दिल्ली की सडकों पर उमड़ा जन सैलाब अद्भुत, अद्वितीय है, यह जन सैलाब दिल्ली की सडको से बढ़ते-बढ़ते अब भारत के हर राज्य, जिला और कस्बो तक बढ़ते जा रहा है, यह किसी को उम्मीद भी नहीं थी की एक छोटा सा आन्दोलन जन सैलाब में परिवर्तित हो जायेगा और भारत के कोने कोने तक पहुँच जायेगा ! इस आन्दोलन से जुड़ रहे लोग ऐसा नहीं की अनपढ़, गंवार और बेवकूफ लोग है बल्कि आज की पढ़ी लिखी २१वी सदी की जनता है वह अपना अच्छा और बुरा भली प्रकार समझती है और दिल्ली जैसे महानगर की जनता इतनी वेवकूफ नहीं है की भीड़ का हिस्सा बने, बल्कि इस आन्दोलन में जुड़े वह लोग है जो सरकार के प्रति उसके गलत नीतियों के प्रति, नीत नए उजागर हो रहे बड़े बड़े घोटाले, महंगाई इस सबसे त्रस्त लोग है उनकी कुंठित पड़ी भवनाएँ अब उबाल पर आ गई है, यह जन आक्रोश ही है जो सड़कों पर नज़र आने लगी है, इस जन सैलाब में शामिल वो लोग है जो अन्दर ही अन्दर कुंठित थे इनको कोई सही प्लेटफार्म नहीं मिल पा रहा था जहाँ अपनी भावनावों और बेवसी को व्यक्त कर सके, वह प्लेटफार्म अन्ना हजारे के आन्दोलन ने दिया जहाँ लोग टुकड़ियों में जुड़ने लगे टुकड़ियाँ भीड़ में तब्दील हुई और भीड़ जन-सैलाब में तब्दील होती चली गई अब तो यह जन-सैलाब भारत के हर शहरों से बढ़ता हुआ गाँव और कस्बो तक पहुँच गया है लेकिन हमारे सांसदों और मंत्रियों को यह समझ नहीं आ रहा है क्या गलत है और क्या सही है ! इसी जनता के द्वारा चुन कर ये सांसद बने है और उसी जनता की भावनावो को ये समझ नहीं पा रहे है, जनता अपना हक मांग रही है वह रिश्वतखोरी, दलाली, मंहगाई, बड़े-बड़े घोटाले इस सब से तंग आ चुकी है और उसके लिए एक जन-लोकपाल कानून बनाने की बात कर रही है तो सरकार वह कानून या तो बनाना नहीं चाहती है या फिर अपने शर्तो पर बनाना चाहती है, शायद संसद में बैठे सांसद या सरकार में बैठे मंत्री यह भूल रहे है जनता की आवाज़ को दबा देंगे, जब भी कोई जन-आन्दोलन हुआ है तो उसका परिणाम भी आया है चाहे वह महात्मा गाँधी का आन्दोलन हो या जयप्रकाश नारायण का उसके परिणाम सामने आये है, महात्मा गाँधी और जयप्रकाश नारायण ने आन्दोलन में अपना नेत्रित्व प्रदान किये और लोग जुड़ते गए इसका परिणाम भी सामने आया एक ने देश को आज़ादी दिलाई तो दुसरे ने केंद्र ही नहीं राज्यों से भी उस कांग्रेस की सरकार को सत्ता विहीन कर दिया जो देश की आज़ादी के बाद से केंद्र और पूरे भारत पर आसन जमाये बैठे था ! अन्ना हजारे तो आन्दोलन को नेत्रित्व ही प्रदान कर रहे है जनता उनके आन्दोलन से अपने आप जुडती जा रही है, इस आन्दोलन का भी परिणाम सामने आएगा, क्यों की जनता में जीतनी शक्ति है वह किसी भी सरकार में नहीं होती है, इसलिए सत्ता में बैठे लोंगो को हवा की रुख का पहचान होना चाहिए, समय रहते चेत जाना चाहिए कही ऐसा ना हो की पांव तले धरती ही खिसक जाये !
Monday, August 22, 2011
अन्ना का आन्दोलन
दिल्ली की सडकों पर उमड़ा जन सैलाब अद्भुत, अद्वितीय है, यह जन सैलाब दिल्ली की सडको से बढ़ते-बढ़ते अब भारत के हर राज्य, जिला और कस्बो तक बढ़ते जा रहा है, यह किसी को उम्मीद भी नहीं थी की एक छोटा सा आन्दोलन जन सैलाब में परिवर्तित हो जायेगा और भारत के कोने कोने तक पहुँच जायेगा ! इस आन्दोलन से जुड़ रहे लोग ऐसा नहीं की अनपढ़, गंवार और बेवकूफ लोग है बल्कि आज की पढ़ी लिखी २१वी सदी की जनता है वह अपना अच्छा और बुरा भली प्रकार समझती है और दिल्ली जैसे महानगर की जनता इतनी वेवकूफ नहीं है की भीड़ का हिस्सा बने, बल्कि इस आन्दोलन में जुड़े वह लोग है जो सरकार के प्रति उसके गलत नीतियों के प्रति, नीत नए उजागर हो रहे बड़े बड़े घोटाले, महंगाई इस सबसे त्रस्त लोग है उनकी कुंठित पड़ी भवनाएँ अब उबाल पर आ गई है, यह जन आक्रोश ही है जो सड़कों पर नज़र आने लगी है, इस जन सैलाब में शामिल वो लोग है जो अन्दर ही अन्दर कुंठित थे इनको कोई सही प्लेटफार्म नहीं मिल पा रहा था जहाँ अपनी भावनावों और बेवसी को व्यक्त कर सके, वह प्लेटफार्म अन्ना हजारे के आन्दोलन ने दिया जहाँ लोग टुकड़ियों में जुड़ने लगे टुकड़ियाँ भीड़ में तब्दील हुई और भीड़ जन-सैलाब में तब्दील होती चली गई अब तो यह जन-सैलाब भारत के हर शहरों से बढ़ता हुआ गाँव और कस्बो तक पहुँच गया है लेकिन हमारे सांसदों और मंत्रियों को यह समझ नहीं आ रहा है क्या गलत है और क्या सही है ! इसी जनता के द्वारा चुन कर ये सांसद बने है और उसी जनता की भावनावो को ये समझ नहीं पा रहे है, जनता अपना हक मांग रही है वह रिश्वतखोरी, दलाली, मंहगाई, बड़े-बड़े घोटाले इस सब से तंग आ चुकी है और उसके लिए एक जन-लोकपाल कानून बनाने की बात कर रही है तो सरकार वह कानून या तो बनाना नहीं चाहती है या फिर अपने शर्तो पर बनाना चाहती है, शायद संसद में बैठे सांसद या सरकार में बैठे मंत्री यह भूल रहे है जनता की आवाज़ को दबा देंगे, जब भी कोई जन-आन्दोलन हुआ है तो उसका परिणाम भी आया है चाहे वह महात्मा गाँधी का आन्दोलन हो या जयप्रकाश नारायण का उसके परिणाम सामने आये है, महात्मा गाँधी और जयप्रकाश नारायण ने आन्दोलन में अपना नेत्रित्व प्रदान किये और लोग जुड़ते गए इसका परिणाम भी सामने आया एक ने देश को आज़ादी दिलाई तो दुसरे ने केंद्र ही नहीं राज्यों से भी उस कांग्रेस की सरकार को सत्ता विहीन कर दिया जो देश की आज़ादी के बाद से केंद्र और पूरे भारत पर आसन जमाये बैठे था ! अन्ना हजारे तो आन्दोलन को नेत्रित्व ही प्रदान कर रहे है जनता उनके आन्दोलन से अपने आप जुडती जा रही है, इस आन्दोलन का भी परिणाम सामने आएगा, क्यों की जनता में जीतनी शक्ति है वह किसी भी सरकार में नहीं होती है, इसलिए सत्ता में बैठे लोंगो को हवा की रुख का पहचान होना चाहिए, समय रहते चेत जाना चाहिए कही ऐसा ना हो की पांव तले धरती ही खिसक जाये !
Wednesday, December 22, 2010
बिहार गौरव गीत

हमें गर्व है हम है बिहारी , भारत कि शान है ।
जहाँ भी देखो सबसे ऊपर बिहारी का नाम है॥
जहाँ भी देखो सबसे ऊपर बिहारी का नाम है॥
सीता जी कि जन्मभूमि है ,ज्ञान भूमि यह राम की।
कर्म भूमि यह गाँधी जी की, है इसको अभिमान रे॥
आर्यभट्ट ने शून्य दिया तो, गणनाओ का ज्ञान हुआ।
महावीर और गौतमबुद्ध को यही सत्य का ज्ञान हुआ॥
गुरुगोविंद ने शस्त्र उठाकर शिख्खो को सम्मान दिया।
शेरशाह ने सड़क बना कर एक शूत्र में बांध दिया॥
नालंदा ने ज्योत जला कर पुरे विश्व को ज्ञान दिया ।
बाल्मीकि रामायण लिखकर इसको और महान किया॥
मधुबनी कि भितिचित्रों कि अपनी ही पहचान है ।
सूर्य कि पूजा यहाँ पे होती ऐसा पर्व महान है ॥
कलाकारों में बिस्मिल्ला और ठाकुर जी का नाम है।
दिनकर जी कि है यह भूमि , रेणु की पहचान है ॥
राष्ट्रपति राजेंदर बाबु जयप्रकाश महान है ।
आज़ादी कि लड़ी लड़ाई वीर कुंवर सिंह शान है॥
सम्राटो में अशोक का सबसे ऊपर नाम है ।
गंगा कि यह पावन धरती इसकी यह पहचान है ॥
कल- कल करती नदियाँ बहती हरियाली कि शान है।
पाटलिपुत्र कि इस धरती को बारम-बार प्रणाम है।
हमें गर्व है हम है बिहारी , भारत कि शान है ।
जहाँ भी देखो सबसे ऊपर बिहारी का नाम है॥
कर्म भूमि यह गाँधी जी की, है इसको अभिमान रे॥
आर्यभट्ट ने शून्य दिया तो, गणनाओ का ज्ञान हुआ।
महावीर और गौतमबुद्ध को यही सत्य का ज्ञान हुआ॥
गुरुगोविंद ने शस्त्र उठाकर शिख्खो को सम्मान दिया।
शेरशाह ने सड़क बना कर एक शूत्र में बांध दिया॥
नालंदा ने ज्योत जला कर पुरे विश्व को ज्ञान दिया ।
बाल्मीकि रामायण लिखकर इसको और महान किया॥
मधुबनी कि भितिचित्रों कि अपनी ही पहचान है ।
सूर्य कि पूजा यहाँ पे होती ऐसा पर्व महान है ॥
कलाकारों में बिस्मिल्ला और ठाकुर जी का नाम है।
दिनकर जी कि है यह भूमि , रेणु की पहचान है ॥
राष्ट्रपति राजेंदर बाबु जयप्रकाश महान है ।
आज़ादी कि लड़ी लड़ाई वीर कुंवर सिंह शान है॥
सम्राटो में अशोक का सबसे ऊपर नाम है ।
गंगा कि यह पावन धरती इसकी यह पहचान है ॥
कल- कल करती नदियाँ बहती हरियाली कि शान है।
पाटलिपुत्र कि इस धरती को बारम-बार प्रणाम है।
हमें गर्व है हम है बिहारी , भारत कि शान है ।
जहाँ भी देखो सबसे ऊपर बिहारी का नाम है॥
Friday, December 3, 2010
हिम्मते मर्दा तो मददे खुदा.
वह बचपन में ही माँ के प्यार से बंचित हो गया था पिता ने दूसरी शादी कर ली थी उसकी उम्र यही कोई सात आठ साल कि रही होगी। उसका बचपन नितांत अकेला था सालो वह अपनी माँ कि यादो में गुमसुम होकर घर के किसी कोने में घंटो आंसू बहाया करता था क्यों कि उसको अपनी माँ से बहुत लगाव था। उसकी माँ क्या गई उसका बचपन ही चला गया। उसकी देख भाल करने वाला भी कोई नहीं था, वह था तो संयुक्त परिवार का ही हिस्सा लेकिन परिवार में भी उसके प्रति किसी कि सोंच सकारात्मक नहीं थी उसका बचपन इन बातों को हमेसा महसुश करता था इसीलिए वह अपने घर में बहुत कम समय गुजार पाता था और अपने बचपन के दोस्तों के साथ ज्यादा समय गुजारता था। जैसे तैसे करके उसने सरकारी स्कूल से मैट्रिक तक कि पढाई कि, मैट्रिक में उसने प्रथम श्रेणी में परीक्षा पास किया जिसके कारण बारह सौ रूपये का उसको स्कालरशिप मिला उस स्कालरशिप के पैसे से ही उसने बीए तक कि पढाई की। पढाई ख़त्म होने के बाद अपने दोस्तों के साथ अपना समय बर्बाद करता था। वह समझ नहीं पाता था कि आगे क्या करेगा क्यों कि उसे सही रास्ता बताने वाला भी कोई नहीं था। पढाई ख़त्म होने के बाद जब बेकार समय बर्बाद होता है तो लोग उसे आवारा या बदचलन कहते है शायद उसके साथ भी यह बात लागु होती थी। जब उसे कोई रास्ता नज़र नहीं आया और हर तरफ से निराष हो गया तो दुसरे शहर में सरकारी नौकरी कर रहे अपने छोटे चाचा से कोई काम धंधा करने के लिए कहा। उसके चाचा ने कहा ठीक है तुम मेरे साथ चलो देखता हूँ तुम्हारे लिए कौन सा काम ठीक रहेगा और वो अपने साथ लेकर दुसरे शहर को चले गए। क्यों कि वो सरकारी नौकरी में एक अच्छे ओहदे पर थे इसलिए ठीकेदारी करने के लिए उससे कहे और वह ठीकेदारी का काम करने लगा। उसके स्वभाव से वह काम मेल नहीं खाता था फिर भी वह काम करता था क्यों कि बेकार से बेगार भला होता है। कुछ सालों बाद वह पटना आ गया और अपने चाचा के घर पर ही रहने लगा। चाचा ने शायद उसकी बेबसी को समझे और उससे एक दुकान करने के लिए कहे। उसने एक जेनरल स्टोर कि दुकान खोला। कुछ सालों बाद उसके चाचा ने एक अच्छी सी लड़की देख उसकी शादी कर दी। शादी के बाद कुछ माह तक उसको अपने साथ रखे फिर एक दिन उससे कहे , अब तुम्हारा परिवार हो गया है तुम अपनी जिंदगी अपने तरीके से जियो, इसलिए तुम अपने लिए किराये का मकान लेलो। उसने भी अपने चाचा के कहे बातो पर अमल किया और अपने रहने के लिए किराये का मकान ले लिया।समय बीतता गया चार साल में उसके यहाँ दो बच्चो ने जन्म लिया इधर खर्च बढ़ने से उसके व्यापर में नुकसान होता गया। नुकसान इतना हुआ कि उसका व्यापर ही बंद हो गया। अब उसके पास किराये का मकान था अदद पत्नी और दो छोटे बच्चे। हर चीज खरीद कर खाना, आय का कोई जरिया नहीं, आस-पास कोई मददगार भी नहीं, दुकान के वक्त से ही व्यपारियों का चला आ रहा कुछ बकाया। सब मिलाकर हालत बहुत ही दयनीय, फिर भी वह टुटा नहीं बल्कि अन्दर ही अन्दर चट्टान कि तरह अपने इरादों को मजबूत करता गया। क्यों कि उसने कुछ सपने पाल रखे थे अपने लिए अपने बच्चो के लिए। शायद वह सपने ही उसके हौसले को बुलंद बनाते थे और जीने कि प्रेणना देते थे। या ये कहे कि अभाव में गुज़रा उसका बचपन अपने बच्चो को अभाव में परवरिश करना नहीं चाहता था इसलिए बिना पूंजी का उसने व्यापार शुरू किया किराये पर मकान दिलाने का (To-Let Service) जी तोड़ उसने मेहनत करना शुरू किया। शुरू में उसे बहुत परेशानिया आई लेकिन धीरे-धीरे सब ठीक होता गया। अपनी परिस्थितियों से उसने कभी समझौता नहीं किया और निरंतर अपने काम में वह आगे बढ़ता गया कभी पीछे मुड कर नहीं देखा। वह अपने काम के प्रति पूरी तरह लगनशील बना रहा। उसके काम करने कि लगन ही निरंतर आगे बढाती गई। उसने सरकारी स्कूल में अपनी पढाई कि लेकिन अपने बच्चो को वह प्राइवेट इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढाया। उच्च शिच्छा के लिए उसने भारत के दुसरे राज्यों में अपने बच्चो को पढने के लिए भेजा। उसके बच्चे पढाई में अच्छे कर रहे है या ये कहे कि अपने पिता के संघर्ष के दिनों को याद रखे है इसलिए एक सुनहरे भविष्य का तानाबाना बुन कर आगे कि तरफ अग्रसर है।
यह कहानी उस दिशाहीन युवक कि है जो घोर अभाव में जीवन यापन करने के बाद भी सुनहरे भविष्य का तानाबाना बुना था। उसने भविष्य के सपने पाल रखा था और उसके वही सपने जीवन के विकट परिस्थितियों से उसे बाहर निकाल लेते थे। संघर्ष कि पथरीली राहों पर निरंतर आगे बढ़ने कि प्रेणना देते थे। उसके सपने उसे कभी टूटने नहीं दिए बल्कि उसके इरादों को और मजबूत बनाते गए, बार-बार निराशा हाथ लगने के बाद भी वह दुगने जोश से अपने कामो में लग जाता था, क्यों कि उसके सपने हमेशा उसे क्रियाशिल बनाये हुए थे और वह अपने सपनो को आकर देने में लगा था।
उसके सपने अभी पूरी तरह आकर नहीं ले पाए है और वह आज भी क्रियाशिल है अपने सपनो को आकर देने के लिए। वह आज भी चट्टान कि तरह डटा है अपने सपनो को साकार करने के लिए।
प्रेणना :- भावी युवा पीढ़ी अपने भविष्य के सपने पाले तो वह जीवन में क्रियाशिल बने रहेगे और अपने सपनो को मूर्तरूप दे पायेगे, क्यों कि सपने जीवन में निरंतर आगे बढ़ने कि प्रेणना देते है।
यह कहानी उस दिशाहीन युवक कि है जो घोर अभाव में जीवन यापन करने के बाद भी सुनहरे भविष्य का तानाबाना बुना था। उसने भविष्य के सपने पाल रखा था और उसके वही सपने जीवन के विकट परिस्थितियों से उसे बाहर निकाल लेते थे। संघर्ष कि पथरीली राहों पर निरंतर आगे बढ़ने कि प्रेणना देते थे। उसके सपने उसे कभी टूटने नहीं दिए बल्कि उसके इरादों को और मजबूत बनाते गए, बार-बार निराशा हाथ लगने के बाद भी वह दुगने जोश से अपने कामो में लग जाता था, क्यों कि उसके सपने हमेशा उसे क्रियाशिल बनाये हुए थे और वह अपने सपनो को आकर देने में लगा था।
उसके सपने अभी पूरी तरह आकर नहीं ले पाए है और वह आज भी क्रियाशिल है अपने सपनो को आकर देने के लिए। वह आज भी चट्टान कि तरह डटा है अपने सपनो को साकार करने के लिए।
प्रेणना :- भावी युवा पीढ़ी अपने भविष्य के सपने पाले तो वह जीवन में क्रियाशिल बने रहेगे और अपने सपनो को मूर्तरूप दे पायेगे, क्यों कि सपने जीवन में निरंतर आगे बढ़ने कि प्रेणना देते है।
Tuesday, November 30, 2010
एक आम आदमी (श्रधांजलि)
हाँ उनका नाम राम ईश्वर ही था लेकिन हम लोग उनको मुंशी जी कहते थे यही कोई उनकी उम्र साठ, पैसठ साल कि होगी। वो अपने काम के प्रति ईमानदार थे तथा अपने मालिक के प्रति बहुत ही वफादार थे। जिस माकन में मै किराया पर रहता हूँ उसी मकान में वो दरवान का काम करते थे। पिछले तीस सालों से वो मकान मालिक अशोक सिंह के साथ रह रहे थे क्यों कि मकान मालिक अशोक सिंह पहले ठीकेदारी का काम करते थे तब से राम ईश्वर उनके यहाँ मुंशी का काम करते थे। जिस मकान में मै किराये पर रहता हूँ वह मकान मुंशी जी के ही देख रेख में बनी थी और फिर उसी मकान में मुंशी जी दरवान का काम करने लगे थे। मकान मालिक भी उनके रहने के लिए चौथे माले के पानी टंकी के ऊपर एक कमरा बनवा दिए थे उसी में मुंशी जी रहते थे तथा घर कि रखवाली भी करते थे। उनकी दिनचर्या में शामिल था सुबह पांच बजे उठ जाना तथा नित्य क्रियावों से निवृत होकर घर का मेन गेट खोलना तथा हाथ में एक छोला लेकर फुल तोड़ने के लिए घर से निकल जाना, फुल तोड़ कर आने के बाद दस बारह भागो में कुड़ी बना कर प्लास्टिक के थैले में रख कर जितने भी किरायेदार थे सभी के दरवाजे पर थैले को टांगना तथा काल बेल को दबाना ताकि घर वाले को यह जानकारी हो जाये कि मुंशी जी फुल का थैला दरवाजे पर टांग दिए है। हाँ यह अलग बात है कि उस फुल के बदले में पचास रुपया माहवारी वो किरायेदार से लेते थे। किसी के कहे हुए काम को वो अवश्य करते थे कभी ना नहीं कहते थे। बहुत ही सादा जीवन उनका था। वो अपना खाना लकड़ी के चूल्हे पर खुद ही बनाते थे। वो अकेले ही रहते थे इधर कुछ दिनों से उनकी उनकी बेटी जो मात्र नव या दस साल कि होगी साथ रहती थी। गाँव में उनकी पत्नी दो बेटा तथा तीन बेटियां रहती थी। बड़े बेटे कि शादी कर दिए थे जो अपने परिवार के साथ अलग रहता था एक बेटा तथा तीन बेटियां अभी छोटी है और मुंशी जी पर परिवार कि जिम्मेवारी बहुत ज्यादा थी शायद इसी चिंता में मुंशी जी का स्वास्थ दिनों दिन गिरता ही जा रहा था लेकिन वो इतने स्वाभिमानी थे कि अपने दुःख को वो किसी से जाहिर नहीं करते थे। अभी पिछले बीस दिनों पहले उनको कुत्ता ने काट दिया था वो दौड़े हुए आये और मेरे घर का काल बेल दबाये मैंने दरवाजा खोला और कुछ पूछता उसके पहले ही वो बोले मुझे कुत्ता काट लिया है, मै अपनी पत्नी से कहा मुंशी जी को कुत्ता काट लिया है डीटाल लगाकर धो दो और अशोक सिंह को खबर कर दो, ऐसा ही हुआ फिर अशोक सिंह आये और मुंशी जी को अपने गाड़ी में बैठाकर डाक्टर के पास लेकर गए। फिर सुई दवा दिलाकर कुत्ता के काटे हुए जगह पर बैडेज करा कर लाये तथा मुंशी जी को हिदायत दिए कि आपको कही आना-जाना नहीं है आप आराम कीजिये। पहला दिन तो मुंशी जी ने कोई काम नहीं किये लेकिन दुसरे दिन से फिर अपनी दिनचर्या में लग गए। शायद यह उनकी गरीबी थी जो कुत्ता काटने कि स्थिति में भी अपना काम कर रहे थे। इधर २६ या २७ दिसंबर को मुशी जी को ठंड लग गई थी क्यों कि सुबह पांच बजे मुंशी जी फुल तोड़ने के लिए घर से बहार निकल जाते थे शायद सुबह में ही उनको ठंड लग गई होगी। उनको मालूम तब हुआ जब उनको तेज बुखार हो गया तथा एक दो बार कय कर दिए। शयद वो अपने मालिक से कहे होंगे उन्हों ने कुछ दवाइयां दिलवा दी थी वो दवाइयां खा लिए, मुंशी जी जो बराबर नीचे सोते थे २७ दिसम्बर कि रात को वो ऊपर छत पर सोने चले गये। उनके मालिक कहे भी आपकी तबियत ख़राब है आप नीचे ही सोइए लेकिन पता नहीं क्यों वो ऊपर ही चले गए सोने के किये। अचानक २८ दिसंबर कि सुबह साढ़े पांच या छे बजे मेरे फ्लैट का काल बेल बजा और आवाज़ आई मुंशी जी को कुछ हो गया है ऊपर आइये। घबडाये से हम पति पत्नी ऊपर गए देखा सभी फ्लैट के लोग ऊपर में है तथा मुंशी जी छत पर खुले आसमान के नीचे चीत पड़े हुए थे। मुझे उनकी बीमारी कि जानकारी सिर्फ इतनी थी कि उनको हल्का बुखार लगा है इसलिए पूछा क्या हुआ मुंशी जी को, उनकी बच्ची बताई पेशाब करने के लिए रूम से निकले थे पेशाब करने के बाद गिर गए। हम सभी लोगो ने कहा इनको लेकर डाक्टर के पास चला जाय। उनको गाड़ी में लादकर हास्पिटल के लिए भागे। दो हास्पिटल में जो कि बड़ी हास्पिटल है इमरजेंसी में कोई डाक्टर नहीं मिला फिर तीसरे हास्पिटल में उनको लेकर हमलोग आये। यहाँ डाक्टर देख कर बोला अब ये नहीं रहे। यानि कि मुंशी जी कि मृत्यु हो गई थी। गाँव से उनका छोटा बेटा और पत्नी आये और मुंशी जी के पार्थिक शारीर को लेकर अपने गाँव चले गए।एक आम आदमी कि मृत्यु हो गई। जो पूरी जिन्दगी दुसरे का काम करते हुए गुजार दी, अपने लिए अपने बच्चो के भविष्य के लिए कुछ भी नहीं किया था। उसके सामने उसकी पूरी जिम्मेदारियां और जबाबदेहियाँ पड़ी कि पड़ी रह गई और वो इस दुनियाँ से कूच कर गया। उसके तीन छोटी मासूम बच्चियाँ, बेटा और पत्नी सभी अनाथ हो गए। अब उसके बच्चो का क्या होगा ?
यह मेरी एक छोटी सी श्रधांजली है उस नेक ईमानदार और कर्मशील व्यक्ति को है जो झोपड़े में जिंदगी गुजारी, अपने बच्चो के भविष्य के लिए कुछ नहीं किया लेकिन अपने मालिक के लिए आलीशान महल खड़ा किया।
यह मेरी एक छोटी सी श्रधांजली है उस नेक ईमानदार और कर्मशील व्यक्ति को है जो झोपड़े में जिंदगी गुजारी, अपने बच्चो के भविष्य के लिए कुछ नहीं किया लेकिन अपने मालिक के लिए आलीशान महल खड़ा किया।
Thursday, November 25, 2010
काम को इनाम (बिहार चुनाव परिणाम)
बिहार विधान सभा चुनाव परिणाम में एनडीए को तीन चौथाई बहुमत का मिलना यह जताता है कि "जो सरकार काम करेगी वही राज करेगी"। पिचले पांच सालों में एनडीए कि सरकार ने बिहार में जो काम किया उसके एवज में बिहार के लोगों ने जातिवाद की रेखा को पार कर अपने मताधिकार का प्रयोग कर एक ऐसे गठबंधन पार्टी को पूर्ण जनादेश दिया जो पिचले पांच वर्षो में काम कर बिहार को जंगल राज से उबार एक ऐसे रास्ते पर अग्रसर किया जहाँ से बिहार की अपनी पहचान बनानी शुरू हुई। आज बिहार की जो गरिमा बनी है वह पिछले एनडीए सरकार की देन है।अगर हम पिछले पांच वर्षों को छोड़ दें और उसके पीछे के पंद्रह वर्षों के अतीत में झांके तो एक बदहाल बिहार नज़र आता है। जहाँ उंच-नीच का वेदभाव, जाति-जाति में टकराव, नक्सलवाद का बोलबाला, फलता-फूलता अपहरण उद्योग, अपराधिक एवं राजनितिक सांठ-गाँठ, अपराधिक तत्वों का बोलबाला, ला एंड आडर का बुरा हाल, जर्जर सड़कें, सरकारी हस्पतालों का बुरा हाल, शिच्छा के स्तर का मटियामेट होना, बंद पड़े उद्योग धंधे, जीने का आधार ख़त्म (तभी तो हर तबके का पलायन हुआ बिहार से) यानि पूरी तरह बर्बाद बिहार नज़र आता है।
फिर आता है २००५ का बिहार विधान सभा चुनाव। धन्य हो चुनाव आयोग की टीम धन्य हो श्री के.जे.राव जिनकी सक्रियता के चलते बिहार में निष्पच्छ चुनाव हो सका और एनडीए की सरकार सत्ता में आ सकी। अगर चुनाव आयोग के पहल में कही भी थोड़ी सी भी त्रुटी होती तो फिर से आरजेडी की सरकार सत्ता पर काबिज़ होती और बिहार में फिर वही सब होता जो पिछले पंद्रह सालों तक होता रहा था।
बिहार विधान सभा चुनाव २००५ में एनडीए की सरकार श्री नितीश कुमार की अगुवाई में बनी। पूरी तरह से बर्बाद बिहार को एक नया आयाम देने के लिए नितीश कुमार ने कमर कस ली। उन्होंने बिहार के लिए कुछ सपने पाल रखे थे और फिर उन सपनो को साकार करने में जुट गए। वह पिछली सरकार की नीतियों पर न चल कर खुद की बनाई नीतियों पर चलना शुरू किया। जिसमे शामिल था बिहार में कानून का राज, ताकि लोग अमन चैन से जीवन बसर कर सके, सड़कें जो पूरी तरह बर्बाद हो चुकी थी उसे ठीक करना, सरकारी हस्पतालों की जर्जर स्थिति से ऊपर उठाना, आधी आबादी (महिला) को उनका हक देना, शिच्छा के स्तर को ऊपर उठाना, बिहार में बाहरी उद्योगपतियों को आकर्षित करने के लिए एक अच्छा माहौल बनाना, बिजली उत्पादन को बढ़ाना तथा आत्म निर्भर बनना, बिहार के लोगों को रोज़गार धंधे मुहैया करना (ताकि बिहारियों का पलायन रुक सके), उच्च शिच्छा के लिए बिहार में ज्यादा से ज्यादा कालेज एवं यूनिवर्सिटी का खुलवाना ताकि उच्च शिच्छा प्राप्त करने के लिए बिहार से बिहारी लड़कों का पलायन रुक सके।
श्री नितीश कुमार ने पिछले पांच वर्षो में अपने बनाये सभी नीतियों पर पूरी तरह अमल करते हुए एक पिछड़े राज्य को अग्रसर राज्य कि श्रेणी में लाये और बिहार विकाश के राह पर पूरी तरह दौड़ने के लिए तैयार हो गया है। इसीलिए बिहार कि जनता ने भी उम्मीद से ज्यादा जनादेश (विश्वाश) देकर श्री नितीश कुमार के हाथो में बिहार कि बाग डोर थमा दी क्यों कि अपने से ज्यादा उसे नितीश कुमार पर विश्वाश है।
अब मुख्यमंत्री श्री नितीश कुमार अपने गढ़े हुए सपनो का बिहार बनाने के लिए स्वतंत्र है क्यों कि उनके राह में अब विपच्छ भी नहीं है।
फिर आता है २००५ का बिहार विधान सभा चुनाव। धन्य हो चुनाव आयोग की टीम धन्य हो श्री के.जे.राव जिनकी सक्रियता के चलते बिहार में निष्पच्छ चुनाव हो सका और एनडीए की सरकार सत्ता में आ सकी। अगर चुनाव आयोग के पहल में कही भी थोड़ी सी भी त्रुटी होती तो फिर से आरजेडी की सरकार सत्ता पर काबिज़ होती और बिहार में फिर वही सब होता जो पिछले पंद्रह सालों तक होता रहा था।
बिहार विधान सभा चुनाव २००५ में एनडीए की सरकार श्री नितीश कुमार की अगुवाई में बनी। पूरी तरह से बर्बाद बिहार को एक नया आयाम देने के लिए नितीश कुमार ने कमर कस ली। उन्होंने बिहार के लिए कुछ सपने पाल रखे थे और फिर उन सपनो को साकार करने में जुट गए। वह पिछली सरकार की नीतियों पर न चल कर खुद की बनाई नीतियों पर चलना शुरू किया। जिसमे शामिल था बिहार में कानून का राज, ताकि लोग अमन चैन से जीवन बसर कर सके, सड़कें जो पूरी तरह बर्बाद हो चुकी थी उसे ठीक करना, सरकारी हस्पतालों की जर्जर स्थिति से ऊपर उठाना, आधी आबादी (महिला) को उनका हक देना, शिच्छा के स्तर को ऊपर उठाना, बिहार में बाहरी उद्योगपतियों को आकर्षित करने के लिए एक अच्छा माहौल बनाना, बिजली उत्पादन को बढ़ाना तथा आत्म निर्भर बनना, बिहार के लोगों को रोज़गार धंधे मुहैया करना (ताकि बिहारियों का पलायन रुक सके), उच्च शिच्छा के लिए बिहार में ज्यादा से ज्यादा कालेज एवं यूनिवर्सिटी का खुलवाना ताकि उच्च शिच्छा प्राप्त करने के लिए बिहार से बिहारी लड़कों का पलायन रुक सके।
श्री नितीश कुमार ने पिछले पांच वर्षो में अपने बनाये सभी नीतियों पर पूरी तरह अमल करते हुए एक पिछड़े राज्य को अग्रसर राज्य कि श्रेणी में लाये और बिहार विकाश के राह पर पूरी तरह दौड़ने के लिए तैयार हो गया है। इसीलिए बिहार कि जनता ने भी उम्मीद से ज्यादा जनादेश (विश्वाश) देकर श्री नितीश कुमार के हाथो में बिहार कि बाग डोर थमा दी क्यों कि अपने से ज्यादा उसे नितीश कुमार पर विश्वाश है।
अब मुख्यमंत्री श्री नितीश कुमार अपने गढ़े हुए सपनो का बिहार बनाने के लिए स्वतंत्र है क्यों कि उनके राह में अब विपच्छ भी नहीं है।
Sunday, November 14, 2010
छेत्रिय पार्टियों की चांदी ही चांदी

भारतीय राजनीत में छेत्रिय पार्टियों का घुसपैठ तेजी से बढ़ता जा रहा है जिसका खामियाजा देश को भुगतना पड रहा है क्यों कि किसी भी राष्ट्रिय पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने के कारण सरकार बनाने के लिए उसे छेत्रिय पार्टियों से किसी भी स्तर पर समझौता करना पड़ता है चाहे वो केंद्र में मंत्री पद ही क्यों न हो? आज बहुत सी छोटी-छोटी छेत्रिय पार्टियों कि संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है। इन छेत्रिय पार्टियों का निर्माण वैसे लोगों ने किया है जो अति- महत्वाकानच्छी है तथा जनता में उनकी पैठ है। वो राज्य में अपनी सरकार किसी भी सूरत में बना तो लेते है लेकिन केंद्र में वो पंद्रह, बीस या पच्चीस सांसद ही भेज पाते है, नतीजा वही होता है कि कोई भी राष्ट्रिय पार्टी सरकार बनाने भर बहुमत नहीं जुटा पाती है जिसके चलते छेत्रिय पार्टियों से हाथ मिलनी पड़ती है या यूँ कंहे कि छेत्रिय पार्टियाँ केंद्र कि सत्ता में अति महत्त्वपूर्ण पद पाने के लिए ब्लैक-मेलिंग शुरू कर देती है। एन-केन-प्राकेन किसी भी तरह मंत्री पद हांसिल करने के बाद जनता के पैसों कि लूट शुरू होती है। ये छेत्रिय पार्टियाँ समाज सेवा या देश को आगे बढ़ाने कि भावना से पार्टी का निर्माण नहीं करते बल्कि इसके पीछे एक ही मकसद होता है कि इतने सांसद जीत जाएँ जिससे केंद्र में सरकार बनाने में सहयोग कर सकें और मंत्री पद मिले फिर तो जनता के पैसों को लूटना ही है और अगर चोरी पकड़ी भी जाती है या मंत्री पद छोड़नी भी पड़ती है तो सरकार को अल्प-मत में तो ला ही देंगे, मतलब "चोरी भी और सीनाजोरी भी" । यह छेत्रिय पार्टियाँ अब ब्लैक-मेलरों, चोरों और उच्चकों कि पार्टियाँ बनती जा रही है और इसमें तमाम वैसे लोग जुड़े है जो जनता के खजाने कि चाभी हांसिल करना चाहते है।
भारत कि आज़ादी के बाद से केंद्र और राज्य में कांग्रेस पार्टी कि सरकार ज्यादातर सत्ता में रही है और शायद इसकी गलत नीतियों के कारण ही छेत्रिय पार्टियों का जन्म हुआ। पहले तो यह छेत्रिय पार्टियाँ भारत के दबे कुचले गरीब लोगों कि आवाज़ बनी तथा जनता का भी भरपूर समर्थन इन छेत्रिय पार्टियों को मिला जिसके चलते ये सत्ता कि सीढियाँ चढ़ते गए। सत्ता में आने के बाद पद,पावर और पैसा तीनो मिला। शायद पद,पावर और पैसा ये तीनो मिलते ही छेत्रिय पार्टिया दिशाहीन हो गई और सत्ता के खेल के ये माहिर खिलाडी बनते गए जो किसी भी रूप में सत्ता के करीब रहना इनके फितरत में शामिल होता गया। सत्ता के करीब रहने के लिए ढेर सारे पैसो कि जरुरत पड़ती है इसलिए मंत्री पद मिलते ही ये जनता के पैसो को लूटना शुरू कर देते है। खुदा ना खास्ता अगर चोरी पकड़ी भी जाती है तो इनके समर्थन में वही बड़ी सत्ता धारी पार्टी खड़ी हो जाती है, क्यों कि ये मंत्री भी तो उसी के सरकार में है और यही शुरू होता है पद का दुरूपयोग।
आज केंद्र कि सरकार में जनता के पैसो का कैसे चुना लगाया जा रहा है इसके मिसाल है दूर संचार मंत्री ऐ राजा। जिन्हों ने टू जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाला में जनता के १.७६ लाख करोड़ रूपया का चुना लगाये है तथा इन पर ७० हजार करोड़ रूपये के घोटाले का आरोप है। ऐ राजा छेत्रिय पार्टी द्रमुक से सांसद है तथा जिसके संचालक एम्.करूणानिधि है। केंद्र में कांग्रेस पार्टी कि सरकार है और ऐ राजा इन्ही कि सरकार में दूर संचार मंत्री है। कांग्रेस कि महानता देखिये कि अपने पद का दुरूपयोग करने के बाद भी ऐ राजा मंत्री पद त्यागने को तैयार नहीं थे और कांग्रेस भी उनपर दबाव नहीं डाल पा रही थी क्यों कि द्रमुक के समर्थ से ही केंद्र कि सत्ता में कांग्रेस बैठी है और अगर द्रमुक अपना समर्थन वापस ले लेती तो कांग्रेस अल्प-मत में आ जाती, इसलिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कांग्रेस अध्यच्छ श्रीमती सोनिया गाँधी तथा वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने रविवार सुबह राजा मामले पर उपजे संकट पर गहन मंत्रणा कि थी और अपने महानता का परिचय देते हुए कांग्रेसी वित्तमंत्री श्री प्रणव मुखर्जी ने एम्.करूणानिधि से बात कि और स्पस्ट तौर पर बता दिया कि अब पानी सर के ऊपर बह रहा है इसलिए राजा को मंत्रिमंडल में बनाये नहीं रखा जा सकता है इसलिए राजा अपने पद से इस्तीफा दे और यह दूर संचार विभाग आप ही के सुपुर्द करता हूँ राजा कि जगह किसी और को यह मंत्री पद दे दे ताकि केंद्र सरकार पर आये इस संकट को दूर किया जा सके। धन्य हो एम्.करूणानिधि का जिनके कहने पर राजा ने मंत्री पद से त्यागपत्र दिए। मतलब जो घोटाला हुआ है उसे लिपा-पोती किया जा सके।
भारत कि आज़ादी के बाद से केंद्र और राज्य में कांग्रेस पार्टी कि सरकार ज्यादातर सत्ता में रही है और शायद इसकी गलत नीतियों के कारण ही छेत्रिय पार्टियों का जन्म हुआ। पहले तो यह छेत्रिय पार्टियाँ भारत के दबे कुचले गरीब लोगों कि आवाज़ बनी तथा जनता का भी भरपूर समर्थन इन छेत्रिय पार्टियों को मिला जिसके चलते ये सत्ता कि सीढियाँ चढ़ते गए। सत्ता में आने के बाद पद,पावर और पैसा तीनो मिला। शायद पद,पावर और पैसा ये तीनो मिलते ही छेत्रिय पार्टिया दिशाहीन हो गई और सत्ता के खेल के ये माहिर खिलाडी बनते गए जो किसी भी रूप में सत्ता के करीब रहना इनके फितरत में शामिल होता गया। सत्ता के करीब रहने के लिए ढेर सारे पैसो कि जरुरत पड़ती है इसलिए मंत्री पद मिलते ही ये जनता के पैसो को लूटना शुरू कर देते है। खुदा ना खास्ता अगर चोरी पकड़ी भी जाती है तो इनके समर्थन में वही बड़ी सत्ता धारी पार्टी खड़ी हो जाती है, क्यों कि ये मंत्री भी तो उसी के सरकार में है और यही शुरू होता है पद का दुरूपयोग।
आज केंद्र कि सरकार में जनता के पैसो का कैसे चुना लगाया जा रहा है इसके मिसाल है दूर संचार मंत्री ऐ राजा। जिन्हों ने टू जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाला में जनता के १.७६ लाख करोड़ रूपया का चुना लगाये है तथा इन पर ७० हजार करोड़ रूपये के घोटाले का आरोप है। ऐ राजा छेत्रिय पार्टी द्रमुक से सांसद है तथा जिसके संचालक एम्.करूणानिधि है। केंद्र में कांग्रेस पार्टी कि सरकार है और ऐ राजा इन्ही कि सरकार में दूर संचार मंत्री है। कांग्रेस कि महानता देखिये कि अपने पद का दुरूपयोग करने के बाद भी ऐ राजा मंत्री पद त्यागने को तैयार नहीं थे और कांग्रेस भी उनपर दबाव नहीं डाल पा रही थी क्यों कि द्रमुक के समर्थ से ही केंद्र कि सत्ता में कांग्रेस बैठी है और अगर द्रमुक अपना समर्थन वापस ले लेती तो कांग्रेस अल्प-मत में आ जाती, इसलिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कांग्रेस अध्यच्छ श्रीमती सोनिया गाँधी तथा वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने रविवार सुबह राजा मामले पर उपजे संकट पर गहन मंत्रणा कि थी और अपने महानता का परिचय देते हुए कांग्रेसी वित्तमंत्री श्री प्रणव मुखर्जी ने एम्.करूणानिधि से बात कि और स्पस्ट तौर पर बता दिया कि अब पानी सर के ऊपर बह रहा है इसलिए राजा को मंत्रिमंडल में बनाये नहीं रखा जा सकता है इसलिए राजा अपने पद से इस्तीफा दे और यह दूर संचार विभाग आप ही के सुपुर्द करता हूँ राजा कि जगह किसी और को यह मंत्री पद दे दे ताकि केंद्र सरकार पर आये इस संकट को दूर किया जा सके। धन्य हो एम्.करूणानिधि का जिनके कहने पर राजा ने मंत्री पद से त्यागपत्र दिए। मतलब जो घोटाला हुआ है उसे लिपा-पोती किया जा सके।
Thursday, November 11, 2010
लालच बुरी बला (कौन बनेगा करोडपति)

सोनी टीवी पर रात्रि नव बजे सोमवार से वृहष्पतिवार तक महानायक अमिताभ बच्चन द्वारा प्रस्तुत "कौन बनेगा करोडपति" का प्रसारण हो रहा है। इसमे हर सवाल का चार जबाब कम्प्यूटर पर दिखाए जाते है जिसमे से एक जबाब सही होता है, इन्ही सही जबाबों को देते हुए प्रतिभागी रकम दर रकम जीतते हुए आगे बढ़ते है और यह रकम हर सही जबाब के बाद दुगनी होती जाती है। खेल पांच करोड़ के रकम तक जाकर समाप्त हो जाती है। महानायक अमिताभ बच्चन कि प्रस्तुति में महानता झलकती है, वो हर प्रतिभागी को प्रोत्साहित करते नज़र आते है और ज्यादा से ज्यादा रकम प्रतिभागी को जीतते देखना चाहते है। तरह-तरह के लोग उनके सामने वाली हॉट सीट पर बैठते है और उनके द्वारा पूछे गए सवालों का जबाब देते है। इसी हॉट सीट पर मेरठ से आये प्रतिभागी "प्रशांत बातर" भी बैठते है और अमिताभ बच्चन द्वारा पूछे गए सवालों का सही जबाब देते हुए एक करोड़ कि राशी तक जीत जाते है। फिर आता है इस खेल का आखरी पांच करोड़ का जैकपॉट सवाल। इस खेल का रोमांचक पहलु।अमिताभ बच्चन प्रशांत बातर से कहते है "अगर इस सवाल का सही जबाब आपको मालूम हो तब ही खेलिएगा, अगर जबाब नहीं मालूम हो तो खेल को बीच में छोड़ कर जा सकते है, क्यों कि आप एक करोड़ रुपये जीत चुके है" । शायद प्रशांत बातर अमिताभ बच्चन द्वारा कही हुई बातो पर पूरी तरह ध्यान नहीं देते है तभी तो वो अमिताभ जी से एक मिनट का समय मांगते है गणेश भगवान को ध्यान लगाने के लिए। अमिताभ जी उनको दो मिनट का समय देते है। गणेश जी को ध्यान लगाने के लिए। ध्यान ख़त्म होने के बाद प्रशांत बातर खेल को आगे खेलने का इक्छा जाहिर करते है और गेम खेलना शुरू करते है।
कौन बनेगा करोड़पति का आंखरी सवाल कंप्यूटर पर चार ज़बाब जिसमे से एक ज़बाब सही तीन गलत, प्रशांत बातर के पास एक आप्सन डबल डीप, अमित जी फिर कहते है अगर आपको सही ज़बाब मालूम हो तब ही खेलिएगा, लेकिन प्रशांत बातर डबल डीप का उपयोग करने के बावजूद भी सही ज़बाब नहीं दे पाते है और तीन लाख बीस हज़ार रुपया ही जीत पाते है। मतलब कि एक करोड़ रुपया जीत जाने के बाद भी प्रशांत बातर आंखरी सवाल का ज़बाब देते है जब कि उनको सही ज़बाब नहीं मालूम है अमिताभ बच्चन के बार-बार कहने पर भी वह ध्यान नहीं देते है। यह लालच कि पाराकाष्टा कही जाएगी या ना-समझी।
यह लालच ही है जो प्रशांत बातर के सोंचने समझने कि क्रिया पर पूरी तरह हावी हो गया और अच्छी-खासी जीती हुई रकम गँवा बैठे।
प्रशांत बातर के हार से हम सभी को एक सबक मिलती है " अति लालच बर्बादी का कारण"
Subscribe to:
Posts (Atom)