Saturday, October 23, 2010

आपन डफली आपन राग

बिहार विधान सभा चुनाव प्रचार में सभी पार्टियों के नेता अपने-अपने तरीके से अपने पार्टी कि बाते जनता के सामने रखी है।

आरजेडी सुप्रीमो श्री लालू प्रसाद.... जनता कि सरकार जनता के लिए बनाने कि बात करते है तथा पिछले पंद्रह सालों में जो विकाश का काम बिहार में नहीं किये थे वो चुनाव में जितने के बाद विकाश करने कि बात करते है इसीलिए अपने भाषण में यह बार-बार कह रहे है .... जैसे मैंने भारतीय रेल को चमकाया और दुनियाँ देखती रह गई उसी तरह मै बिहार को चमकाउंगा। शायद लालू जी अपने पिछली गलतियों से तौबा कर लिए है इसीलिए बिहार में विकाश कि बात करते है। "अब पछताना क्या जब चिड़ियाँ चुंग गई खेत"

लोजपा सुप्रीमो श्री रामविलास पासवान .... ये भी बिहार में विकाश करने कि बात कहते है साथ ही जनता के बीच अपने दिए गए भाषणों में बहुत सारी उम्मीदे दे रहे है जैसे - पच्चास हजार रुपया हर गरीब व्यक्ति को दिया जायेगा जिसका सूद नहीं लगेगा, हर गरीब व्यक्ति को घर बनाने के बारह डिसमिल जमीन मुफ्त में दिया जायेगा तथा बी तक कि पढाई और पुस्तक मुफ्त में दिया जायेगा। इनके भाषण में केवल आश्वाशन ही आश्वाशन है।

जनता दल यू के श्री नितीश कुमार (वर्तमान मुख्यमंत्री बिहार) .... ये केवल बिहार के विकाश कि बात कर रहे है। जनता के बीच अपने दिए भाषणों में पांच साल तक अपने द्वारा किये हुए कामो का मजदूरी (वोट) मांग रहे है। हाँ यह सही है कि ये मजदूरी (वोट) पाने के हकदार है, क्यों कि पूरी तरह बर्बाद बिहार को इन्हों ने आबाद किया है, विकाश कि गाड़ी को पटरी पर ला दिए है अब इसका दौड़ने का समय है और वह अगला पांच साल होगा जिसमे विकाश कि गाड़ी दौड़ेगी। इसलिए अगर विकाश कि गाड़ी को दौड़ना है तो नितीश कुमार को मजदूरी (वोट) देनी ही होगी।

भाजपा के श्री सुशिल कुमार मोदी (वर्तमान उप-मुख्यमंत्री बिहार) ....... ये भी बिहार में विकाश कि बात कर रहे है या भजपा के जितने भी नेता बिहार रहे है वो जनता के बीच अपने भाषण में केवल विकाश कि बात कहते है, क्यों कि जे डी यू और बीजेपी ने मिल कर इस विकाश कि गाड़ी को आगे बढाया है। इसलिए बीजेपी और जे डी यू ये दोनों पार्टियाँ मजदूरी (वोट) पाने का हक रखती है। इसलिए विकाश कि गाड़ी को दौड़ाने के लिए इनको मजदूरी (वोट) देना ही पड़ेगा।

कांग्रेस पार्टी (वर्तमान में केंद्र कि सत्ता पर आशिन) ..... यह पार्टी भारत कि सबसे पुरानी राजनितिक पार्टी है भारत के बहुत से राज्यों में इसकी सरकार है तथा केंद्र में भी इसी पार्टी का शासन है। इस पार्टी के बड़े से बड़ा नेता अपने भाषणों में विकाश कि कोई बात नहीं कर रहे है ना ही जनता के बीच कोई आश्वाशन दे रहे है ना ही यह बता रहे है कि बिहार कि सत्ता में आने के बाद वह बिहार को किस रास्ते पर ले जायेंगा , चाहे वो कांग्रेस अध्यच्छ श्री मति सोनिया गाँधी हो या उनके पुत्र राहुल गाँधी, प्रधान मंत्री श्री मनमोहन सिंह या दिल्ली कि मुख्यमंत्री शिला दीक्षित, सचिन पायलट, जायसवाल साहब ये सभी राजनेता मुद्दा विहीन भाषण दे रहे है, अगर इनके पास कोई मुद्दा है तो बस एक मुद्दा है ..... केंद्र के पैसे से बिहार का विकाश हुआ, केंद्र के पैसे को नितीश कुमार अपना पैसा बता रहे है।

लगता है केंद्र अलग है और बिहार अलग है या बिहार भारत का अंग नहीं है या बिहार का पैसा टैक्स के रूप में केंद्र को नहीं जाता है जो हाय तौबा ये लोग मचाये है कही यह तो नहीं ..... केंद्र द्वारा दिए हुए पैसे को कांग्रेस अपना पैसा तो नहीं समझ रही है जो कांग्रेस के हर नेता अपने भाषण में पैसे का ही जिक्र कर रहा है

खैर कुछ भी हो बिहार में विकाश तो हुआ है चाहे वह बिहार के पैसे से हुआ हो या केंद्र के पैसे से हुआ हो, क्यों कि आज हर पार्टी के नेता यह स्वीकार कर लिए है कि बिहार में विकाश हुआ है। तो क्यों नहीं सभी पार्टियाँ एक साथ मिल कर बिहार में विकाश कि गाड़ी को और तेज रफ़्तार देने में मदद करे। एक दुसरे का टांग खीचने से राज्य का या देश का विकाश नहीं हो सकता है। अगर कोई व्यक्ति अच्छा काम करता है तो उसे और बढ़ावा देना चाहिए ताकि वो और अच्छा काम करे।

Friday, October 22, 2010

अब विकाश कि लहर चलने वाली है

बिहार का चुनाव क्या हो रहा है सभी छोटे बड़े राजनेताओं कि जुबान पर बस विकाश का ही मुद्दा छाया हुआ है अब हर नेता अपनी जनसभा में केवल विकाश कि बात कर रहा है चाहे वह कांग्रेस हो, आर.जे.डी हो, लोजपा हो, बीजेपी हो, जे.डी.यू हो या कमनिष्ट पार्टी हो, सभी एक ही राग अलाप रहे है और वह है "विकाश"
देर से ही सही अब राजनीतिक पार्टियों को यह लगने लगा है कि भारत कि जनता को बहुत दिनों तक बेवकूफ बना लिया है चाहे वह जाती के नाम हो, धर्म के नाम पर हो या गरीबी के नाम पर हो, लेकिन अब भारतीय जनता को ये राज नेता और बेवकूफ नहीं बना सकते क्यों कि आज कि ७० फीसदी नौजवान पीढ़ी पढ़ी-लिखी और सुलझी हुई है यह २१ वीं शदी कि पीढ़ी है यह जाती, धर्म से ऊपर उढ़ कर सोंचती है आज कि युवा पीढ़ी दिल का नहीं दिमाग का इस्तेमाल करती है अब पढ़े लिखे मुसलमान नौजवान पीढ़ी अपने को अल्प-संख्यक कहलाना पसंद नहीं करते है क्यों कि अल्प-संख्यक शब्द उनको गाली लगता है, वो भी भारतीय है तो अल्प-संख्यक क्यों कहा जाता है यह चेतना पढ़े-लिखे नौजवान पीढ़ियों में आई है यह पीढ़ी अपने राज्य अपने सूबे में विकाश चाहती है, अब यह पीढ़ी राजनेतावों के चिकनी-चुपड़ी बातो में नहीं आने वाली है, आज कि युवा पीढ़ी समझदार पीढ़ी है इसीलिए अब सभी राजनीतिक पार्टियाँ भी अपना स्टैंड बदलने लगी है और विकाश कि बाते करने लगी है क्यों कि अब उन्हें भी यह समझ आने लगा है कि बात बनाने से वोट नहीं मिलने वाला है, काम के बदले ही वोट मिलेगा, इसलिए विकाश कि बाते करने लगे है
राज्य के विकाश के मुद्दे कि शुरुआत भी बिहार से ही हुआ जैसे कि देश कि आज़ादी कि शुरुआत गाँधी जी ने बिहार कि धरती से ही किये थे, एक बिहारी ने पुरे भारत से कांग्रेस कि सत्ता को उखाड़ फेंका था वह जयप्रकाश नारायण बिहार से ही थे और राज्य के विकाश का मुद्दा एक बिहारी ने ही उठाया है वह बिहार के वर्तमान मुख्य-मंत्री नितीश कुमार है विकाश कि बाते अभी बिहार में हो रही है लेकिन जैसे-जैसे भारत के और राज्यों में चुनाव आएगा वहां कि जनता भी विकाश कि ही बात करेगी तथा विकाश ही चुनावी मुद्दा बनेगा अभी तो यह शुरुआत है आगे-आगे देखिये होता है क्या ? विकाश कि लहर चल पड़ी है अब इसके आंधी में पूरा देश, देश कि पूरी जनता कि एक ही आवाज़ होगी और वह आवाज़ होगी ......"विकाश" केवल विकाश हर सूबे में विकाश हर राज्य में विकाश पुरे देश में विकाश, अब आम जनता अपने सरकार से सिर्फ विकाश चाहेगी अब राजनेतावों कि कि चिकनी-चुपड़ी बाते जनता को दिग्भ्रमित नहीं कर पायेगी अब राजनेतावों को जनता काम के बदले अपना वोट देगी समय रहते राजनेतावों को सम्हल जाना चाहिए क्यों कि अब पढ़े-लिखे वोटरों से राजनेतावों का पाला पड़ने वाला है अब राजनेतावों के दिन बदलने वाले है काँटों भरे रास्ते से इनको गुजरना होगा क्यों कि २१वीं शदी कि पीढ़ी पढ़ी-लिखी पीढ़ी है यह अपने एक एक पैसे का हिसाब राजनेतावों से लेगी
बिहार के चुनाव में विकाश मुख्य मुद्दा उभर कर सामने आया है .... नितीश कुमार विकाश कि बाते करते है तो बात समझ में आती है क्यों कि उन्हों ने सूबे में थोडा ही सही विकाश कि गाड़ी को पटरी पर ला तो दिए है अगर लालू जी विकाश कि बात करते है तो बेमानी लगता है क्यों कि उन्हों ने पंद्रह साल में बिहार में कोई विकाश नहीं किये और पासवान जी ये तो केवल केंद्र में मंत्री रहे है इनके लिए तो पूरा भारत एक है तो फिर बिहार जैसे एक राज्य को ये क्या अहमियत देंगे, अब रही कांग्रेस पार्टी ये विकाश कि बात तो कर ही नहीं रही है इसके सभी बड़े नेता केवल एक ही राग अलाप रहे है .... केंद्र के पैसे से बिहार का विकाश हुआ है

Sunday, October 17, 2010

"किसे वोट दे" बिहार चुनाव

बिहार में चुनावी जंग छिड़ी है सभी पार्टियाँ अपने-अपने तरीके से चुनावी प्रचार शुरू कर दिए है. सभी पार्टियों के दिग्गज नेता कमर कस कर चुनावी मैदान में उतार चुके है और अपने-अपने तरीके से जनता को प्रभावित या गुमराह करने लगे है। इलेक्ट्रोनिक मिडिया वाले भी चुनावी प्रचार कि कवरेज ज्यादा से ज्यादा दिखाने कि कोशिश कर रहे है तथा "अगला मुख्य-मंत्री कौन" का सर्वे भी शुरू कर दियें है। एक मीडिया हाउस द्वरा कराये गये सर्वेक्षण में मुख्यमंत्री पद के अन्य दावेदारों में राजद नेता लालू यादव को मात्र १७ फीसद, लोजपा नेता रामविलास पासवान को फीसद, राबड़ी देवी को फीसद और भाजपा नेता सुशील मोदी को फीसद लोगों ने स्वीकार है ।जबकि नीतीश कुमार ६६ फीसदी लोगों की पहली पसंद हैं | ’सहारा न्यूज नेटवर्कके इस सर्वेक्षण में राज्य के तकरीबन सभी विधानसभा क्षेत्रों को शामिल किया गया था.
कांग्रेस पार्टी के महा-सचिव राहुल गाँधी, प्रधान-मंत्री मनमोहन सिंह तथा कांग्रेस अध्यक्छ श्री मति सोनिया गाँधी ने बिहार में विकाश का श्रेय केंद्र द्वारा अधिक पैसा दिया जाना बताते है। यह अच्छी बात है कि केंद्र ने बिहार को ज्यादा पैसा दिया जो बिहार के विकाश के कार्य में लगा, तो फिर पिछले चालीस वर्षों तक बिहार कि सत्ता कांगेस के हाथो में थी तब बिहार में विकाश क्यों नहीं नज़र आया ? मतलब साफ है कि कांग्रेस पार्टी के किसी भी मुख्य-मंत्री में बिहार के विकाश को लेकर कोई सपना या इच्छाशक्ति नहीं थी या फिर उनको कार्य करने कि शैली नहीं आती थी जिसके चलते बिहार का विकाश नहीं हो पाया....... तो फिर हम कांग्रेस को वोट क्यों दे ? यह सभी को मालूम है कि केंद्र में जिसकी सरकार है उसी कि सरकार अगर राज्य में है तो उस राज्य को वितीय सहायता ज्यादा मिलाती है अगर किसी राज्य में दुसरे पार्टी कि सरकार है तो उसके हक के बराबर ही वितीय सहायता मिलाती है उससे ज्यादा नहीं ? तो फिर यह कांग्रेस बार-बार क्यों कहती है कि बिहार को केंद्र द्वारा वितीय सहायता ज्यादा दिया गया है ? जब कि केंद्र में कांग्रेस कि सरकार है और बिहार में NDA की सरकार है।
पिछले पंद्रह साल तक राष्ट्रिय जनता पार्टी [RJD] कि सरकार बिहार में थी उस समय-अवधी में भी बिहार में कोई विकाश नहीं हुआ, बल्कि वह पंद्रह साल बिहार के काले अध्याय के सामान था उसी समय-काल में बिहार से बिहारियों का पलायन सबसे ज्यादा हुआ था , यहाँ के बच्चे उच्च शिझा के लिए दुसरे राज्यों में पढने के लिए गए, बिहार कि बदनामी पुरे देश में हुई, असमाजिक तत्वों का बोल-बाला इसी समय अवधि में हुआ, शिझा के स्तर में गिरावट सबसे ज्यादा इसी समय काल में हुआ, बिहार कि सड़कों का बुरा हाल, ला एंड आडर के स्तर में गिरावट इसी समय अवधि में हुआ है। आज राष्ट्रिय जनता पार्टी के नेता चुनावी प्रचार में विकाश कि बाते करते है तो आप पिछले पंद्रह साल तक जब सत्ता में थे तो थोडा भी बिहार का विकाश क्यों नहीं किये ? अब आप पर कैसे यकीन किया जाय कि बिहार कि सत्ता अगर आपके हाथ में आएगी तो आप बिहार का विकाश करेंगे ? हम अपना बहुमूल्य वोट आपको क्यों दे ?
श्री राम विलाश पासवान ...... ये केवल बिहार से चुनाव जीतते है, बिहार के लिए नहीं जीते है, अगर बिहार के लिए जीते तो शायद MP का चुनाव जरुर जीतते। श्री पासवान ने अभी तक निरीह और गरीब जनता के वोट से केंद्र में केवल सत्ता के सुख का उपभोग किया है। अब सत्ता से हटने बाद इनको जनता याद आने लगी है। इन्हों ने परिवार वाद को सबसे ज्यादा बढ़ावा दिया है। ये अपने चुनाव प्रचार में ५०,०००/- पच्चास हजार रुपया गरीबो को देने कि बात कहते है जिसका कोई सूद नहीं लगेगा , क्या वाणिज्य बैंक ऐसा करेगी ? क्या केंद्र सरकार या राज्य सरकार का ऐसा कोई सर्कुलर है जो बिना सूद लिए ही या बिना गिरवी रखे बैंक पैसा बाँट दे साथ ही आधा डिसमिल जमीन गरीबो को देने कि बात करते है समझ में नहीं आती है कि ये आधा डिसमिल जमीन काहा से देंगे। शायद यह गुमराह करने वाला भाषण है । हम अपना वोट इनको क्यों दे, जो कि केवल अपने लिए जीते है ?
नितीश कुमार वर्तमान में बिहार के मुख्य-मंत्री....... पिछले पांच साल से बिहार के मुख्य-मंत्री है तथा पिछले पांच सालो में अपने सरकार द्वारा किये हुए कार्यो का मजदूरी बिहार कि जनता से मांग रहे है ताकि अगले पांच साल के लिए फिर इनकी सरकार बन सके।
नितीश कुमार जब पांच साल पहले बिहार के मुख्य-मंत्री बने तो उस समय बिहार बदहाली के आलम से गुजर रहा था, ला एंड ऑडर नाम कि कोई चीज ही नहीं थी, शिच्छा के स्तर में बहुत ज्यादा गिरावट आ गया था, बिहार के सडको कि हालत खस्ता-हाल थी उद्योग धंधे बंद पड़े हुए थे बहुत हद तक बड़े व्यापारी-वर्ग, बड़े किसान एवं मजदूरों का पलायन बिहार से हो चूका था। असमाजिक तत्वों का बोल-बाला था , वैसे समय में नितीश कुमार मुख्य-मंत्री बने और इस बदहाल बिहार को फिर से सँवारने कि चुनौती को स्वीकार किया। इन पांच सालों में आज बिहार कि सड़के अच्छी हालत में है, अब गाँव के कोई बीमार व्यक्ति को शहर के हस्पताल में आने के लिए कंधो कि जरुरत नहीं पड़ती है क्यों कि सड़के होने से अब गाँव में ही गाड़ियाँ मिल जाती है, अब किसान अपने अनाज को शहरो में लाकर ऊँचे दामो में बेच रहे है क्यों कि अब किसानो को बिचौलिए कि जरुरत नहीं है। यातायात का साधन बढ़ा है, जो रास्ते पहले चार घंटे में पुरे होते थे अब सड़कें होने से एक घंटे में पुरे हो जाते है। ला एंड ऑडर बहुत हद तक दुरुस्त है पिछले पांच सालों में करीब ४९ हजार अपराधियों को न्यायलय द्वारा शज़ा सुनाई गई हैअब कही जाने पर डर नहीं लगता है। अब देर रात तक सडको पर लोग नज़र आते है। स्कूलों में लड़के एवं लड़कियों कि संख्या में इजाफा हुआ है अब गाँव के स्कूलों में भी बच्चे नज़र आने लगे है, यह सायकिल और स्कूल यूनिफार्म का नतीजा है जो नितीश कुमार ने चलाई थी अब उसके परिणाम नज़र आने लगे है। अब सरकारी हस्पतालों में डाक्टर भी बैठते है मरीज भी नज़र आते है तथा दवाईयाँ भी मिलती है। कुछ नए कालेज खुले है कुछ खुलने के कगार पर है। बहुत हद तक जो बिहार का नाम धूमिल हुआ था अब धीरे-धीरे साफ़ होने लगा है तथा दुसरे राज्यों में बिहारी कहने में अब शर्म नहीं आती है। हाँ इन पांच सालों में बिहार कि तस्वीर बदली है। नितीश कुमार पहले बिहार के मुख्य-मंत्री है जो बिहार के हित के बारे में शोंचे है इसके पहले कोई मुख्य-मंत्री बिहार के हित के बारे में नहीं सोंचा है।
अब हम खुद आकलन कर ले कि हम किसे वोट दे ? फिर से बदहाल बिहार बनाना है तो उसके लिए कांग्रेस पार्टी है राष्ट्रिय जनता दल है तथा लो.ज.पा है। अगर खुशहाल बिहार बनाना है तो भारतीय जनता पार्टी तथा जनता दल यू है।

Friday, August 27, 2010

टूटते दरख़्त

संयुक्त परिवार अब बीते ज़माने कि बात लगने लगी है। आज का पढ़ा-लिखा इंसान संकीर्ण विचार का हो गया है। उसकी सोंच इतनी छोटी हो गई है कि, उसने जीने का दायरा भी छोटा कर लिया है। अब परिवार का मतलब होता है पति-पत्नी और उनके द्वारा उत्पन्न बच्चे। ऐसे छोटे परिवार बड़े शहरों में बहुत तायदाद में मिलेंगे, क्यों कि बड़े शहरों में पढ़े-लिखे लोगों कि संख्या ज्यादा है। पढने के बाद लोगों के विचार बड़े होते है सोंच बड़ी होती है उनके दायरे बड़े होते है लेकिन परिवार के नाम पर उनकी सोंच छोटी हो जाती है। उनके दायरे सिमट कर इतनी छोटी हो जाती है कि पत्नी और बच्चे तक ही सिमित रह जाती है। अब बड़े शहरों में संयुक्त परिवार के बराबर ही देखने को मिलेगा, लेकिन अभी भी गाँव और कश्बो में संयुक्त परिवार ही ज्यादातर मिलेगा, क्यों कि गाँव और कश्बो में पढ़े-लिखे लोगों कि संख्या कम है। उनका जीने का दायरा बहुत बड़ा है, उनके विचार बहुत बड़े है वो दिल से बहुत ही अमीर है। वो एक बड़े परिवार के लिए लिए जीते है उस परिवार में दादा-दादी, माता-पिता, भैया-भाभी, भाई-बहन, फुआ, छोटे भाई कि पत्नी और छोटे-छोटे हम सभी के बच्चे। सभी का आपस में प्यार, मिल-जुल कर रहना, जहाँ परिवार के एक सदस्य कि ख़ुशी पुरे परिवार कि ख़ुशी होती है तथा कोई एक सदस्य कि परेशानी पुरे परिवार कि परेशानी होती है। घर में जो सबसे बड़े होते वही घर के मुखिया होते है उनकी बात सभी को मान्य होती है। परिवार के बच्चों के अभिभावक केवल माता-पिता ही नहीं होते है दादा-दादी और भाई-बहन भी होते है अब ऐसा मिला जुला प्यार भरा परिवार टुकडो-टुकडो में टूटने लगा है क्यों कि अब सभी घरों में सरस्वती वास (निवास) करने लगी है।
मै आज से पच्चीस साल पहले एक संयुक्त परिवार का सदस्य था परिवार के सभी सदस्य पढाई पूरी करने के बाद नौकरी में गए तथा शादी होने के बाद एक-एक कर सभी लोगों ने अपने परिवार के साथ उस घर से विदा ले ली जहा उनका बचपन और जवानी का कुछ लम्हा बिता था, क्यों कि मेरे संयुक्त परिवार में सरस्वती का वास हो गया था। आज हमारे परिवार के लोग भिन्न-भिन्न शहरों में अपनी जिंदगी जी रहे है। शायद तन्हा और अकेला ?
संयुक्त परिवार के टूटने से लोगों में संकीर्णता कुछ ज्यादा ही गई है, अन्दर से अकेलेपन का डर बना रहता है दूर-दूर तक अपना कोई नज़र नहीं आता है, बच्चे जब अपनी पढ़ाई पूरी करके अपने कामो में व्यस्त हो जाते है तो यह अकेलापन और खलने लगता है। यह तब तक अच्छा लगता है जब तक मै अपने कामो में व्यस्त हूँ लेकिन बुढ़ापा बहुत ही दुखदाई हो जाता है। शायद यह संयुक्त परिवार के टूटने का ही नतीजा है।

Wednesday, August 25, 2010

भारतीय संस्कृति पर बढ़ा खतरा

भारत वर्ष पर अंग्रेजों का हुकुमत तक़रीबन दो सौ सालों तक रहा है १५ अगस्त १९४७ को वह भारत छोड़ कर अपने मुल्क को वापस चले गए , लेकिन जाने से पहले उन्होंने इस धरती पर कुछ बीज़ रोप कर गए थे। अब वो बीज़ अंकुरित होकर विशाल पेड़ का रूप धारण कर लिया है, उस पेड़ कि शाखाएं इतनी बढ़ी इतनी बढ़ी कि आज पुरे मुल्क में फ़ैल चुकी है। आज कुकुरमुत्ते कि तरह पुरे भारत में इंग्लिश मीडियम कि स्कूलें खुली हुई है या खुल रही है। अब माध्यमिक विद्यालयों में बच्चा वर्ग पहला वर्ग या दूसरा वर्ग नहीं होता है बल्कि प्रेप, नर्सरी, के जी और के जी- 1 से क्लास शुरू होता है। अब छोटे बच्चे " " नहीं पढ़ते है वो "A B C D" से अपनी पढाई शुरू करते है। माँ बाप भी अपने बच्चों को इंग्लिस मीडियम स्कूलों में दाखिला दिलाकर गौर्वान्तित महशुस करते है। इंग्लिस मीडियम कि स्कूलें पहले महानगरों में हुआ करती थी धीरे-धीरे बड़े शहरों से होते हुए छोटे शहरों तक बढ़ी अब हालत यह है कि यह गावं और छोटे कस्बे तक फ़ैल गई है। इसके फैलाव का ही कारण है कि आज हिंदी माध्यम कि स्कूलें नहीं खुल रही है और जो पहले से थी वो बंद हो गई है या बंद होने के कगार पर है। अब हिंदी माध्यम के स्कूलों में बच्चे पढने के लिए नहीं जाते है क्यों कि माता-पिता अपने बच्चे को हिंदी पढ़ाने में तौहीनी समझते है
" यह कितनी बड़ी बिडम्बना है हिंदुस्तान कि अपनी भाषा हिंदी है और हम हिन्दुस्तानी ही अपनी हिंदी भाषा के दुश्मन बन बैठे है " इसे जाहिल और गवारों कि भाषा मान बैठे है हम अपने बच्चों को किस रास्ते पर डाल रहे है अगर हमारी रफ़्तार यही रही तो आने वाली पीढियां हिंदी जानेगी ही नहीं आज से पच्चीस तीस साल पहले ज्यादातर हिंदी माध्यम कि स्कूलें हुआ करती थी जिसमे छठा वर्ग से अंग्रेजी कि पढाई शुरू होती थी पूरी पढाई हिंदी में होती थी केवल एक पेपर अंग्रेजी का होता था आठवी वर्ग से अंग्रेजी दो पेपर हो जाता था लेकिन अब स्कूलों में पूरी पढाई अंग्रेजी में होती है सिर्फ एक पेपर हिंदी का होता है वह भी एक्झिक विषय का मतलब यह कि अगर बच्चा चाहे तो हिंदी रख सकता और नहीं तो उसके जगह पर कोई और विषय रख सकता है पहले संस्कृत एक्झिक विषय होता था
उस अंग्रेजी के एक पेपर ने आज ऐसा पांव पसारा कि अंग्रेजी मुख्य हो गया और हिंदी एक्झिक
हमलोग जब विद्यालय में पढ़ते थे तो उन दिनों कोई सहपाठी अंग्रेजी में कोई आवेदन लिखता था तो हम विद्यार्थी उस लड़के को बहुत महत्त्व देते थे, शायद उस वक्त यह समझ में नहीं आता था कि यही अंग्रेजी भाषा सर्वोपरि हो जाएगी, क्यों कि हमलोगों कि मातृभाषा हिंदी थी, बोल-चाल कि भाषा हिंदी थी पढाई पूरी तरह हिंदी में करते थे हाँ एक विषय अंग्रेजी का होता था अब समझ में आने लगा कि इस भाषा में आकर्षण है, रोब है तभी तो हम अभिभावक अपने बच्चे को अंग्रेजी पढ़ाने पर तुले हुए है जो मेरे अन्दर जो कमियां रह गई थी वह बच्चों के मध्यम से पूरी होते देख रहे है आज हम अपनी भावी पीढ़ियों को अंग्रेज बनते देख रहे है आज उनकी शिच्छा, रहन-सहन, खान-पान, बोल-चाल अंग्रेजो कि तरह होते देख रहे है आज हम इतने खुले विचार धारा के हो गए है अब लड़का या लड़की में फर्क नहीं करते है अब लड़कियां भी लड़के के कपडे पहन कर कदम से कदम मिला कर चलने लगी है अब लड़के का ही चार पांच गर्ल फ्रेंड नहीं होती है बल्कि लड़कियों का भी चार पांच बॉय फ्रेंड होते है अब लड़कों के साथ-साथ लड़कियां भी नशा पान करने लगी है, स्वछन्द जिन्दगी जीने लगी है अब हमारी वर्तमान पीढियां पूरी तरह अंग्रेज हो गई है जो मैंने अपने बच्चों में बुनियाद डाली थी आज वह पूरी तरह साकार हो गया है
अब इसके दुष्परिणाम भी सामने आने लगे है आज के बच्चे अपने बूढ़े हो चले माता-पिता को साथ रखना नहीं चाहते है क्यों कि उनके पास समय नहीं है आज यही कारण है कि महानगरों एवं बड़े शहरों में "ओल्ड एज होम" नाम से बहुत सी संस्थाएं चलती है, अभी यह संस्थाएं महानगरों एवं बड़े शहरों तक ही सीमित है लेकिन अगले बीस सालों में यह छोटे शहर एवं गाँव तक खुल जाएगी यह दूसरी सभ्यता के नक़ल का ही परिणाम है कि आज हमारी भावी पीढियां एक ऐसे कगार पर खडी है जो पूरी तरह अंग्रेज ही है ही पूरी तरह भारतीय हम अभिभावक ही दोषी है इस दुष्परिणाम के हमारी भावी पीढियां नहीं है बच्चा तो बच्चा होता है उसे जो चाहते है हम बनाते है हम अभिभावक अन्दर से इतने कुंठित तथा हीनभावना से ग्रसित है कि अपने ही बच्चे को एक ऐसे मुकाम पर खड़ा कर दिए है जहाँ अपनी पहचान ही खो दिया है
मै अंग्रेजी के विरोध में नहीं हूँ अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है इस भाषा कि जानकारी जरुरी है इसके वगैर विदेशो में काम नहीं चल सकता है उच्च शिच्छा में भी इस भाषा ज्ञान होना जरुरी है मै अंग्रेजी सभ्यता का विरोध करता हूँ अंग्रेजी सभ्यता अगर भारत में पनपने लगी तो हमारी सभ्यता खतरे में पड़ जाएगी

Saturday, August 21, 2010

"विकास" ही मुख्य मुद्दा होगा बिहार विधान सभा चुनाव में














बिहार में इस साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस और जनता दल (युनाइटेड) के बीच विकास कार्यो का श्रेय लेने की होड़ शुरू हो गई है। सोनिया गांधी के बिहार ऐसा केंद्र द्वारा अब तक सबसे अधिक वित्तीय सहायता दिए जाने के बयान पर राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पलटवार करते हुए कहा कि बिहार को हक से ज्यादा वित्तीय मदद नहीं मिली।

यह खबर दैनिक हिंदुस्तान के पटना संस्करण में दिनांक २०/०८/२०१० को प्रकाशित हुआ है, यानी कि केंद्र भी इस बात से सहमत है कि बिहार में विकास हुआ है। यह विकास आज़ादी के बाद से केंद्र में और राज्य में कांग्रेस कि सरकार रहते हुए क्यों नहीं हो पाया था ? या फिर कांग्रेस द्वारा समर्थित राष्टीय जनता पार्टी पंद्रह साल तक बिहार कि सत्ता में रही तब विकास क्यों नहीं हुआ ? जो आज बिहार के विकास को लेकर तरह तरह कि बयानबाजी हो रही है और सभी पार्टियाँ इसका श्रेय लेने पर तुली हुई है।
बिहार के लिए यह एक अच्छा संकेत है। अगला बिहार विधान सभा चुनाव में सभी पार्टियों का "विकास" ही मुख्य मुद्दा रहेगा। भले वो सत्ता में आने पर विकास करे या ना करे ?
सही बात तो यह है कि बिहार में विकास का श्रेय किसी भी पार्टी को नहीं जाता है बल्कि जिसके शासन काल में यह विकास कार्य हुआ है सिर्फ उसी को इसका श्रेय जाना चाहिए ? केंद्र से सभी के शासनकाल में वितीय सहायता मिली थी लेकिन विकास कार्य नहीं होने के कारण हर बार फंड लौट जाता था। फिर कांग्रेस बिहार के विकास पर अपनी दावेदारी क्यों थोपना चाहती है ? विकास केवल पैसा देने से हो जाता तो आज कोई भी राज्य पिछड़ा नहीं होता ? पिछड़ा होने का एक ही कारण है वर्तमान सरकार में कार्य करने कि इक्छाशक्ति का होना। पिछली जो भी सरकारें बिहार में शासन कि उनमे विकास को लेकर कोई इक्छाशक्ति नहीं थी। वर्तमान में जो सरकार बिहार में शासन कर रही है उसमे विकास को लेकर इक्छाशक्ति है, और उसने पांच वर्षो में जो कार्य किया है वह दिखाई देता है। अगर दिखाई नहीं देता तो सोनिया गाँधी का बिहार के विकास को लेकर बयान नहीं आता। यह अच्छी बात है कि वर्तमान सरकार के पास बिहार के विकास को लेकर एक सपना है जिस पर वह अमल भी कर रहा है, जहाँ सपने साकार होते है परिणाम वही नज़र आता है। हमारे बिहार के माननीय राजनेताओं और सांसदों (विपझ) को बिहार में विकास नज़र नहीं रहा है ? उनको नज़र रहा है वर्तमान सरकार द्वारा सरकारी खजाने कि लूट। भारत में ऐसा कौन राजनेता है जो सत्ता में रहने पर जनता के पैसे को नहीं लूटा है ? सभी ने लूटा है अंतर यह पड़ता है कि एक काम कर के पैसे लूटता है और एक बिना काम किये ही जनता का पैसा लूट लेता है। (डाक्टर राम मनोहर लोहिया या कर्पूरी ठाकुर जैसे राजनेता नहीं है) इससे जनता के सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता है ? फर्क पड़ता है तब जब जनता उसके शासनकाल में परेशान होती है, उसके जान-माल कि छति होती है, उसके अधिकारों का हनन होता है।
आज़ादी के बाद से त्रस्त बिहार अपनी पहचान खो दिया था अब धीरे-धीरे अपनी गरिमा वापस पा रहा है।

Tuesday, August 17, 2010

टेलीविजन


विज्ञानं के अदभुत चमत्कारों में दूरदर्शन (Telivision) एक ऐसा चमत्कार है जो हमारे घर के अन्दर या फिर हमारे दिलो में ऐसा स्थान बना लिया है जिसके बगैर हम सोंच भी नहीं सकते है। यह हमारी दिनचर्याओं से जुड़ा अनिवार्य वस्तु बन गया है। इसके घर में आने से अब दोस्तों कि कमियाँ नहीं खलती है बल्कि कोई मनपसंद प्रोग्राम के समय किसी का आना खलता है। यह जब से घर में आया है परिवार के सभी सदस्य एक ही जगह बैठते है लेकिन कोई किसी से बात नहीं करता है कोई शिकवा शिकायत नहीं सभी का ध्यान टीवी स्क्रीन के तरफ ही रहता है। अकेलेपन के एहसाश को इसने ख़त्म कर दिया है। कुछ जरूरी कार्य भी मनपसंद प्रोग्राम के वक्त टाल जाना आम बात है। इस पिटारे ने सभी का ध्यान रखा है, क्या बच्चा, क्या बुढा, क्या नौजवान लड़का, लड़की, क्या शादीशुदा जोड़ा। सभी के लिए सभी तरह का प्रोग्राम इस पिटारे में देखने को मिल जायेगा। इस पिटारे ने अपनी अनिवार्यता ऐसी बनाई कि अब यह ड्राइंगरूम के साथ-साथ बेडरूम में भी अपनी उपस्थिति कायम कर ली, क्यों कि इस पिटारे में बहुत से ऐसे भी प्रोग्राम आते है जो हम पुरे परिवार के साथ नहीं देख सकते है। कभी-कभी इस पिटारे में कुछ ऐसे दृश्य भी जाते है जिसके चलते एक दुसरे से नज़रे भी चुरानी पड़ती है। थोड़े संपन्न परिवार में हर रूम में इस पिटारे ने अपनी उपस्थिति बना ली है क्यों कि सभी अपना-अपना पसंदीदा प्रोग्राम देखते है। इस पिटारे में आपको दुनियाँ कि हर चीज देखने को मिल जाएगी। बच्चों के लिए कार्टून के बहुत से प्रोग्राम है तो बूढ़े बुजुर्गो के लिए धार्मिक प्रवचन के, नौजवान पीढ़ी के लिए भी बहुत से प्रोग्राम है अगर आप खेल-कूद पसंद करते है तो निराष नहीं होइए आपके लिए भी इसमें प्रोग्राम है, चाहे आप किसी भी छेत्र या विचारधारा से सम्बन्ध रखते है, आप सभी के लिए इस जादुई पिटारे में प्रोग्राम ही प्रोग्राम है ... बश शर्त यह है कि रिमोट का बटन दबाते रहिये आपका मनपसंद प्रोग्राम जरूर देखने को मिल जायेगा, यह इस जादुई पिटारे कि गारंटी है। इस पिटारे में इतना प्रोग्राम भरा हुआ है जो आप सोंच भी नहीं सकते है, आपका समय कम पड़ जायेगा लेकिन इस पिटारे का प्रोग्राम ख़त्म नहीं होगा।
अब इस पिटारे ने हमारे मनोरंजन का ध्यान रखते हुए सामानों के बारे में भी बताने लगा है, उसकी अनिवार्यता बताने लगा है। [मतलब यह कि हमारे घर के अन्दर में यह सामान बेचने लगा है] बच्चे प्रतिदिन कुछ नये-नये वस्तुओं कि फुरामाइश करते है तो पत्नी कुछ अलग फुरामाइश करती है। मतलब यह कि इस पिटारे ने मनोरंजन तो किया लेकिन साथ-साथ परेशानियां भी बढ़ा दी। यानी कल तक जो पैसे ज्यादा लगते थे अब वो कम पड़ने लगे है। इस पिटारे में जितने भी पारिवारिक सीरियल आते है उसमे केवल अमीरी ही दिखाई देती है लगता है किसी राजा महराजा के परिवार कि कहानियां देख रहे है। यह सब देख बच्चे भी वैसा ही व्यवहार करते है। इस जादुई पिटारे ने हमारे जीवन कि दिनचर्या ही बदल दी है, अब संध्या में गाँव के चौपाल पर दोस्तों कि जमघट नहीं लगती है क्यों कि अब दोस्त अपने-अपने घरों में इस पिटारे के सामने बैठे अपना पसंदीदा कोई प्रोग्राम देख रहे होते है। यह पिटारा जब से घर में आया है अपनों से दूर कर दिया है अब कोई भी घटना कि ख़बर लेने के लिए किसी से पूछने कि जरुरत नहीं है बस रिमोट का बटन दबाइए और चलचित्र सहित पूरी जानकारियां ले लीजिये, इस पिटारे ने अपने अन्दर पूरी दुनियां ही समाहित कर ली है
यह पिटारा जब से आया है समाज का दशा और दिशा दोनों बदल दिया है बाजारवाद का पूरा असर इस पिटारे पर पड़ा है आज यह पिटारा प्रचार का सबसे सशक्त मध्यम बन गया है चाहे वह किसी कम्पनी का सामान बेचना हो या चार चक्के कि गाड़ी, फैसन से जुड़े कपडे या जूते-चप्पल, बिउटी टिप्स लेनी हो या खाना बनाने के तरीके सिखनी हो, अंडर गारमेंट्स बेचने हो या सिनेट्री पैड, कंडोम किस-किस का जिक्र करूँ अच्छे और बुरे सभी सामान इस पिटारे के माध्यम से हमारे और आपके ड्राइंगरूम में बेचते है, राजनितिक पार्टियाँ भी पीछे नहीं है वो भी इस पिटारे का इस्तेमाल भरपूर करती है और इसके माध्यम से अपना चुनाव प्रचार करती है इस पिटारे का ही देन है कि आज गाँव-गाँव में फैसन नज़र आने लगा है अब लड़कियां जींस और टोप्स में ज्यादा नज़र आने लगी है, लड़के भी ज्यादातर जींस में ही नज़र आते है, अब समीज-सलवार बीते युग का ड्रेस हो गया है या यूँ कंहे बेटियों ने जींस और टोप्स अपनाया तो मांओ ने उनका छोड़ा हुआ समीज-सलवार अपना लिया इस पिटारे ने हमारे भारतीय संस्कृति पर प्रहार किया है और पाश्चात्य सभ्यता का प्रचार किया है इस पिटारे ने परदे के अन्दर कि चीजों को परदे पर दिखाना शुरू कर दिया है, अब यह पिटारा ज्ञान या मनोरंजन का पिटारा ना रहकर मुसीबतों का पिटारा बनता जा रहा है बुराई में जितना आकर्षण है उतना अच्छाई में नहीं है और यह पिटारा अच्छा बुरा हर चीज दिखता है