसकी शादी कर दी शादी के बाद कुछ माह तक उसको अपने साथ रखे फिर एक दिन उससे कहे , अब तुम्हारा परिवार हो गया है तुम अपनी जिंदगी अपने तरीके से जियो, इसलिए तुम अपने लिए किराये का मकान लेलो उसने भी अपने चाचा के कहे बातो पर अमल किया और अपने रहने के लिए किराये का मकान ले लिया
समय बीतता गया चार साल में उसके यहाँ दो बच्चो ने जन्म लिया इधर खर्च बढ़ने से उसके व्यापर में नुकसान होता गया नुकसान इतना हुआ कि उसका व्यापर ही बंद हो गया अब उसके पास किराये का मकान था अदद पत्नी और दो छोटे बच्चे हर चीज खरीद कर खाना, आय का कोई जरिया नहीं, आस-पास कोई मददगार भी नहीं, दुकान के वक्त से ही व्यपारियों का चला रहा कुछ बकाया सब मिलाकर हालत बहुत ही दयनीय, फिर भी वह टुटा नहीं बल्कि अन्दर ही अन्दर चट्टान कि तरह अपने इरादों को मजबूत करता गया क्यों कि उसने कुछ सपने पाल रखे थे अपने लिए अपने बच्चो के लिए शायद वह सपने ही उसके हौसले को बुलंद बनाते थे और जीने कि प्रेणना देते थे या ये कहे कि अभाव में गुज़रा उसका बचपन अपने बच्चो को अभाव में परवरिश करना नहीं चाहता था इसलिए बिना पूंजी का उसने व्यापार शुरू किया किराये पर मकान दिलाने का (To-Let Service) जी तोड़ उसने मेहनत करना शुरू किया शुरू में उसे बहुत परेशानिया आई लेकिन धीरे-धीरे सब ठीक होता गया अपनी परिस्थितियों से उसने कभी समझौता नहीं किया और निरंतर अपने काम में वह आगे बढ़ता गया कभी पीछे मुड कर नहीं देखा वह अपने काम के प्रति पूरी तरह लगनशील बना रहा उसके काम करने कि लगन ही निरंतर आगे बढाती गई उसने सरकारी स्कूल में अपनी पढाई कि लेकिन अपने बच्चो को वह प्राइवेट इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढाया उच्च शिच्छा के लिए उसने भारत के दुसरे राज्यों में अपने बच्चो को पढने के लिए भेजा उसके बच्चे पढाई में अच्छे कर रहे है या ये कहे कि अपने पिता के संघर्ष के दिनों को याद रखे है इसलिए एक सुनहरे भविष्य का तानाबाना बुन कर आगे कि तरफ अग्रसर है
यह कहानी उस दिशाहीन युवक कि है जो घोर अभाव में जीवन यापन करने के बाद भी सुनहरे भविष्य का तानाबाना बुना था उसने भविष्य के सपने पाल रखा था और उसके वही सपने जीवन के विकट परिस्थितियों से उसे बाहर निकाल लेते थे संघर्ष कि पथरीली राहों पर निरंतर आगे बढ़ने कि प्रेणना देते थे उसके सपने उसे कभी टूटने नहीं दिए बल्कि उसके इरादों को और मजबूत बनाते गए, बार-बार निराशा हाथ लगने के बाद भी वह दुगने जोश से अपने कामो में लग जाता था, क्यों कि उसके सपने हमेशा उसे क्रियाशिल बनाये हुए थे और वह अपने सपनो को आकर देने में लगा था
उसके सपने अभी पूरी तरह आकर नहीं ले पाए है और वह आज भी क्रियाशिल है अपने सपनो को आकर देने के लिए वह आज भी चट्टान कि तरह डटा है अपने सपनो को साकार करने के लिए
प्रेणना :- भावी युवा पीढ़ी अपने भविष्य के सपने पाले तो वह जीवन में क्रियाशिल बने रहेगे और अपने सपनो को मूर्तरूप दे पायेगे, क्यों कि सपने जीवन में निरंतर आगे बढ़ने कि प्रेणना देते है