Saturday, February 28, 2026
वक्त के साथ बदलते रिश्ते
वक्त के साथ बदलते रिश्ते
यह तस्वीर एक माँ और उसके दो बच्चों की है, जो आज बड़े होकर अपनी शादीशुदा ज़िंदगी जी रहे हैं, लेकिन अब माँ के साथ नहीं रहते। यह तस्वीर सिर्फ एक पल को कैद नहीं करती, बल्कि एक कहानी कहती है—प्यार, त्याग और समय के साथ बदलती रिश्तों की कहानी।
इस तस्वीर में माँ अपने बच्चों के साथ खड़ी है, उनके कंधों पर हाथ रखकर। उसकी आँखों में वात्सल्य और गर्व साफ झलक रहा है। बच्चे भी अपनी माँ के आंचल में सुरक्षित और खुश दिख रहे हैं। यह दृश्य बताता है कि कैसे एक माँ अपने बच्चों के लिए पूरी दुनिया होती है, और बच्चे माँ के लिए जीवन का आधार। उस समय, शायद उन्हें यह कल्पना भी नहीं होगी कि एक दिन वे बड़े होंगे और अपने जीवन साथी के साथ अपनी अलग दुनिया बसा लेंगे।
समय का चक्र चलता रहा, बच्चे बड़े हुए, उन्हें अपनी शिक्षा और करियर की राहें मिलीं। फिर आया वह पड़ाव जब उन्होंने अपने जीवन साथी चुने और अपने नए परिवारों की नींव रखी। यह हर माँ का सपना होता है कि उसके बच्चे खुश रहें, सफल हों और अपना परिवार बसाएं। लेकिन इस खुशी के साथ एक कड़वी सच्चाई भी जुड़ी होती है—बच्चों का घर से दूर चले जाना।
आज वे बच्चे अपने जीवन में व्यस्त हैं, शायद शहरों में, या देशों में, अपनी-अपनी जिम्मेदारियों को निभाते हुए। वे अपने बच्चों को पाल रहे हैं, अपने रिश्तों को सहेज रहे हैं। इस सब में, कहीं न कहीं, उस माँ की यादें, उसका प्यार और उसका अकेलापन भी शामिल है। माँ आज भी शायद उन पुरानी यादों को संजोए बैठी होगी, जब उसके बच्चे उसके पास थे। शायद वह हर त्योहार पर, हर खुशी के मौके पर उन्हें याद करती होगी।
यह सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं है, बल्कि आज के समाज की एक सामान्य तस्वीर है जहाँ बच्चे बेहतर अवसरों या अपनी सुविधा के लिए माता-पिता से दूर रहने लगते हैं। यह बदलाव ज़रूरी है, स्वाभाविक है, लेकिन इसके साथ कई भावनाएँ जुड़ी होती हैं। माँ और बच्चों का रिश्ता कभी नहीं बदलता, भले ही दूरियाँ आ जाएँ। यह तस्वीर इस बात की गवाही है कि माँ का प्यार हमेशा अटल रहता है, चाहे बच्चे कहीं भी हों, कितने भी बड़े क्यों न हो जाएँ।
यह तस्वीर हमें याद दिलाती है कि रिश्तों की अहमियत क्या है, और हमें अपने माता-पिता के प्रति हमेशा कृतज्ञ रहना चाहिए, भले ही हम उनके साथ शारीरिक रूप से न रह पा रहे हों। उन्हें समय देना, उनसे बात करना और यह एहसास दिलाना कि वे आज भी हमारे जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, यही हमारे लिए सबसे बड़ा कर्तव्य है।
अजय केशरी
Friday, February 13, 2026
मनेर की मज़ार




मनेर का मकदूम साह दौलत मज़ार: मुगल स्थापत्य का जीवंत प्रतीकपटना से मात्र तीस किलोमीटर दूर, मनेर कस्बा बिहार की धरती पर एक ऐतिहासिक धरोहर को समेटे हुए है। यहाँ सूफी संत मकदूम साह दौलत का मज़ार स्थित है, जो भक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। सन १६०८ के आसपास इनकी मृत्यु हुई, और उनके नाम से जुड़ी यह इमारत मुगल कालीन स्थापत्य की उत्कृष्ट मिसाल है। सफेद संगमरमर की चमक और नाजुक नक्काशी इसे दूर से ही आकर्षित करती है।मकदूम साह दौलत एक प्रमुख सूफी संत थे, जिनकी शिक्षाएँ प्रेम, भक्ति और मानवता पर आधारित थीं। मुगल सम्राट जहाँगीर के काल में यह मज़ार निर्मित हुआ, जो स्थानीय शासकों और मुगल दरबार के संरक्षण में फला-फूला। इमारत का मुख्य गुंबद ऊँचा और सुंदर है, जिसमें अरबी-पर्शियन शिलालेख उत्कीर्ण हैं। चारों ओर मेहराबदार गलियारे और जालीदार खिड़कियाँ हैं, जो मुगल शैली की विशेषता दर्शाती हैं—जैसे ताजमहल या हुमायूँ का मज़ार। संगमरमर पर फूल-पत्तियों की बारीक नक्काशी और छतरीदार मीनारें इसे राजसी वैभव प्रदान करती हैं।यह मज़ार न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि बिहार के मुस्लिम-सूफी इतिहास का साक्षी भी है। हर साल उर्स के अवसर पर हजारों भक्त इकट्ठा होते हैं, जहाँ कव्वाली और दरगाह की फिजा आस्था को गहरा करती है। पटना के शहरी भागदौड़ से दूर, मनेर की शांत वादियाँ इस ऐतिहासिक स्थल को और भी रहस्यमय बनाती हैं। पर्यटक और इतिहास प्रेमी यहाँ आकर मुगल युग की भव्यता को महसूस कर सकते हैं।Friday, January 18, 2013
ज़मीदोह होती भारतीय राजनीति
Monday, October 8, 2012
चक्रव्यह में फंसा आम आदमी
Monday, September 24, 2012
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह "दिनकर" का जन्मदिन
बढ़ा भीड़-भीतर से सहसा कर्ण शरासन साधे।
कहता हुआ, 'तालियों से क्या रहा गर्व में फूल?
अर्जुन! तेरा सुयश अभी क्षण में होता है धूल।'
'तूने जो-जो किया, उसे मैं भी दिखला सकता हूँ,
चाहे तो कुछ नयी कलाएँ भी सिखला सकता हूँ।
आँख खोल कर देख, कर्ण के हाथों का व्यापार,
फूले सस्ता सुयश प्राप्त कर, उस नर को धिक्कार।'
इस प्रकार कह लगा दिखाने कर्ण कलाएँ रण की,
सभा स्तब्ध रह गयी, गयी रह आँख टँगी जन-जन की।
मन्त्र-मुग्ध-सा मौन चतुर्दिक् जन का पारावार,
गूँज रही थी मात्र कर्ण की धन्वा की टंकार।
Thursday, September 20, 2012
भारत में एफ डी आई का आना
Thursday, August 30, 2012
बे-नकाब होती भारतीय राजनीति
केंद्र कि सत्ता में आसीन कांग्रेस पार्टी तथा उसकी सहयोगी पार्टी यूपीए कि सरकार तथा विपक्ष में बैठी भारतीय जनता पार्टी तथा उसकी सहयोगी पार्टी एनडीऐ के सांसद एक दुसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगा रहे है और यह साबित करने पर तुले हुए है कि कौन बड़ा घोटालाबाज़ है! जिसका नतीजा यह हो रहा है कि इनके खिंचा तान में संसदीय कार्य पूरी तरह से ठप पड़ गया है और जनता का करोडो रुपया प्रतिदिन संसदीय कार्य पर खर्च तो हो रहे है लेकिन काम कुछ नहीं हो रहा है ! क्या भारतीय जनता मूक दर्शक बनी बैठी है या फिर बेनकाब हो रहे भारतीय राजनीति को देख रही है ? आज आरोप और प्रत्यारोप कि राजनितिक भाषा उस नीचले स्तर तक पहुँच गई है जहाँ विपक्ष के नेता सत्तारूढ़ पार्टी पर यह आरोप लगा रहे है कि कोयला के गबन में कांग्रेस पार्टी को "मोटामाल" मिला है तो सत्तारूढ़ पार्टी कि सुप्रीमो भारतीय जनता पार्टी पर यह आरोप लगा रही है कि यह "ब्लेकमेलर" पार्टी है और बेचारी भारतीय निरीह जनता इन दोनों पार्टियों के आरोपों को सुन रही है, समझने कि कोशिश कर रही है और शोंच रही है क्या भारतीय राजनीति इतनी जल्दी अपनी गरिमा को खो दी या हमलोगों ने गलत विचार धरा के उम्मीदवार को अपना नेता चुन संसद में भेज दिए जो आपस में मिलजुल कर बड़े-बड़े घोटाले तो कर रहे है और अपनी छवि को साफ सुथरी बताने के लिए एक दुसरे पर आरोप और प्रत्यारोप लगा रहे है और जनता के पैसों को लूट रहे है!भारत एक प्रजातांत्रिक देश है और प्रजातंत्र कि परिभाषा है :- "जनता का, जनता के लिए, जनता के द्वारा "।
जनता का :- यानि भारतवर्ष कि पूरी संपदा, उसका छेत्रफल, नदी, समुन्द्र, खनिज, पर्वत यह सब भारतीय जनता का है न कि किसी पार्टी विशेष कि,इसलिए भारत कि हर जनता को यह सोंचना पड़ेगा कि उसका प्रतिनिधि कैसा हो जो उसकी संपदा कि रक्षा कर सके ?
जनता के लिए :- जनता के हितो कि रक्षा के लिए भारतीय संसद है जो भारतीय जनता का सर्वोच्च सदन है।
जनता के द्वारा :- जनता के द्वारा चुने हुए उसके नेता, जन-प्रतिनिधि या नायक, जनता के हितो कि रक्षा करते है।
क्या आपके सांसद आपकी संपदाओं कि रक्षा कर पा रहे है, शायद नहीं, अगर भारतीय जनता के संपदाओं कि रक्षा होती तो आज इतने बड़े-बड़े घोटाले नहीं होते । नीचे कुछ उदाहरण दे रहे है जो आज़ादी के बाद से अबतक कितने घोटाले इन राजनेताओ ने किये है ।
आजादी से अब तक देश में काफी बड़े घोटालों का इतिहास रहा है। नीचे भारत में हुए बड़े घोटालों का संक्षिप्त विवरण दिया गया है-
जीप खरीदी (१९४८)
आजादी के बाद भारत सरकार ने एक लंदन की कंपनी से २००० जीपों को सौदा किया। सौदा ८० लाख रुपये का था। लेकिन केवल १५५ जीप ही मिल पाई। घोटाले में ब्रिटेन में मौजूद तत्कालीन भारतीय उच्चायुक्त वी.के. कृष्ण मेनन का हाथ होने की बात सामने आई। लेकिन १९५५ में केस बंद कर दिया गया। जल्द ही मेनन नेहरु केबिनेट में शामिल हो गए।
साइकिल आयात (१९५१)
तत्कालीन वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के सेकरेटरी एस.ए. वेंकटरमन ने एक कंपनी को साइकिल आयात कोटा दिए जाने के बदले में रिश्वत ली। इसके लिए उन्हें जेल जाना पड़ा।
मुंध्रा मैस (१९५८)
हरिदास मुंध्रा द्वारा स्थापित छह कंपनियों में लाइफ इंश्योरेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया के १.२ करोड़ रुपये से संबंधित मामला उजागर हुआ। इसमें तत्कालीन वित्त मंत्री टीटी कृष्णामचारी, वित्त सचिव एच.एम.पटेल, एलआईसी चेयरमैन एल एस वैद्ययानाथन का नाम आया। कृष्णामचारी को इस्तीफा देना पड़ा और मुंध्रा को जेल जाना पड़ा
तेजा ऋण
१९६० में एक बिजनेसमैन धर्म तेजा ने एक शिपिंग कंपनी शुरू करने केलिए सरकार से २२ करोड़ रुपये का लोन लिया। लेकिन बाद में धनराशि को देश से बाहर भेज दिया। उन्हें यूरोप में गिरफ्तार किया गया और छह साल की कैद हुई।
पटनायक मामला
१९६५ में उड़ीसा के मुख्यमंत्री बीजू पटनायक को इस्तीफा देने केलिए मजबूर किया गया। उन पर अपनी निजी स्वामित्व कंपनी 'कलिंग ट्यूब्सÓ को एक सरकारी कांट्रेक्ट दिलाने केलिए मदद करने का आरोप था।
मारुति घोटाला
मारुति कंपनी बनने से पहले यहां एक घोटाला हुआ जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का नाम आया। मामले में पेसेंजर कार बनाने का लाइसेंस देने के लिए संजय गांधी की मदद की गई थी।
कुओ ऑयल डील
१९७६ में तेल के गिरते दामों के मददेनजर इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन ने हांग कांग की एक फर्जी कंपनी से ऑयल डील की। इसमें भारत सरकार को १३ करोड़ का चूना लगा। माना गया इस घपले में इंदिरा और संजय गांधी का भी हाथ है।
अंतुले ट्रस्ट
१९८१ में महाराष्ट्र में सीमेंट घोटाला हुआ। तत्कालीन महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एआर अंतुले पर आरोप लगा कि वह लोगों के कल्याण के लिए प्रयोग किए जाने वाला सीमेंट, प्राइवेट बिल्डर्स को दे रहे हैं।
एचडीडब्लू दलाली (१९८७)
जर्मनी की पनडुब्बी निर्मित करने वाले कंपनी एचडीडब्लू को काली सूची में डाल दिया गया। मामला था कि उसने २० करोड़ रुपये बैतोर कमिशन दिए हैं। २००५ में केस बंद कर दिया गया। फैसला एचडीडब्लू के पक्ष में रहा।
बोफोर्स घोटाला
१९८७ में एक स्वीडन की कंपनी बोफोर्स एबी से रिश्वत लेने के मामले में राजीव गांधी समेत कई बेड़ नेता फंसे। मामला था कि भारतीय १५५ मिमी. के फील्ड हॉवीत्जर के बोली में नेताओं ने करीब ६४ करोड़ रुपये का घपला किया है।
सिक्योरिटी स्कैम (हर्षद मेहता कांड)
१९९२ में हर्षद मेहता ने धोखाधाड़ी से बैंको का पैसा स्टॉक मार्केट में निवेश कर दिया, जिससे स्टॉक मार्केट को करीब ५००० करोड़ रुपये का घाटा हुआ।
इंडियन बैंक
१९९२ में बैंक से छोटे कॉरपोरेट और एक्सपोटर्स ने बैंक से करीब १३००० करोड़ रुपये उधार लिए। ये धनराशि उन्होंने कभी नहीं लौटाई। उस वक्त बैंक के चेयरमैन एम. गोपालाकृष्णन थे।
चारा घोटाला
१९९६ में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव और अन्य नेताओं ने राज्य के पशु पालन विभाग को लेकर धोखाबाजी से लिए गए ९५० करोड़ रुपये कथित रूप से निगल लिए।
तहलका
इस ऑनलाइन न्यूज पॉर्टल ने स्टिंग ऑपरेशन के जारिए ऑर्मी ऑफिसर और राजनेताओं को रिश्वत लेते हुए पकड़ा। यह बात सामने आई कि सरकार द्वारा की गई १५ डिफेंस डील में काफी घपलेबाजी हुई है और इजराइल से की जाने वाली बारक मिसाइल डीलभी इसमें से एक है।
स्टॉक मार्केट
स्टॉक ब्रोकर केतन पारीख ने स्टॉक मार्केट में १,१५,००० करोड़ रुपये का घोटाला किया। दिसंबर, २००२ में इन्हें गिरफ्तार किया गया।
स्टांप पेपर स्कैम- २०,००० करोड़
यह करोड़ो रुपये के फर्जी स्टांप पेपर का घोटाला था। इस रैकट को चलाने वाला मास्टरमाइंड अब्दुल करीम तेलगी था।
सत्यम घोटाला
२००८ में देश की चौथी बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी सत्यम कंप्यूटर्स के संस्थापक अध्यक्ष रामलिंगा राजू द्वारा १४००० करोड़ रूपये का घोटाले का मामला सामने आया। राजू ने माना कि पिछले सात वर्षों से उसने कंपनी के खातों में हेरा फेरी की।
मनी लांडरिंग
२००९ में मधु कोड़ा को चार हजार करोड़ रुपये की मनी लांडरिंग का दोषी पाया गया। मधु कोड़ा की इस संपत्ति में हॉटल्स, तीन कंपनियां, कलकत्ता में प्रॉपर्टी, थाइलैंड में एक हॉटल और लाइबेरिया ने कोयले की खान शामिल थी।
बोफोर्स घोटाला - ६४ करोड़ रु.
मामला दर्ज हुआ - २२ जनवरी, १९९० सजा - किसी को नहीं वसूली - शून्य
एच.डी. डब्ल्यू सबमरीन- ३२ करोड़ रु.
मामला दर्ज हुआ - ५ मार्च, १९९० (सीबीआई ने अब मामला बंद करने की अनुमति मांगी है।) सजा - किसी को नहीं, वसूली - शून्य
(१९८१ में जर्मनी से ४ सबमरीन खरीदने के ४६५ करोड़ रु. इस मामले में १९८७ तक सिर्फ २ सबमरीन आयीं, रक्षा सौदे से जुड़े लोगों द्वारा लगभग ३२ करोड़ रु. की कमीशनखोरी की बात स्पष्ट हुई।)
स्टाक मार्केट घोटाला- ४१०० करोड़ रु.
मामला दर्ज हुआ - १९९२ से १९९७ के बीच ७२, सजा - हर्षद मेहता (सजा के १ साल बाद मौत) सहित कुल ४ को, वसूली - शून्य
(हर्षद मेहता द्वारा किए गए इस घोटाले में लुटे बैंकों और निवेशकों की भरपाई करने के लिए सरकार ने ६६२५ करोड़ रुपए दिए, जिसका बोझ भी करदाताओं पर पड़ा।)
एयरबस घोटाला- १२० करोड़ रु.
मामला दर्ज हुआ - ३ मार्च, १९९०, सजा - अब तक किसी को नहीं, वसूली - शून्य, (फ्रांस से बोइंग ७५७ की खरीद का सौदा अभी भी अधर में, पैसा वापस नहीं आया)
दूरसंचार घोटाला-१२०० करोड़ रुपए
मामला दर्ज हुआ - १९९६, सजा - एक को, वह भी उच्च न्यायालय में अपील के कारण लंबित, वसूली - ५.३६ करोड़ रुपए
(तत्कालीन दूरसंचार मंत्री सुखराम द्वारा किए गए इस घोटाले में छापे के दौरान उनके पास से ५.३६ करोड़ रुपए नगद मिले थे, जो जब्त हैं। पर गाजियाबाद में घर (१.२ करोड़ रु.), आभूषण (लगभग १० करोड़ रुपए) बैंकों में जमा (५ लाख रु.) शिमला और मण्डी में घर सहित सब कुछ वैसा का वैसा ही रहा। सूत्रों के अनुसार सुखराम के पास उनके ज्ञात स्रोतों से ६०० गुना अधिक सम्पत्ति मिली थी।)
यूरिया घोटाला- १३३ करोड़ रुपए
मामला दर्ज हुआ - २६ मई, १९९६, सजा - अब तक किसी को नहीं, वसूली - शून्य
(प्रधानमंत्री नरसिंहराव के करीबी नेशनल फर्टीलाइजर के प्रबंध निदेशक सी.एस.रामाकृष्णन ने यूरिया आयात के लिए पैसे दिए, जो कभी नहीं आया।)
सी.आर.बी- १०३० करोड़ रुपए
मामला दर्ज हुआ - २० मई, १९९७, सजा - किसी को नहीं, वसूली - शून्य
(चैन रूप भंसाली (सीआरबी) ने १ लाख निवेशकों का लगभग १ हजार ३० करोड़ रु. डुबाया और अब वह न्यायालय में अपील कर स्वयं अपनी पुर्नस्थापना के लिए सरकार से ही पैकेज मांग रहा है।)
केपी- ३२०० करोड़ रुपए
मामला दर्ज हुआ - २००१ में ३ मामले, सजा - अब तक नहीं, वसूली - शून्य
(हर्षद मेहता की तरह केतन पारेख ने बैंकों और स्टाक मार्केट के जरिए निवेशकों को चूना लगाया।)
UP Food Grain Scam 2003, ३५००० हजार करोड़
झारखण्ड चीकतशालय धन कांड २००९
मधु कोड़ा खदान घोटाला २००९
ताज कारीडोर घोटाला उत्तर प्रदेश २००१
2G स्पेक्ट्रम घोटाला - १ लाख ७६ हजार करोड़ का ।
कामन वेल्थ घोटाला - ७०,००० करोड़
खेल के नाम पर ये घोटाले हुए ।
आदर्श हाऊसिंग सोसाईटी घोटाला
हाऊसिंग लोन घोटाला
बेलेकेरिया पोर्ट घोटाला कर्नाटका
कर्नाटका वक्फ बोर्ड घोटाला २००,००० करोड़
नेशनल रुरल हेल्थ मिसन कांड उत्तर प्रदेश १०,००० हजार करोड़
कोयला घोटाला २०१२
१८५,५९१,३४ करोड़ का घोटाला
इन सभी घोटालो पर ध्यान दिया जाय तो किसी भी पार्टी कि छवी साफ़ नज़र नहीं आती, सभी घोटालो के कीचड़ में आकंठ डूबे हुए है । ऐसे में पक्ष और विपक्ष के नेता एक दुसरे पर कीचड़ उछाल रहे है तो इसमें हैरानी कि बात नहीं है और भारत कि जनता कि यह बिडम्बना है कि उसके सामने यह सब हो रहा है और वह मूक दर्शक बनी अपने संपत्ति को लुटवा रही है।
यानी कि अब राजनेताओं में समाज सेवा न होकर केवल भारतीय सम्पतियों को लुटने का काम रह गया है।
Monday, November 14, 2011
क्या यही लोकतंत्र है ?
भारत एक लोकतान्त्रिक देश है और लोकतंत्र में जनता के द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि बहुमत के हिसाब से ही केंद्र या राज्य में अपनी सरकार बनाते है। सरकार का कार्य होता है वह राज्य या देश कि जनता के हितो का ध्यान रखे जैसे स्वतन्त्रता कि आज़ादी, अराजकता और मुनाफाखोरी देश में ना फैले, जनता कि जान और माल कि रक्षा, देश कि सीमाएं पूरी तरह चाक चौकस बंद हो ताकि बाहरी आक्रमण देश पर न हो सके। अगर सरकार इन सभी कार्यो का निर्वाह पूरी ईमानदारी से करती है तो वह एक लोकतान्त्रिक सरकार है और वह अपने जनता के विश्वासों पर खरा उतरती है।हमारे देश के प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह एक कुशल राजनेता के साथ-साथ एक अच्छे विद्वान्, अर्थशास्त्री और विचारक भी है। एक मजे हुए अर्थशास्त्री के रूप में उनकी ज्यादा पहचान है। अपने कुशल और ईमानदार छवि कि वज़ह से सभी राजनैतिक दलों में उनकी अच्छी साख है। लेकिन एक कुशल समाजसेवी नहीं है। वह देश कि अर्थव्यवस्था को ऊँचाइयों पर ले जा तो सकते है जिसका फायदा उद्योगपतियों और कुछ खास मुट्ठी भर लोगो को होगा। क्यों कि वह अर्थशास्त्री है और हर चीज में मुनाफा देखते है क्या देश में बढ़ रही गरीबी और महंगाई में भी मुनाफा ही देख रहे है ? देश कि जनता आज परेशान हाल है सौ रुपये में हम एक झोला सब्जी भी खरीद कर नहीं ला सकते और सरकार कहती है कि बत्तीस रुपया कमाने वाला व्यक्ति अमीर है। जनता के पैसो पर राज करने वाले सत्ता पर आसीन राजनेतावों जनता कि आवाज़ को पहचानो उसकी नब्ज को टटोलो जनता से तुम हो तुमसे जनता नहीं है उसके पैसे को लूटना बंद करो, महंगाई पर अंकुश लगाओ, देश में बढ़ रही मुनाफाखोरी और अराजकता पर रोक लगाओ, उद्योगपतियों पर भी अंकुश लगाओ वह उत्त्पादन पर ज्यादा मुनाफाखोरी ना करे। कही ऐसा ना हो कि जनता ही तुमको लूट ले । क्यों कि भारतीय जनता कि सहनशीलता कि एक सीमा है कही ऐसा ना हो कि अपना खज़ाना भरने के चक्कर में तुम उस सीमा को पार कर जाओ जहाँ भारतीय जनता अपनी सहनशीलता खो दे। फिर क्या हस्र होगा, इतिहास इसका गवाह है।
हमारे अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री जिनकी ईमानदारी कि कसमे खाई जा सकती है क्यों कि सभी राजनैतिक पार्टियों के लोग इनको ईमानदार ही कहते है। इन्ही के मंत्रिमंडल में आसीन भूतपूर्व संचार मंत्री ए.राजा ने 2G स्पेक्ट्रम घोटाल इतना बड़ा किया जो अभीतक के घोटालो में सरताज है। यह घोटल एक लाख छिहत्तर हजार करोड़ का है जो देश कि आज़ादी के बाद से अभीतक के घोटालो में सबसे बड़ा घोटाला है। अभी श्री ऐ.राजा तिहाड़ जेल कि शोभा बढ़ा रहे है।
हमारे देश के भूतपूर्व खेल मंत्री श्री सुरेश कलमाड़ी जी कामनवेल्थ खेल में घोटालो का ऐसा खेल खेला जो सत्तर हजार करोड़ का था अब ये तिहाड़ जेल में कोई और खेल खेलने के मनसूबे तैयार कर रहे है।
महारास्ट्र के भूतपूर्व मुख्यमंत्री श्री अशोक चौव्हान ने तो वो कारनामे किये जो बे मिसाल है वो कारगिल के शहीदों के लिए बने आवास में ही उलट-फेर कर दिए। यानि कि मुर्दे के शारीर से ही कफ़न छीन लिए। अब ऐसे राजनेताओं से क्या उम्मीद कर सकते है और मनमोहन सिंह को कैसे ईमानदार कहा जा सकता है क्यों कि ये सभी घोटाले उनके नाक के नीचे हुई है।
ये राजनेता किस मिट्टी या धातु के बने है जो कितना भी खा ले है फिर भी पेट नहीं भरता है। इनकी तुलना अगर भिखारियों से कि जाय तो ज्यादा तार्किक लगता है, क्यों कि भिखारियों को आप कितना भी खिला दो लेकिन उनका पेट नहीं भरता, वही हाल हमारे राजनेताओं का है, और ऐसे ही नेता इस देश कि बाग़ डोर सम्हाले बैठे है।
अब हमारे देश कि सीमाएं कितनी चाक चौकस बंद है यह भी देख लीजिये १३ दिसम्बर २००१ को कुछ बन्दुकधारी आतंकवादी हमारे लोकतंत्र कि मंदिर संसद पर हमला कर देते है, गनीमत है कि हमारे सभी सांसद और मंत्री सही सलामत बच जाते है, हाँ कुछ पुलिसकर्मी जख्मी होते है और कुछ कि जान जाती है। इस घटना को अंजाम देने वाला मुज़रिम मिलने के बाद भी अभीतक सरकारी मेहमान बना जेल में रोटियां तोड़ रहा है।
अब भारत कि आर्थिक राजधानी मुंबई पर २६ नवम्बर २००८ को समुन्द्र के रास्ते आतंकवादी आते है और मुंबई महानगरी में AK-47 से निरीह और निहत्थे नागरिको पर गोलियों कि बौछार कर देते है। इस हमले में बहुत से निर्दोष मारे जाते है। क्या हमारी देश कि सीमाएं पूरी तरह चाक चौकस बंद है ? शायद नहीं। ऐसी आतंकवादी घटनाएँ हर साल इस देश में घटती है चाहे वो बम ब्लास्ट हो सीरियल ब्लास्ट हो या गोलियों कि बौछार हो मारे तो निरीह प्राणी ही जाते है। और हमारा देश वैसे आतंकवादियों को पकड़ने के बाद भी सरकारी मेहमान बना कर जेलों में बंद रखती है और उसके हिफाज़त के लिए जनता का करोडो रुपया उस पर खर्च करती है। क्या ऐसे आतंकवादियों को जो सरेआम कत्लेआम किये है क्या इनको भी सरेआम फांसी नहीं दे दी जानी चाहिए ? इनसे सहानभूति कैसी ?
अगर आप इन राजनेताओं से अच्छे कि उम्मीद करते है तो यह आपकी भूल है, यह देश इन मुट्ठी भर राजनेताओं का नहीं है बल्कि यह देश आपका अपना है इसे अच्छा या बुरा बनाना आपके हाथो में है। प्रजातंत्र में जनता अगर खुशहाल है तो देश चहुओर तरक्की करता है अगर जनता दुखी है तो देश पिछड़ता है।
Wednesday, November 2, 2011
अन्ना टीम को बदनाम कर केंद्र में बैठी सरकार देश से क्या कहना चाह रही है .
अन्ना टीम के सदस्यों को बदनाम करने कि चाल चल कर केंद्र में आसीन कांग्रेस कि सरकार (कांग्रेस कि सरकार कहना इसलिए उपयुक्त है क्यों कि यूपीए कि सरकार में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी है तथा सभी मुख्य विभाग अगर कुछ को छोड़ दिया जाय तो कांग्रेस के पास ही है।) आखिर भारतीय जनता को क्या बताना चाहती है ? क्या वह यह बताना चाहती है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ वही व्यक्ति आवाज़ उठा सकता है जिसके पुरे जीवन में कभी किसी प्रकार का झूठा या सही कभी कोई आरोप न लगे हों ? ऐसा व्यक्ति तो शायद मिलना मुश्किल ही होगा, क्यों कि वह इंसान ही होगा, भगवान तो आयेगें नहीं, फिर वैसे इंसान को कहाँ तलाश किया जाय। भगवान भी जब इंसान के रूप में इस मृत्युलोक में जन्म लिए है तो उन पर भी आरोप लगे है चाहे त्रेतायुग में रामचंद्र रहे हो या द्वापरयुग में जन्मे श्री कृष्ण। हम सभी तो कलयुग में जी रहे है जिसमे कल, बल और छल ही प्रमुख है अब ऐसे कलयुग में हम कहाँ से वैसे इंसान को लाये जो ऊपर से नीचे तक साफ़, सुथरा और स्वच्छ छवि का हो जो भारत में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठा सके और केंद्र में बैठी कांग्रेस कि सरकार उसका इतिहास, भूगोल खघालने के बाद भी कोई नुक्ताचीनी न निकाल सके ? ऐसा इंसान कहाँ से लाया जाय ? क्यों कि इस भौतिक युग में कांग्रेस जिस इंसान कि उम्मीद कर रही है वैसा इंसान तो मिलना संभव नहीं है और अगर वैसा इंसान नहीं मिलेगा तो फिर भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाने का हक भी नहीं बनता है, क्यों कि कांग्रेस तो बार-बार यही कह रही है चाहे वो कांग्रेस के शिखंडी दिग्विजय सिंह से कहवाये या कोई और प्रवक्ता से। दिग्विजय सिंह एक वरिष्ट कांग्रेसी नेता है उनके बयानों को सुनकर लगता नहीं कि जो शब्द वो बोल रहे है वो शब्द उनके अपने हो, आखिर कबतक ऐसे बयनो को बोल-बोल कर अपनी खिल्ली उडवाते रहेगें ? अब तो लोग उनके बयानों को सुनना भी पसंद नहीं करते है।आज अन्ना हजारे जनता कि आवाज़ बन गए है क्या कांग्रेस या उसकी सहयोगी पार्टियाँ इन बातो को नहीं समझती है या राजनीती कि कोई और खेल खेली जा रही है। जनता सरकार से क्या मांग कर रही है, यही न कि लोकपाल कानून बनाया जाय, क्यों कि भारतीय जनता भ्रष्टाचार और महंगाई से त्रस्त हो चुकी है इसलिए इसपर अंकुश लगाने के लिए कानून बनाया जाय, वह अपनी चुनी हुई सरकार से लोकपाल कानून बनाने कि मांग कर रही है और सरकार है कि जनता कि बात ही नहीं समझ रही है। केंद्र कि सरकार क्या वह भारतीय जनता कि सहनशीलता देखना चाहती है या वह यह समझ रही है कि अन्ना टीम को तोड़ दो फिर कोई भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाएगा। शायद सरकार यह गलत सोंच रही है। कांग्रेस के ही प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गाँधी ने भी एक बार जनता कि आवाज़ दबाने के लिए पुरे देश में इमरजेंसी लगा दी थी और विपच्छ के जितने भी नेता थे सभी को जेल में डाल दिया गया था जिसका हस्र यह हुआ कि कांग्रेस को पुरे भारत से अपनी सत्ता से हाथ धोना पड़ा था। समय रहते केंद्र कि सरकार को यह समझना चाहिए कि यह लड़ाई अन्ना बनाम कांग्रेस नहीं है बल्कि जनता बनाम कांग्रेस है।
Friday, October 14, 2011
Monday, September 19, 2011
लूट मची है लूट मची, जहाँ भी देखो मची है लूट
मंत्री , सांसद या नेता हो चाहे कोई अभिनेता हो
उद्योगपति हो या व्यापारी चाहे कोई हो अधकारी
लूट रहे है ऐसे मिलकर जैसे है नहीं इनका देश
भिखारी तुम बनकर ऐसे लूट रहे हो अपना देश
देश तुम्हारा अपना ही है जिससे है तेरी पहचान
सभी लूटे है तेरे देश को तुम तो लूटना बंद करो
नहीं कोई चंगेज के वंशज नाही तूम अंग्रेज हो
वही लुटेरे लुटेरे थे जो लूट लिए थे तेरे देश को
इच्छाओं पर रोक लगाओ नहीं तो बढ़ता जायेगा
इसकी पूर्ति कभी न होगी क्या कोई कर पाया है
क्या तुम पूरा कर पाओगे, जो तेरी अभिलाषा है
नहीं करोगे मरोगे ऐसे त्यागो अब तुम लालच को
देश तुम्हारा अपना ही है इसको अब समृद्ध करो
त्रादसी...
हिंदुस्तान का मस्तक काटा,
जिन्ना कि ही चाहत थी,
एक हिस्सा इस्लाम को माना,
बन्टाधार में सभी धर्म है,
धर्म नहीं जब राष्ट कि कोई,
Thursday, September 15, 2011
महंगाई क़ी एक और मार
डरे हुए हम लोग सभी है मनमानी कर रही सरकार। बढ़ा बढ़ा कर महंगाई को जीना कर दिया है दुश्वार ॥
ऐसा जीना क्या जीना जहाँ मर मर के हर रोज जिए।
जिन्दा हो तो निकलो तुम फिर छीनो अपना अधिकार ॥
पेट्रोल की ज्यादा खपत मध्यम वर्ग में होता है। चाहे वो दोपहिया गाड़ी (मोटरसाईकिल, स्कूटर या स्कूटी) या तीन चक्के की गाड़ी ऑटो रिक्शा अगर वो चार चक्के की गाड़ी लेता है तो अधिकांश पेट्रोल माडल ही होता है।
क्या सरकार जनता की परेशानियाँ नहीं समझ रही है। पेट्रोल की कीमत बढने से महंगाई और बढ़ेगी, लोगों पर अतिरिक्त भोझ बढ़ता जायेगा। यह सरकार के हित में भी गलत ही होगा क्यों की जनता सरकार से दूरियां बढ़ाएगी। अगला चुनाव जीतना भी वर्तमान सरकार के लिए मुश्किल हो जायेगा। या कही सरकार यह तो नहीं सोंच रही है की पांच साल के लिए सत्ता जो हाथ में आई है इसमें जीतना लूटना हो लूट लो क्यों की अगला चुनाव तो हम जितने नहीं जा रहे है इसलिए महंगाई दर इतना ऊपर कर दो की अगले चुनाव के बाद जो सरकार चुन कर आएगी उसे मुसीबतों का सामना करना पड़े। फिर हमारे पास बहुत समय रहेगा नई सरकार को बदनाम करने के लिए और तबतक जनता हमारी गलतियों को भूल गई रहेगी। (यानि की पांच साल के अन्तराल के बाद सत्ता में आने का खेल शुरू होगा)
महंगाई का अगर आलम यही रहा तो लोग अन्दर ही अन्दर टूटते जायेगें (आक्रोशित होंगे) नतीजा यह होगा की लोग सडको पर फिर से उतरेगे और इस बार कोई अन्ना नहीं होंगे बल्कि जनता होगी सिर्फ आक्रोशित जनता जिसका नेत्रित्व जनता ही करेगी वैसे में हमारे मुट्ठी भर राजनेताओ का क्या होगा जो अपने को राजा समझ बैठे है।





